शनिवार, 17 अगस्त 2024

निरुआ अर्थात "निरुद्देश्य यात्रा"


                                                         निरुआ अर्थात "निरुद्देश्य यात्रा"







शहरों और महानगरों मे बेशक आती या जाती हुई रेल को देखना कोई अचरज न हो पर गाँव, देहात या छोटे कस्बों से निकलती हुई रेल लाइन पर जाती या आती हुई  रेल गाड़ी और माल गाड़ी को देखना मेरा प्रिय विषय रहा हैं। पहली वार मै अपने बाबा के साथ झाँसी रेल स्टेशन पर खड़ी एक यात्री गाड़ी मे बैठा था जिसका खाली रैक यूं ही प्लेटफॉर्म  पर खड़ा था, क्योंकि मेरे पिता जी रेल विभाग मे सेवारत थे। मेरे पिता जी की पदस्थापना के दौरान, बचपन मे, मैं प्रायः,  राजा की मंडी, आगरा स्टेशन के किसी कोने की बेंच पर या अपने रेल आवास के उस दरबाजे पर, जहां से यात्री गाड़ी या माल गाड़ी दिखाई देती, उसको आते-जाते घंटों निहारा करता था। वो कोयले वाले इंजिन का दौर था। हम गोल मुंह वाले इंजिन को सुस्त और धीमी गति का वाला मानते थे और नुकीले इंजिन को तेज गति का मानते थे, क्योंकि उन दिनों ताज एक्स्प्रेस शुरू हुई थी, जिसको नुकीले इंजिन से चलाया जाता था।  पहली वार वातानुकूलित चेयर कार के डिब्बे मे दो कदम अंदर जाकर जो ठंडक मैंने महसूस की थी आज भी मुझे याद हैं। उस दिन मेरे आश्चर्य और उत्साह का ठिकाना न था। यात्री गाड़ी और माल गाड़ी को देखने का नज़रिया और मन मे आने वाले भाव भी अलग होते थे। यात्री गाड़ी मे जहां चहल-पहल और जीवंतता थी, चाय वाला चाय....... की सार्वभौमिक,  आवाज कश्मीर से कन्या कुमारी तक एक भाषा, एक लय और एक स्वर मे सुनाई दे जाती थी। कैसे यात्री गाड़ी के आते ही, रेल स्टाफ डिब्बों के उपर चढ़कर उसके उपर लगे नलों मे पाइप लगा कर पानी भरता और नीचे तकनीकि विभाग का कर्मचारी, लंबे डंडे मे लगी छोटी हथौड़ी से डिब्बे के एक ओर लगे हर डिब्बे से टकराकर टन्न की आवाज उत्पन्न करते। उस टक्कर से निकलने वाली आवाज की गूंज हमारे चेतना पटल पर अव भी ताजी हैं। इस तरह हथौड़ी से पहिये को टकराने का प्रोयजन मै आज तक नहीं जान पाया।    

14 अगस्त 2024 को अपने ललितपुर प्रवास के दौरान निकला तो था, चहल कदमी करते हुए भ्रमण पर जाने को, लेकिन एक रेल अंडर ब्रिज पर बनी सीढ़ियों को देखते ही, कदम अनायास ही रेल पटरियों की तरफ बढ़ चले। चंद कदमों की चढ़ाई के बाद मै आज दशकों बाद फिर रेल पटरियों के पत्थर और गिट्टियों से भरी पगडंडी पर था। निरुद्देश्य, अंजान अजनबी रस्तों पर चलना आज अच्छा लग रहा था। दूर दूर तक चमकती लाल बत्तियों के बीच चलना,  मन मे कुछ जिज्ञासाओं और सवालों के साथ नव उत्साह  को जन्म दे रहा था, इसी बीच दूर सामने से आती हुई, यात्री गाड़ी की तेज आवाज सुनाई दी, जो धड़-धड़ाती हुई मेरी तरफ ही चली आ रही थी। चिंता की कोई बात नहीं थी, रेल लाइन से दूर खड़े होकर ललितपुर से खजुराहो जा रही, इस जाती हुई सवारी गाड़ी के साथ सेल्फी लेने का प्रयास किया जो असफल रहा क्योंकि शायद मै इस विद्या मे उतना प्रवीण या पारंगत नहीं हूँ।

एक बात तो माननी पड़ेगी कि आज से एक दशक पूर्व कश्मीर से कन्याकुमारी तक, जब गाँव या देहात से जा रही रेल लाइन के किनारे चलने पर, जगह जगह स्त्री पुरुष शौंच के लिए बैठे मिल जाते थे और लाइन के किनारे मानव मलमूत्र जहां तहां देखने को मिल जाता था, बड़ी घिन आती थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की एक दशक पूर्व शुरू हुई हर घर शौंचालय योजना ने लाइन पर शौच करने वालों की संख्या की कमी ने, बड़ी अहम भूमिका निभाई।  इस उद्देश्य हीन भ्रमण मे एक भी व्यक्ति शौंच करते या रेल लाइन किनारे मानव माल-मूत्र दिखाई नहीं दिया। निश्चित ही इस कार्य की सराहना की जानी चाहिए।

रेल लाइन के किनारे रेल विभाग की मशीनरी और उपकरण मे कुछ धातु या इलैक्ट्रिकल पार्ट्स की चोरी होना आम बात थी। पिछले दशकों मे इसमे काफी बदलाब हुए। रेल लाइन के किनारे एक लोहे के बॉक्स पर लिखी इबारत देख कर मै ठिठक गया। किसी रेल कर्मचारी की सकारात्मक सोच के संदेश को पढ़ कर दिल खुश हो गया। उस बॉक्स के बाहर लिखा हुआ था, "हमारे पास कुछ नहीं है, हम खाली हैं!! उक्त संदेश के माध्यम से, जैसे बॉक्स, चोर या उठाईगीर से कह रहा हो, "मुझे तोड़ने या खोलने का प्रयास न करें"? 

कभी सीमेंट के स्लीपरों पर चलकर, कभी गिट्टी पत्थरों पर सम्हल-सम्हल कर पैर जमाकर, मंथर गति से चलना एक नया अनुभव और नया अहसास करा रहा था। इस भ्रमण के दौरान उत्तर दक्षिण से आने जाने वाली एक जोड़ी लाइन एवं खजुराहो की लाइन, निर्माणाधीन, कुल मिला कर चार-पाँच लाइनों पर एक दो मालगाड़ी और यात्री गाडियाँ  गुजरी। रेल यात्रा के दौरान जब कभी मुझे, लाइन किनारे एकांत, निर्जन और वीराने मे  चलने वाले व्यक्तियों को देख जो संवेदना और सहानुभूति का भाव जाग्रत होता है, आज बैसी  ही अनुभूति, शायद रेल यात्री मुझे देख कर कर रहे होंगे!! रेल किनारे खड़े होने या रहने का एक अलग ही अध्यात्मबोध होता है, बेशक अल्प आबादी वाले गाँव देहात हों या निपट अकेले रेल लाइन के किनारे चल रहे हों पर रेल लाइन, सारे देश से जुड़े रहने का अहसास दिलाती हैं जैसे सारा देश आपके साथ खड़ा हैं और हम सारे देश के साथ!!

इन्ही उधेड़-बुन और विचारों के सैलाब मे तैरते-उतराते और गोता लगाते निरंतर आगे बढ़ा चला जा रहा था। अब तक मै प्लेटफॉर्म के नजदीक पहुँच गया था। एक कोयले की मालगाड़ी खजुराहो की दिशा मे जाने को तैयार थी। इंजिन का ड्राईवर, गेट पर खड़े होकर सिग्नल मिलने का इंतज़ार कर रहा था। अचानक मन मे सेल्फी का कीड़ा फिर कुलबुलाने लगा। यध्यपि मै इस बीमारी से कोसों दूर हूँ फिर भी इंजिन को कवर करते हुए, रेल लाइन के किनारे हो कर सेल्फी लेने लगा पर अपने को थोड़ा और साहसी दिखलाने के लिये मैने  बिल्कुल रेल लाइन के बीच मे खड़े होकर फटाफट एक सेल्फी ले डाली!! हालांकि खड़े हुए इंजिन के सामने से सेल्फी लेने मे कहीं भी किसी तरह के खतरे, संकट की शंका नहीं थी फिर भी कुछ क्षणों के लिये भी खड़े होकर सेल्फी लेने पर मन ही मन डर, भय आशंका बनी रही। मेरे द्वारा सेल्फी का उक्त सुरक्षित ड्रामा था, पर इस तरह के जीवंत  प्रयास कदापि न करें। पता नहीं लोग चलती ट्रेन  के किनारे या उसके पास आकर  कैसे सेल्फी लेने का दुस्साहस करते हैं और कभी कभी अपनी जान गँवा देते हैं। निश्चित ही इस तरह के आत्मघाती कृत्य कर अपने जीवन को संकट मे डालना महा मूर्खता हैं अतः ऐसा कभी न करें।

इंजिन के ठीक पीछे लगे गार्ड के डिब्बे को देख मुझे, 28 सितम्बर 2018 को लिखे अपने ब्लॉग "मालगाड़ी" के रोचक प्रसंग  की याद हो आयी, आप भी उक्त प्रसंग का आनंद उठा सकते हैं।  ( https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_44.html )

अब तक रेल लाइन के किनारे-किनारे चलते कुछ थक गया था। प्लेटफॉर्म के एक सिरे पर बैठ सुस्ता ही रहा था कि कुछ महिलाएं, पुरुष और बच्चों का समूह निकट ही आ कर जमीन पर बैठ गया। राम-राम से अभिंवादन की  सामान्य औपचारिकता के बाद जब मैंने उन लोगो का परिचय पूंछा। प्रकाश नमक व्यक्ति जो ग्राम कडेसरा कलाँ, तालबेहट के निवासी थे। कुछ दिन पूर्व अपनी माँ के देहावसान के पश्चात उनकी  पवित्र अस्थियों को त्रिवेणी मे विसर्जन के लिये अपने भाई, बहिनों, भतीजे और भांजों के साथ प्रयाग जा रहे थे। करीब 15-17 लोगो का समूह था। समाज के वंचित वर्ग से आने वाले प्रकाश के परिवार के सभी लोगों से मुलाक़ात यध्यपि भावुक माहौल मे हुई। अपनी  माँ के प्रति उनकी,  भावनाओं और सम्मान को देख, उन्हे अपने रीति और परम्पराओं को पालन करते देख मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया। प्रकाश की  लगभग सौ वर्षीय उनकी स्वर्गीय माँ को अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने के दौरान मन के किसी कोने मे मुझे भी अपनी स्वर्गीय माँ का स्मरण  हो आया, जो पिछले वर्ष 19 जून को हम सब को छोड़कर परलोक गमन कर गयीं थी।                              

आज की इस अंजान और अजनबी, बिना किसी उद्देश्य के निरुद्देश्य यात्रा यादगार बन गयी। इस यात्रा से  एक सुखद अनुभूति, एक नया अनुभव और एक नवीन अनुमान की दिशा और दशा प्राप्त हुई जो ताउम्र याद रहने वाली है।  

विजय सहगल

5 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सहगल जी आपके शानदार लेखन को सलाम।
मुझे भी बचपन में आपकी तरह रेलगाड़ी चलते हुए देखना अच्छा लगता था। जब गाड़ी आने का समय होता था तो उससे कुछ पहले मैं और मेरे कुछ दोस्त रेलवे लाइन पर एक सिक्का रख देते थे। बाद में जब रेलगाड़ी उस लाइन के ऊपर से गुजरती थी, तो वह सिक्का बड़ा होकर चांद के आकार का बन जाता था उस सिक्के को देखकर हम सभी दोस्तों का मन बहुत हर्षित होता था।
--शंकर लाल खत्री, मन्दसौर (म.प्र.)

बेनामी ने कहा…

अच्छा स्मरण
आपके ब्लोग लम्बे होते हैं

बेनामी ने कहा…

आपके ब्लॉग पड़कर अपना बचपन याद आगया। बचपन में हम आद्रा (जिला पुरुलिया, पश्चिम बंगाल) में रहते थे। 1963 से 1971 तक विशाखापत्तम में पढ़ाई के लिए गए थे। हर 6 महीने में वहां से आद्रा का सफर हुआ करता था। खड़गपुर तक एक गाड़ी वहा से अलग गाड़ी पकड़ना पड़ता था। एक छोटा सा लोहे का बक्सा लेकर सफर करते थे क्यों की जनरल बोगी में सीट नहीं मिलने पर उस बक्से पर ही बैठ जाते थे एवं 800 km का सफर पूरा करते थे
राजेश्वर राव पेरि विशाखापट्टनम

बेनामी ने कहा…

बहुत सुंदर संस्मरण और शैली ।

बेनामी ने कहा…

आगरा और राजा की मंडी छोटी उम्र में हमारा आना जाना लगा रहता था।tundla jn में ताऊ जी के लड़के guard की नौकरी करते थे।टिकट लेना सख़्त मना था।पर दिल में डर लगा रहता था कहीं पकड़े ना जाएँ ।यह बात १९६० के क़रीब की है.। हम दौड़ कर १up/ २dn kalka mail ko dekhne station पर जाते थे। पुरानी यादें हैं ।
रंजीत सिंह। नोयडा