"राजनैतिक शक्ति" (व्यंग)
माननीय प्रधान मंत्री महोदय,
नमस्कार,
बैसे तो उपर ये हमने सौजन्यता वश लिखा है पर वास्तव
मे आप हो आदमी बड़े ओछे। हम सभी राजनैतिक धर्म निरपेक्ष दल के सदस्य आपसे कुछ सवाल पूंछना चाहते हैं कृपया सिलसिले
बार हम सभी के सवालों का जबाब दे।
उनमे
से एक ने सवाल किया। आप हिंदुस्तान की राजनीति मे आखिर करना क्या चाहते हैं? 72 साल के
देश के राजनैतिक इतिहास के स्थापित अपने नियम और कार्यकलापों और उदारणों को आप क्यों
तोड़ना चाहते हैं। अरे एक खनदान से अगर बार बार सभी प्रधानमंत्री बन रहे है तो आप
को क्या तकलीफ़ हैं। ऐसा स्वतन्त्रता के पहले से एक ही परिवार मे राजे महाराजों का
बनना सैकड़ो साल से चला आ रहा हैं। हर रियासत मे राजा के बाद उसका बेटा राजा बनता आ
रहा हैं और फिर तुम्हें भी ऐसा करने से किसने रोका हैं। आप भी अपने भतीजे, भांजे, भाई को प्रधान मंत्री या अपने दल का अध्यक्ष
बनाओ किसने रोका हैं। लेकिन आप अपने निजी स्वार्थ मे इतने डूबे हो कि अपने अलावा
परिवार मे किसी को बढ़ते देखना नहीं चाहते। लेकिन हम लोग स्वार्थी नहीं हैं।
हमारे परिवार मे स्वार्थ को त्याग कर
हमारे पर नाना, दादी और अब्बा-अम्मा ने लगातार त्याग कर अपनी
अगली पीढ़ी को मौका दिया हैं। हमने एक कदम आगे बढ़ कर अपने बहिन और जीजा को भी
राजनैतिक क्षेत्र मे स्थान दिया हैं। ये त्याग और बलिदान हमारे खनदान की परंपरा
रही हैं। हम तुम जैसे स्वार्थी नहीं हैं जिसने अपने परिवार के एक सदस्य को भी
राजनीति मे लाने का मौका नहीं दिया। धिक्कार हैं तुम्हारे मुख्यमंत्रीयत और
प्रधानमंत्रीयत पर। संत कबीर की इस दोहे की इन पंक्तियो को हमारे परिवार ने सदा
त्याग और बलिदान का अनुसरण कर झुठलाया
हैं: -
"बड़ा
हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर"।
"परिवार
को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥
हमारे
देश मे तो स्थापित परंपरा है देश के अनेक राज्यों मे राजनैतिक दलों द्वारा एक ही
परिवार से मुख्यमंत्री या दलों का अध्यक्ष बनाने की परंपरा हैं। इसे आप क्यों
तोड़ना चाहते हैं। हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा जिसे आप देश का साधारण या
आम आदमी कहते हो उसमे प्रधानमंत्री,
मुख्यमंत्री या राष्ट्रीय दलों का अध्यक्ष बनने की औकात या कूबत नहीं होती। उनका उल्लेख सिर्फ भाषणों मे ही अच्छा लगता हैं मिस्टर प्राइमिनिस्टर
। अरे पिछले 70 साल से हम गरीबी हटाओं नारे की बजह से अनेकों बार सत्ता मे आये। जनता
बड़ी भुल्लकण होती है जनाब, यही हमारी सफलता का राज हैं। और जहां
तक जीजा का सवाल हैं वो तो पैदाइशी बिज़नस-मैन है बचपन मे एक रूपये के 10 गोलगप्पे
खरीद कर एक रूपये के 2 बेचा करता था। कमीशन एजेन्सि बिज़नस का आइडिया तो उन्हे बीर अभिमन्यु की तरह पैदाइशी खून मे मिला हैं।
क्या हुआ एकाध दर्जन प्लॉट हजारों मे खरीद कर करोड़ो मे बेच कर 10-5 मकान लंदन मे
और अन्य जगह ले लिये। इसमे स्यापा करने की क्या जरूरत हैं। हम तुम जैसे निर्लज्ज
नहीं जो बूढ़ी माँ को एक बंगला तो दूर म्यूनिसिपलटी का एक अदद मकान तक नहीं दे सके, भाई
और भतीजों की तो बात कर हम तुम्हें लज्जित करना नहीं चाहते। हमारे खनदान मे न जाने
कितने घोटाले हुए, न जाने कितना हल्ला-गुल्ला मचा, मजाल है कि कोई भी बाल बाँका हुआ हमारे परिवार का?
अरे जब तक घोटाले का आरोप न लगे तब तक काहे कि राजनीति? अरे
वो कंपनी का विज्ञापन नहीं देखते "अपन तो और चलेगा"। शरीफ हो केंद्र मे
नये-नये आए हो। हमसे कुछ सीखों हम कैसे बजनदारी से झूठ को भी सच बना देते है। याद
है न "गली गली मे शोर हैं....... अभी
भी समय हैं 70-75 साल से चली आ रही स्थापित राजनैतिक परम्पराओं से मत खेलों। यदि
हम सब एक हो गये तो समझ लो तुम्हारा क्या होगा? इसलिये जल्दी
से जल्दी कट लो !!
अब
दूसरे की बारी थी। बह बोला - राजनैतिक शक्ति को पाना अपने लिये धन-धान्य, शानो-शौकत, घर-मकान, धन-दौलत इक्कठा करना होता हैं ताकि अपने
बाल-बच्चों, माता-पिता को सुखी और ऐश्वर्य पूर्ण ज़िंदगी दी जा सके। मुझे देखो इस राजनैतिक हैसियत
से हमने दिल्ली मे दिल्ली का बंगला, लखनऊ मे लखनऊ का बंगला, मुंबई मे मुंबई का बंगला के अलावा सरकारी बंगलों को भी अपने नाम करा लिया
और सरकारी खर्च पर उसमे सारी सुख सुविधाएं एकत्रित करवा ली और मेरी राजनैतिक इच्छा
शक्ति देख कानूनी बाध्यता की बजह से सरकारी बंगला खाली करने पर उसमे लगी सारी
टोंटीयां अपने लखनऊ के बंगले मे लगवा ली।
इसे कहते हैं राजनैतिक ताकत अर्थात "हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा ही
चोखा"।
अरे
इस लौंडे की क्या बात हैं- धतत्। एक बूढ़े बुजुर्ग ने तिरच्छी निगाहों से देखते हुए
पिछले नौजवान को डांटते हुए कहा। घर मकान और टोंटीयों के अलावा भी कुछ हैं
राजनैतिक शक्ति मे। मुझे देख जितने मेरे सगे रिश्तेदार थे जैसे भाई, भतीजे, बेटे, समधी, मामा, फूफा, मौसा सबको संसद मे पहुंचा दिया और जितने दूर
दराज़ के थे सबको अससेंबली मे और बाकी को ब्लॉक प्रमुख, पंच
सरपंच बना दिया सिर्फ अपनी जातिबादी पोलटिकल पावर से!! लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि
राजनैतिक पदों की संख्या के मुक़ाबले रिशतेदारों की संख्या कम पड़ गई। अगली बार जब हम सत्ता मे आयेंगे तो मंत्री मंडल
नये पद सृजित करेंगे जैसे दूध मंत्री, दही मंत्री, घास-चारा मंत्री, समोसा-कचोड़ी मंत्री ताकि होने
बाले नये रिशतेदारों को भी जगह मिल सके। अरे तुम जैसे तंगदिल हम लोग नहीं हैं कि
अपने सग्गे किसी रिश्तेदार को सांसद-विधायक तो दूर पार्षद भी नहीं बनवा पाये, श्रीमान प्रधानमंत्री जी? क्या समझे??
अब
बारी थी एक बहिन जी की कहने लगी क्या गरीबों को गैस कनैक्शन, बिजली
कनैक्शन, देने का खेल खेल रहे हो ये हमारी राजनैतिक ताकत ही
थी जो हम बचपन मे हाथी-घोड़े, राजा-रानी का खेल खेलते थे। बड़े होकर हमने उन सपनों को
साकार किया है देखों बचपन के छोटे-छोटे हाथी घोड़े के खिलौनों की जगह प्रदेश मे
हमने सचमुच के हाथी से भी बड़े, हाथी हजारों की तादाद मे
लगवाये। ये होती है राजनैतिक ताकत "जो
सोचा बो किया"। भाई भतीजों को धन संपत्ति दिलाई। अभी भी वक़्त हैं अपने दूर के
रिश्तेदारों को न सही अपने भाई-भतीजों के लिये कुछ कमाई धमाई करलो और चुप चाप देश
की अब तक चली आ रही राजनीति मे ढल जाओ। खाओ और खाने दो। समझे कुछ??
एक
और बड़ी दीदी बोली बंगला देशी - हिंदुस्तानी क्या होता हैं मुखिया जी। अगर यहाँ पर
बंगलादेशी वोट डालते हैं तो क्या दिक्कत हैं। वे हमे वोट देते हैं हम इंसानियत के
नाते उन का ध्यान रखते हैं। प्रदेश के शीर्ष से पंचायत के मूल तक सभी का आर्थिक
विकास हो यही कल्पना तो हमारे देश के नीति नियंताओं ने की थी। उसी लक्ष्य की
प्राप्ति हेतु तो हमने छोटे छोटे 40 लाख गरीबों से पैसा ले कर चिट्ट का बड़ा
फ़ंड बना कर प्रदेश का आर्थिक विकास ही तो किया हैं। बड़े रामभक्त बनते हो
इतना भी ज्ञान नहीं है कि वेदों, उपनिषदों मे क्या कहा हैं
"बसुधैव कुटुंबकम" अर्थात सारी पृथ्वी हमारा परिवार है, तब क्या बंगलादेशी और क्या हिंदुस्तानी सब बराबर हैं और सभी हमारे हैं। आओ हमारे जैसे ही राजनीति करों? जैसा चला आ रहा हैं चलने दो?
एक
बड़े ही हैंडसम अच्छे दिखने बाले सज्जन जो शक्ल से "शही जरूर" लग रहे थे
बोले राजनैतिक ताकत का अर्थ धन-धान्य से परिपूर्ण पृथ्वी के ऐश्वर्य का उपभोग करना
हैं। देखों हमने एक-दो नहीं तीन तीन शादियाँ की। यही हैं राजनैतिक हैसियत। तालेबानी तो मरने के
बाद जन्नत मे हूरों के साथ रहते हैं,
पाकिस्तानी प्रधान मंत्री इमरान खाँ, और मुझे को देखो इस बुड़ौती मे जीते जी हूरों के
साथ रह रहे हैं। अब क्या कहना है मिस्टर प्राईमिनिस्टर तुम्हें इस बारे मे?? इसका
भी राजनैतिक फ़ायदा नहीं उठा सके आप। पर हम
लोगो के बारे क्या विचार है बताये, जबाब दे??
और हाँ
हमारे एक "मनस्वी साथी", "ओजस्वी वक्ता", "तेजस्वी पात्र", गाय-भैंसो के चारे पानी के इंतजाम के कारण नहीं आ
सके उनके सहित हम सभी आप को चेतावनी देते
हैं आप अपनी रीति-नीति बक्त के साथ बदल लो और प्यार से बापस जाकर "दिन गुजारों
गुजरात में", बर्ना हम सभी इक्कठे होकर तुम्हें इस
चुनाव मे सबक़ सिखायेंगे। जब हम देश को उंच-नीच, ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्य, शूद्र
मे बाटेंगे? और जातिवादी कार्ड खोलेंगे आपकी देशभक्ति धरी की
धरी रह जायेगी। देश मे सैकड़ो साल से अंग्रेज़ो ने ऐसे ही राज्य नहीं
किया हम उनकी इस राजनीति के सच्चे
ध्वज वाहक हैं! क्या समझे??
और
यदि फिर भी तुम नहीं समझे तो ब्रह्मास्त्र के रूप मे धर्म निरपेक्षता का शस्त्र छोड़ेगे।
हम तुम्हें बताना चाहते हैं कि हम बड़े नीच
किस्म की राजनीति मे विश्वास करते हैं। हम
"अल्हा हो अकबर", "हर-हर महादेव", "जो बोले सो निहाल"
की राजनीति करेंगे हमारे पूर्वजों ने ऐसे
ही नहीं इस देश पर हजारों साल से राज्य किया????
नमस्कार!!!!
हम
हैं सच्चे धर्म निरपेक्ष राजनैतिक दल के सदस्य।
विजय सहगल
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