शनिवार, 24 अगस्त 2024

सावन का महिना और बृंदावन की गलियाँ

 

"सावन का महिना और बृंदावन की गलियाँ"










सावन का महिना और वृन्दावन की गलियों मे बांके बिहारी के दर्शन करना शारीरिक ही नहीं मानसिक रूप से भगवान कृष्ण के भक्ति भाव मे सरावोर होने जैसा हैं।  इस भक्ति रस की बरसात मे मुझे भी 21 अगस्त 2024 को भीगने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लक्ष्य सिर्फ वृन्दावन, बाँके बिहारी जी के दर्शन ही था। जिस भूमि मे  भगवान कृष्ण की जन्मस्थान और बाल्यकाल बीता हो वहाँ अन्य देवताओं के साथ साक्षात भगवान श्रीराम न हों, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। कार को एक सुरक्षित स्थान पर छोड़ हम बमुश्किल दस कदम बड़े ही थे कि राम दूत हनुमान की बानर सेना के नायकों से साक्षात्कार हो गया। एक बंदर ने, हमारे बहनोई सुनील जी के कांधे पर उछलते हुए उनकी आँखों का  चश्मा छीन, एक दुकान की मुंडेर पर बैठ कर चश्मे का अंग-भंग का प्रयास शुरू कर दिया। अचानक से हुए इस देव दर्शन से हम सभी हतप्रभ थे! लेकिन हम सब ने अपने आप को संयत कर शांतिपूर्वक उनकी उपस्थिती को स्वीकारते हुए, चश्मा रूपी समस्या से निवृत्ति के उपाय सोच ही रहे थे कि अचानक कुछ स्थानीय रहवासियों ने समाधान की कुंजी के रूप मे फ्रूटी का सुझाव दे डाला!! लेकिन चारों तरफ निगाह डालने पर समोसे, कचौड़ी, पूड़ी, पराँठे तो दिखाई दिये पर फ्रूटी कहीं भी नज़र न आयी। अब तक बंदर भी भेंट-पूजा न मिलने पर चश्मे के नोज़ पैड को अपना कोप भाजन बना चुका था, अब तक एनक की दोनों डंडियों पर चढ़ी रबर के कवर को निकाल फेंक चुका था। चश्मा नज़र का था, जिसके बगैर एक कदम भी चलना मुश्किल था। बहनोई साहब, फ्रूटी की तलाश मे भटक रहे थे कि अचानक एक किशोर, अर्जुन ने फ्रूटी दिखाते हुए उसकी कीमत 100 रुपए बताई? मैंने बंदर और किशोर, दोनों को  प्यार की  झिड़की देते हुए बीच  का रास्ता  निकालने का आग्रह किया, बंदर पर तो कुछ असर नहीं हुआ, लेकिन किशोर ने झट से स्वीकृत समाधान निकाल 50 रुपए मे सौदा तय कर लिया और फ्रूटी को बंदर की तरफ उछला!! परिणाम मेरे लिये भले ही अप्रत्याशित था पर किशोर के लिये फ्रूटी देने के नतीजे पूर्णत: अपेक्षित थे। बंदर ने जैसे ही फेंकी गयी फ्रूटी को पकड़ा, उसने तुरंत ही चश्मे को नीचे गिरा दिया। बंदर मे विकसित हुई इस लेन-देन और किशोर अर्जुन का, आपदा मे अवसर तलाशने की इस नीति का मै कायल हो गया।

चश्मे की घटना से मिले इस सबक ने हम सब मे एक सावधानी का अहसास करा दिया। हम सभी अपना मोबाइल, पर्स, चश्मा बैग को रखने के अतिरिक्त एहतियात के साथ आगे बड़े। गलियों के अंदर छोटी गली और उसके भी अंदर अति छोटी गली से होते हुए हम बाँके बिहारी मंदिर की ओर अग्रसर होते रहे। छोटी और पतली गलियों मे पूजन सामाग्री, खाने और नाश्ते  के अलावा अधिकांशतः सिर्फ मिठाई की दुकानों ही दिखाई दी। सुंदर और स्वच्छ मिठाई निश्चित ही स्वादिष्ट भी होंगी, डायबिटिस की बीमारी की सीमा रेखा न होती तो आपको मिठाइयों के  स्वाद का विवरण भी देता।

अब तक हम लोग मंदिर के प्रवेश द्वार पर थे। ऐसी किवदंती हैं कि बाँके बिहारी मंदिर मे स्थित यह मूर्ति स्वयं प्रकट हैं। काले पत्थर से बनी इस  मूर्ति को निधिवन से,  भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त स्वामी हरिदास ने खोजा था। कालांतर मे इस मूर्ति को 1864 के आसपास निर्मित इस मंदिर मे लाया गया। ऐसी मान्यता हैं कि संत स्वामी हरिदास जी, भगवान श्रीकृष्ण को  बाल्य रूप मे पूजित करने के कारण उनके आराम का पूरा ध्यान रखते थे इसलिए इस मंदिर मे प्रातः काल का  मंगलाचरण अर्थात सुबह की आरती नहीं होती एवं मंदिर के अंदर घंटियाँ नहीं लगी ताकि भगवान को परेशानी न हो। वर्गाकार आकृति मे निर्मित इस मंदिर मे तीन  ओर से प्रवेश द्वार बने हैं। मंदिर मे प्रवेश करते ही एक आयताकार बरामदे मे श्रद्धालु प्रवेश करते हैं जो चारों दिशाओं की तीन-तीन द्वारों अर्थात बरादरी के माध्यम से एक बड़े आँगन मे खुलता हैं। काले सफ़ेद संगमरमर के वर्गाकार पत्थरों से निर्मित आँगन का  धरातल बाहरी बरामदे से 3-4 सीढ़ियाँ नीचे होने के कारण श्रद्धालु आराम से भगवान बाँके बिहारी जी के दर्शन अपने अपने स्थान से, आसानी से  कर सकते हैं। गर्भग्रह मे विराजित भगवान के दरबाजे और दिवारे चाँदी जड़ित हैं। हर मिनिट मे हजारों भक्तगण अपने आराध्य के दर्शन करते हैं। सेवक, पुजारी हर कुछ मिनिटों के अंतराल के  बाद कुछ क्षणों के लिये गर्भ गृह का पर्दा डाल देते हैं ताकि भगवान के बाल्य रूप को किसी की नज़र न  लग जाय।  लाल बालुई पत्थरों से निर्मित मंदिर का आँगन और उसके ऊपर चारों दिशाओं मे बने झरोखे (बालकनी) जितने  बारीक नक्काशी दार जालियों से बने हैं उतने ही मुख्य द्वार के बाहर बनी तीन मंज़िला आकृति, वास्तु का सुंदर और अनोखा उदाहरण हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के दोनों ओर भी पत्थरों के नक्काशीदार स्तंभों पर अर्धगोलाकार मेहराब युक्त छोटे झरोखे बनाए गये हैं।  मनभावन, मनोरथ दर्शन के पश्चात मंदिर के तीन नंबर द्वार से हम लोग बाहर आ गये। यध्यपि पूरे वर्ष रहने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ उतनी नहीं थी जितनी अष्टमी, एकादशी या अन्य विशेष पर्वों पर होती हैं। मंदिर के आँगन मे अनेकों एक्सॉस्ट पंखे लगे होने के बावजूद कभी कभी अनियंत्रित भीड़ के कारण  कुछ अप्रिय हादसे भी हो चुके हैं, जो दुःखद हैं।

दर्शन के पश्चात बापसी मे पतली पतली गलियों से निकलने के दौरान सुगंधित और  स्वादिष्ट मिष्ठानों की खुशबू से जब बच निकलना मुश्किल हो गया तो एक छोटी सी, राधे-राधे पेड़े वाले की दुकान मालिक से प्रहलाद से मैंने कह ही दिया, "भाई तुम से बड़ी शिकायत हैं", इन गलियों से मेरा दस मिनिट निकलना मुश्किल हो गया, मुँह मे बार बार पानी भर जाता हैं। तुम कैसे दिन भर स्वादिष्ट मिठाइयों के बीच शांत, बैठे रहते हो? सभ्य और सुसंस्कारित युवक प्रह्लाद ने हाजिर जबाबी से मुझे लाजबाब कर दिया!! सर, जब मिठाई देख कर मुँह मे पानी आ रहा तो  पानी देख कर, मुँह मे मिठाई आना चाहिये? और मुस्कराते हुए लौकी की बर्फी मेरे तरफ बढ़ा दी!! इसके बाद तो उसने एक के बाद एक कलाकंद, पेड़ा, घेवर और बर्फी  की झड़ी लगा दी!! मै आया तो था, मिठाई वाले को अपने जाल मे फँसाने, लेकिन मै खुद ही डाईविटीज के बावजूद प्रहलाद मिठाई वाले  के जाल मे फंस गया!! और घेवर खरीद का ऑर्डर दे दिया।          

सुबह के वक्त भीड़ के बावजूद गलियों मे पिछले दिन के कचरे को सफाई कर्मी पूरी मेहनत और लगन से गलियों को साफ रखने के यतन कर रहे थे। लेकिन इन व्यक्तियों के भरपूर प्रयास तब छोटे पड़ जाते हैं जब हम भारतीय कचरे के डिब्बे लगे होने के बावजूद अनुपयुक्त कचरा डिब्बों मे न डाल कर यहाँ वहाँ फेंक देते हैं। इन सफाई कर्मियों द्वारा गलियों की सफाई को बड़ी  मेहनत और लगन से साफ करता देख मैंने उन लोगो का परिचय प्राप्त किया। चैनु, लेखी, परमेश्वर और खेरे को जब हमने बताया कि मंदिरों और  वृन्दावन की इन  गलियाँ की साफ, सफाई महत्व इसलिए हैं क्योंकि सफाई मे आप लोगों का महत्वपूर्ण योगदान हैं। हम भगवान बाँके बिहारी के दर्शन श्रीमद्भगवत गीता के श्लोक ...........योगक्षेमं वहाम्यहम् के भाव के अनुरूप इसलिए अच्छी तरह से कर सके, क्योंकि उनके दर्शन तक के मार्ग को आपलोगों ने अपनी मेहनत से साफ सुथरा कर दिया। कुछ पलों के लिये उन सफाई कर्मियों के चेहरे पर उभरे खुशी और उनके महत्वता के अहसास के भाव ने उनके साथ मुझे भी कुछ क्षणों की खुशी दे दी। इस सुखद पलों को मैंने अपने मोबाइल मे कैद करने का प्रयास किया।  

बापसी के दौरान फ्रूटी प्रेमी बंदर के एक बार फिर दर्शन हुए जो एक महिला के पर्स और उसमे रक्खे मोबाइल और स्वर्ण कुंडल को नुकसान पहुंचाने मे प्रयासरत था। लेकिन बंदर के लिये स्वर्ण और पत्थर समान थे वह तो अनासक्त भाव से फ्रूटी के लिये पर्स के विनाश के लिये तत्पर था। लेकिन यहाँ भी फ्रूटी मिलते ही बंदर ने छिन्न-भिन्न पर्स के साथ महिला का मोबाइल और स्वर्ण कुंडल फेंक दिये। इसलिये कृपया वृंदावन मे भ्रमण के दौरान अतिरिक्त सावधानी बरते। अन्य पर्यटन या धार्मिक स्थलों की तरह शौञ्च की समस्या के समाधान की भी कमी यहाँ भी महसूस की गयी। जागरूक धर्मावलम्बियों और प्रशासन से  इस संबंध मे कार्यवाही अपेक्षित हैं।        

विजय सहगल

             

4 टिप्‍पणियां:

Sanjay kumar jain ने कहा…

बहुत सुन्दर यात्रा वृतांत!🙏🏻🙏🏻

बेनामी ने कहा…

Very good Yatra

बेनामी ने कहा…

यात्रा का सुंदर चित्रण , फ्रूटी प्रेमी बंदरों से मुझे भी दो _चार होना पड़ा था।
प्रशासन को इस संदर्भ में समुचित प्रयास करना चाहिए।

बेनामी ने कहा…

*योगेश्वर श्रीकृष्ण की बाल-लीलाओं को अपने इतिहास में समेटने वाले वृन्दावन की तीर्थ-यात्रा का रोचक वर्णन पठनीय है।*
*अब जहां श्रीराम या श्रीकृष्ण रहे हों,बंदर बहुतायत में होंगे ही।इसके अलावा बंदरों को तंग गलियां ज्यादा रास आती हैं ताकि इधर-उधर छलांगे लगाने का लुत्फ उठाया जा सके।वो बंदर ही क्या जिसमें चपलता न हो।*
👍👍👍🌹🙏🌹
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा, ग्वालियर