बुधवार, 20 मार्च 2019

होली का अंतर




"होली का अंतर"

साठ की होली।
ठाठ की होली ॥
ईक्षा पूरी।
न जी हजूरी॥  
न समय का चक्कर।
न जुल्म से टक्कर॥  
आस अधूरी।
तनखा पूरी॥    
तभी सवेरा, जब आंखे खोली।
साठ की होली ठाठ की होली॥

रोज नई शाखायेँ ढूंढ़ी।
आंखे हो गई आधी बूढ़ी॥
समझे थे जिसको हम शान।
प्रतिकार मिला, बिन-बुला मेहमान॥
अपना राज, अब अपनी खोली।  
साठ की होली, ठाठ की होली॥

मतांतर जब हो।
लोकतन्त्र ही तब हो॥   
काम-काम का करें जो शोर।
हमें छोड़ बाकी सब चोर॥  
छेद पच्चीसों, नैया डोली।
साठ की होली, ठाठ की होली॥

नाक कान थे हम सारे।
नगरी-नगरी, दुआरे-दुआरे॥  
कहने को आज़ादी, ....पर दूर।
हम सब थे बंधुआ मज़दूर ॥  
समय ने जब जंजीरे खोली।  
साठ की होली, ठाठ की होली ॥
           
          -विजय सहगल

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