सपनों की उड़ान

आज
बाल कटबाने जाना था सोचा मोटरसाइकल की सेवा न लेकर पैदल चलकर नाई की दुकान तक
पहुंचा जाये। नाई की दुकान नोएडा के केन्द्रीय विहार सोसाइटी के सामने सैक्टर 50
मे थी। यही सोच कर हम मानव रचना स्कूल से होते हुए मुख्य सड़क से सैक्टर 50 मेट्रो
स्टेशन की तरफ चल दिये। हमारे घर से नाई की दुकान लगभग 1.50-2.00 कि. मी॰ थी। रास्ते मे एक टूटी-फूटी कच्ची गली
नुमा रास्ता दिखा जो होशियारपुर गाँव होकर भी हमारे गंतव्य को पहुंचा सकता था। हम
उस अंजान पथ पर अंदर गाँव की ओर बढ़ लिये। यादव बहुल गाँव के मूल निवासियों के मकान
को देख कर उनकी संपन्नता का अहसास सहज ही लगाया
जा सकता हैं। कृषि योग्य भूमि की कीमत पर शहरीकरण
का प्रभाव गाँव मे स्पष्ट देखा जा सकता था। गाँव के इन सम्पन्न घरों मे हर तरह के चारपहिया
एवं दोपहिया वाहन इन नव धनाढ्यो की कहानी बयां कार रहे थे। गाँव के
हर मकान की ग्राउंड फ्लोर अथवा खाली पड़े प्लॉट
पर बीच मे छोड़े गए रास्ते के दोनों ओर एक-एक कमरे के मकान कबूतरों के दढ़बे की तरह दिखे। खाली कच्चे प्लॉट पर जो मकान
थे वे फिर भी ठीक थे क्योंकि उन कोठरियों मे हवा, धूप के लिए
जगह थी पर जो दो-तीन मंज़िला घरों के तल पर
कबूतर खानों की तरह के मकान, उन कंक्रीट जंगलों की तरह थे जिनमे
हवा धूप का कोई प्रावधान नहीं था। लेकिन दोनों
तरह के इन आवासों मे कमरों की संख्या के आधार
एक लाइन से बने शौचालय स्वछ भारत अभियान की अधूरी कहानी सुना रहे थे। इन सभी मकानों
मे प्रायः नोएडा और उसके औध्योगिकृत कारखानों
के मजदूर निवासरत थे। गाँव मे एक सरकारी बाल विध्यालय एवं कुछ पब्लिक स्कूल
के बीच खींची गई लाइन, देशी और आधी अधूरी अंग्रेज़ियत का विभाजन करती हुई लाइन, बच्चों के चेहरों के भाव से स्पष्ट नज़र आ रही थी। गाँव मे बहुतायत हर तरह की दुकाने आर्थिक संपन्नता को दर्शा रही थी। सघन आबादी
के कारण सभी दूकानदारों का व्यापार अच्छा खासा था। झोला छाप डॉक्टर गाँव की स्वास्थ आवश्यकताओं
की पूर्ति कर रहे थे। इन दढ़बे नुमा मकानो मे रह रहे कामगारों-मजदूरों की विपन्नता को
छोड़ दे तो गाँव कम से कम आर्थिक रूप से तो सम्पन्न दीख रहा था। गाँव का प्रवेश दुवार टूटी रास्ते से शुरू होकर दोनों ओर नालियों मे भरे
कीचड़ से सराबोर था। जैसे जैसे अंदर गलियों मे बढ़े गाँव मे संपन्नता और विपन्नता की
चरम सीमा देखने को मिली। इस सघन आबादी बाले गाँव के मुहाने पर एक मजदूर परिवार जो अपने छोटे बच्चे के साथ
सैक्टर 50 स्थित नाली निर्माण मे कार्यरत था। उस बच्चे को देख कर मुझे उस घटना की
याद ताजा हो गई जब मैं अपनी डबरा (जिला ग्वालियर) शाखा से शाम के बस द्वारा
ग्वालियर बापस आ रहा था। बस छतरपुर से ग्वालियर आ रही थी। टीकमगढ़, पन्ना, खजराहो, छतरपुर मध्य
प्रदेश के ऐसे जिले हैं जहाँ से बहुतायत आबादी
निर्माण कार्यों मे रत होकर देश के उत्तरी
भाग ग्वालियर, आगरा, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा आदि शहरों मे बिखरी पड़ी हैं। ये मेहनतकश मजदूर काम की तलाश मे अपने
परिवार और बच्चों के साथ बड़ी-बड़ी कपड़ो की पोटरी और आवश्यक समान लेकर बसो-रेल
गाड़ियों मे अपनी आजीविका का लिये यात्रा करते हैं। उस दिन भी वो मजदूर अपनी पत्नी
और एक छोटे बेटे के साथ पिछली सीट पर बैठा था। बच्चे की उम्र बमुश्किल चार-पाँच साल रही होगी। ग्वालियर मे जैसे बस नाका
चंद्र्बद्नी पर रुकी कुछ मजदूरों को उतरना था जिनके साथ काफी समान भी रहा होगा इसलिए
कुछ समय लग रहा था। नाके पर जहाँ बस खड़ी
थी सामने ही हुंदई कार का बड़ा सा शो रूम हैं जिनके अंदर अनेक रंग-विरंगी कारें खड़ी
थी। अचानक उस बच्चे ने बड़ी ही मासूमियत से अपने पिता से कहा "इतनी गाड़ी खड़ी, पापा एक लै लो न"।
उसका पिता ने उसे बहलाते हुए कहा "हाँ बाद मे ले लेंगे"। अब बच्चे की
बाल हट कुछ बढी वो बोला "तुम ऐसई कै रये", "इन मे से एक अवई लै लो"। बच्चे की आवाज मे कुछ
क्रंदन मिश्रित वेवशी और कुछ गुस्सा था। पिता के लिये बेटे की बात अब हंसी मे
टालने बाली नहीं थी। एक मजदूर बाप की वेवशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी। आसपास बैठे
यात्रियों का भी ध्यान उस बालहट पर गया, कुछ ने कौतुकता वश उस बालक की बातों को सुना, कुछ ने सुनकर अनसुना कार दिया पर कुछ ने हंसी मे टाल दिया। आस पास बैठे
अन्य यात्रियों के चेहरे को देख कर पिता के चेहरे
पर अपने लाचारी, वेवशी
और बच्चे के इस बड़े सपने पर अपनी हीन
भावना के भाव को स्पष्ट देखा जा सकता था।
बच्चा अब उस एक कार को लेने के लिये रोकर कार लेने की जिद करने लगा। इसी बीच बस भी यात्रियों को उतार कर आगे बढ्ने
लगी। उस मजदूर की लाचारी और वेवशी का दु:ख का वो द्र्शय आज भी आँखों मे तैर जाता हैं पर उस नादान बच्चे
द्वारा देखे गये इस विशाल सपने को काँच के तरह टुकड़े-टुकड़े होते देखना काफी वेदना और
दिल मे कांटे की तरह चुभन देने बाला था।
आज
वही द्रश्य फिर एक बार आँखों के सामने था। एक मजदूर दंपति सैक्टर 50 के उस पार्क की
नाली के निर्माण कार्य मे लगा था। उनका 3-4 साल का वेटा बही पास मे लगभग 50-60 फुट
दूर बैठा था। अचानक मेरी ध्यान बच्चे के पैर मे बंधी रस्सी ने आकर्षित किया। मैंने
देखा कि बच्चे के पैर मे रस्सी का दूसरा सिरा पास मे ही स्थित झड़ियों से बांधा हुआ था ताकि
बच्चा खेलते हुए या भटकते हुए मुख्य सड़क पर न आ जाये, क्योंकि मुख्य सड़क पर वाहनों का आना जाना लगा था। ये उन मजदूरों की जीविका
उपार्जन की बाध्यता और बच्चे के लालन पालन
की मजबूरी के बीच उनका संतुलन बनाना था। डबरा मे कार लेने
की जिद करने बाले उस बच्चे की तरह यह रस्सी
से बंधा मासूम जो अपनी बाहों मे सारी दुनियाँ
को समेटना चाह रहा था लेकिन उस कार की चाहत बाले बच्चे की तरह माँ बाप की बही लाचारी वही मजबूरी इस बच्चे के सपनों की उड़ान को भी रोक रही थी। कार लेने बाली झूठी दिलासा रूपी रस्सी इस बच्चे के
आकाश को भी रस्सी के माध्यम से छोटा जो कर रही थी। पास मे मजदूरी कर रहे माँ बाप द्वारा
उस मासूम के पैर मे पेड़ से रस्सी को बांधना इस चिंता को जग जाहिर कार
रहा था ताकि उन के कलेजे के टुकड़े के सपने
रूपी उड़ान को महानगर की चकाचौंध कहीं रौंध कर तोड़ न दे??
विजय
सहगल

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