"गणेश बिजली भंडार"
सरमन लाल एंड संस, जी हाँ
यही नाम था उस फ़र्म का जिसकी दूसरी पीढ़ी की संतान उस समय दुकान की गद्दी पर बैठी
थी जो दुकान शहर के बीचों बीच मुख्य बाज़ार मे स्थित थी। दुकान की गद्दी पर बैठा वह
बालक अपने आपको किसी शहँशाह से कमतर नहीं समझ रहा था जिसकी दुकान मे बेचने लायक
माल के नाम पर कुछ भी नहीं था पर दुकान के गल्ले मे कुछ आने-दो आने पड़े हुए थे।
सड़क के पार चौराहे पर गज़क मूफली भुने चने-लाई की दुकान थी। गुल्लक मे से एक आने की
गज़क लाकर गद्दी पर बैठ कर अपने भाई के साथ बड़े शान से स्वाद लेकर खा रहा था। वह खाते हुए ऐसा महसूश कर रहा मानो दुनियाँ का
सबसे बड़ा व्यापार घराने का वारिस सुबह का नाश्ता ऑफिस मे बैठ कर कर रहा हो। उस
दुकान को लेकर उस बच्चे ने बड़े-बड़े सपने देख रखे थे। उस का मन था बड़े होकर इस
दुकान मे डॉक्टर बन कर एक क्लीनिक खोलने का था, जिसकी शुरुआत
उसने विज्ञान के विषयों के साथ अपनी पढ़ाई की दिशा तय कर की थी। दिन
कुछ यों ही निकल रहे थे। भारतीय मध्यम वर्गीय परिवारों का दुर्भाग्य है कि कुछ
अतिरिक्त आमदनी की लालच मे वे अपनी कीमती
संपत्ति को दाँव पर लगाने मे नहीं चूकते।
उस बालक के साथ भी बही हुआ था। दादा जी की उम्र काफी थी अतः व्यवसाय करना उन के बश
मे न था। पिता जी सरकारी सेवा मे होने के कारण व्यापार मे समय नहीं दे सकते थे। बच्चे
उम्र की उस दहलीज़ पर थे कि व्यापार की समझ
के लिये उम्र और अनुभव दोनों ही आड़े आ रहे थे। अतः दूर दराज से उस लड़के के पिता से मित्रता निकाल
कर एक व्यक्ति ने दुकान पर नया व्यवसाय शुरू करने के लिये एक नई पार्टनरशिप फर्म का गठन किया गया। एक नई उम्मीद जागी थी उस दिन
उस बालक के मन मे। आशा की एक किरण के रूप मे एक नये भविष्य का आरम्भ हो रहा था उस
दिन। हालांकि उस लड़के के दिल मे एक वेदना थी कि
अपने दादा की फर्म सरमन लाल एंड संस की जगह जब एक नयी फर्म गणेश बिजली
भंडार का बोर्ड दुकान पर लगाया गया। इस
तरह एक नये लेकिन एक अनिश्चित अध्याय का
आरंभ हुआ था उस दिन। लेकिन शीघ्र ही जीवन
की कड़ुवी सच्चाई से बालक को रूबरू होना पड़ा जिसकी नीव झूठ और फ़रेब के आधार पर रखी
गई थी। जंगल मे जैसे चालाक लोमड़ी वेबश
छोटे जानवरों का शिकार करती है वैसे ही उस लाचार लड़के के सपनों का शिकार कानूनी दाँव -पेच के रूप
मे नज़र आने लगा। एक ना खत्म होने बाले मुक़दमे की शुरुआत हो गई थी। दुकान पर कब्जे के रूप मे ताला भागीदारी फर्म का
था लेकिन ताले की चाबी तथाकथित गणेश बिजली
भंडार के पास थी। चंद दिनों पहले जो बालक दुकान की गद्दी पर शान के साथ बैठ भविष्य
के सपनों मे खोया रहता था। आज बह वास्तविक
ज़िंदगी मे दुकान के नीचे सड़क पर था, सपने बिखर गए थे, उम्मीदें टूट गई थी और आरम्भ था एक संघर्ष का जिसके साथ अब उसे बड़ा होना
था। दुकान दूसरे पक्ष द्वारा हड़प ली गई थी!!
अब
उस के पास विषय तो विज्ञान के थे लेकिन ज्ञान कुछ और तलाश कर रहा था। प्री मेडिकल टेस्ट
का अधूरा भरा आवेदन फॉर्म आज भी उसके महात्वपूर्ण कागजों के साथ फ़ाइल मे पड़ा है जो
उन टूटे सपनों का साक्षात गवाह हैं। दुकान से जहाँ कुछ अतिरिक्त कमाई की उम्मीद थी
बही मुक़दमेबाज़ी मे पिता की स्थिर कमाई का कुछ हिस्सा खर्च के रूप मे बढ़ने लगा।
परिवार मे सभी सदस्यों को इस आर्थिक संघर्ष
से सामना करना पड़ा। परिवार का हर एक सदस्य अपने-अपने तरह से इस संघर्ष को लड़ रहा
था। उस बच्चे का अब लक्क्ष डॉक्टर बनना नहीं था अपितु शीघ्र से शीघ्र रोज़गार की
तलाश कर परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी मे सहभागी होना था। इस हेतु प्रयास भी उसने
टायपिंग और शॉर्ट हैंड सीखने के रूप
मे शुरू कर दिये थे। दीपावली पर आतिशबाज़ी
की दुकान लगाना, दादाजी द्वारा किये गये घी तेल का व्यवसाय को
करने मे एक साल का समय और आर्थिक नुकसान
के रूप मे पैसा गवा कर उठाना पड़ा। इस कारण उस बालक का स्नातक पूर्व इंटर की
परीक्षा मे असफलता का मुह देखना पड़ा। परिवार के बड़े सदस्य द्वारा छोटी-मोटी नौकरी के लिये 12-14 घंटे मेहनत कर परिवार को
आर्थिक रूप से सुढ़्रद करना था। इस लंबे संघर्ष के लिये सीधे-सच्चे व्यक्ति के
साथ झूठ-फ़रेव, धोखा
और बदनीयत से व्यवहार करने बाले लोगो द्वारा कानून का दुर्पयोग कर दुकान को हड़प कर जाना
केवल एक व्यक्ति, उस पूरे परिवार को अपने स्वार्थ और लाभ के
लिये संघर्ष और गरीबी मे धकेलने का कुत्सित कार्य
था बल्कि धोखा देकर मानवता की हत्या करना था जिसमे सांझेदारी फर्म का दूसरा पक्ष कानूनी रूप मे सफल अवश्य हो गया किन्तु उक्त बालक का मुकदमा आज भी परम
परमेश्वर परमात्मा की अदालत मे लंबित है??
विजय सहगल
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