"छोटी
बुआ"
कभी कभी बचपन की कोई घटना कुछ सीख के साथ कुछ
ऐसा दर्द और वेदना दे जाती है कि जीवन भर याद
रहती है, ऐसी घटना के दुबारा
घटने की कोई संभावना ही नहीं रह जाती। मेरी उम्र 5-6 वर्ष रही होगी या आगे पीछे भी
हो सकती है ठीक से याद नहीं पर घटना का घटना क्रम शब्दशः याद है। मेरी छोटी बुआ
जिनका ससुराल मेरे घर से चालीस-पैतालीस किमी दूर तालबेहट मे था। बुआ साल मे एक-दो
बार अपनी ससुराल से अपने गृह नगर अर्थात अपने/मेरे घर आती थी। मेरी माँ और बड़ी बुआ बताती थी कि जब
उनकी शादी हुई थी मेरी उम्र बीस दिन ही थी। इस बजह से उन्हे अपने नन्हें भतीजे
अर्थात मुझसे से विशेष स्नेह था। लेकिन ये भी उतना ही सत्य है मुझे भी अपनी बुआ से
उतना ही प्यार और स्नेह था। बचपन मे तालबेहट मे गर्मियों की छुट्टी मे प्रायः उनके
घर जाना होता। शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब कोई न कोई व्यंजन,
चाट, पकौड़ी,
मिठाई आदि उनके द्वारा न बनाई जाती हो।
जब भी बुआ घर आती उन्हे घर पर रहते देखना
मुझे बहुत अच्छा लगता। मै ये अच्छी तरह से जनता हूँ कि मेरा स्वभाव परिवार मे
ज्यादा बोलने चालने या बातूनी बालक का न था। लेकिन घर पर परिवार के सदस्यों को
देखना या उनके साथ मूक दर्शक की भांति समय व्यतीत परिवार के अन्य सदस्यों का बातचीत
एवं गपशप करते देखने/सुनने से उपजी सुख की अनुभूति को मै शब्दों मे ब्याँ नहीं कर सकता। कमोवेश आज
भी स्थिति ऐसी ही है। छोटी बुआ का घर आना मुझे कई तरह की खुशियाँ देता उनमे एक तो बुआ का
अपने साथ मिठाई लाना, उनके रहते रोज
पकवान, चाट,
व्यंजन आदि का बनने के साथ रोज उनसे कुछ पैसे का मिल जाना भी होता जिसका
उपयोग पतंग,
मांजा, चरखी आदि खरीदने मे या गोलगप्पे खाने मे होता।
बुआ के रहते शैतानी और शरारत करने पर भी अम्मा से पिटाई आदि से सुरक्षा की गारंटी उनके
रहते बनी रहती। कब और कैसे हफ्ता दस दिन
निकल जाते पता ही नहीं चलता। ऐसा नहीं था कि छोटी बुआ के चलते बड़ी बुआ से स्नेह या
अपने पन मे कोई कमी रहती, चूंकि बड़ी बुआ
की ससुराल स्थानीय होने से उनसे मिलना जुलना अमास-पूने (अमावस्या एवं पूर्णिमा) के
साथ भी हफ्ते मे दो-चार दिन मे हो ही जाता
था। लेकिन छोटी बुआ का राखी के अलावा दो-तीन अन्य मौकों पर सीमित दिनों के लिए ही
आना होता था। लेकिन जब बुआ बापस अपनी ससुराल जाती तो बड़ा बुरा लगता था,
ऐसा लगता था वे कुछ दिन और रुके।
ऐसे ही एक बार बुआ का झाँसी मे घर आना हुआ
और अपने प्रवास के बाद जिस दिन उनके बापस जाने की तैयारी होने लगी तो मैंने जिद की कि वे
अभी कुछ दिन और रुके लेकिन तैयारी हो चुकी थी। लोहे की सन्दूक का बक्सा मे कपड़े
आदि रख उपर से ताला लगा दिया गया। लेकिन हमे उम्मीद थी उनका बापस ससुराल जाना कुछ
दिन स्थगित हो जाएगा। बस स्टैंड तक बुआ के लोहे की सन्दूक को बड़े भाई साहब साईकिल
के पीछे कैरियर पर रख पैदल पैदल बस स्टैंड तक छोड़ आने के लिये तैयार थे। साईकल भी
घर से निकाल बाहर सड़क पर तैयार रख ली थी। तभी मेरे बाल मन मे शैतानी सूझी और मैंने
बुआ की एक चप्पल उठा, भाग कर घर की
पीछे बने कुएं मे फेंकने के लिये दौड़ लगाई ताकि बुआ अपने जाने के कार्यक्रम को
वेशक मेरी जिद पर ही सही एक ही दिन आगे बड़ा दे। घर के और सदस्य भी बुआ के साथ पीछे
पीछे कुएं की तरफ मुझे पकड़ने दौड़े। मैंने भी चप्पल को एक हाथ से पकड़ कुएं के अंदर
लटकाई और कहा कि बुआ एक दिन रुक जाए अन्यथा चप्पल को कुएं मे फेंक देंगे। लेकिन
कोई मानने को जब तैयार न हुआ तो मैंने कुछ भय और अशकाओं के चलते न चाहते हुए भी चप्पल कुएं मे डाल दी। मुझे विश्वास था कि चप्पल
रबर की है नहीं डूबेगी पर दिल ही दिल मे कहीं
ये डर भी था कि चप्पल कहीं कुएं के पानी मे डूब ने जाएँ?
पर जिसकी शंका थी वही हुआ चप्पल कुएं मे
गिरते ही धीरे धीरे कुएं मे डूब गई। अब तो हमे भी डर लगा गड़बड़ तो हो गई अब तो
पिटाई लगेगी? मुझे उम्मीद थी तैरती चप्पल
को कुएं से निकालने मे लगे वक्त के दौरान बस छूट जाएगी!! लेकिन एक ओर तो चप्पल से
वंचित बुआ परेशान थी और चप्पल के डूबने से मेरा मन भी बेचैन और अशांत था,
वहीं बस का समय होने और बस स्टैंड तक पैदल पहुँचने की जल्दी के चलते
बुआ ने बगैर चप्पल पहने ही बापस जाने का निर्णय ले लिया और हमारी शैतानी,
बेबकूफी और मूर्खता पर अफसोस के चलते वे घर से बस स्टैंड के लिये चल दी। पर बस पकड़ने
की आपाधापी ने उस दिन उन्हे बगैर चप्पल के
घर से जाने को मजबूर कर दिया था!!
मुझे अफसोस और दुःख इस बात का था कि चप्पल
आदि के नुकसान को नज़रअंदाज़ भी कर दे तो बुआ का घर से बस स्टैंड और वहाँ से अपनी
ससुराल नंगे पैर जाना मुझे आज भी पीढ़ा और दर्द देने वाला था,
जिसे मै आज भी नहीं भूला। मैं नहीं जनता
उस दिन उन्होने बस स्टैंड के जाते बीच रास्ते बाज़ार मे चप्पल खरीदी थी या नहीं?
मुझे मालूम है हमारी शरारत और मूर्खता को बुआ ने निश्चित माफ कर दिया होगा क्योंकि
वे अपने भतीजे से बेहद स्नेह करती थी जिसके चलते शायद ही उस दिन के बाद उन्हे इस
घटना को कभी जिक्र या याद भी किया होगा,
लेकिन इस घटना के दशकों बाद भी इस बेवकूफी पूर्ण घटना के लिये मै अपने आपको कभी
माफ न कर सका।
आज महिला दिवस पर उनको याद कर मै दुनियाँ की सबसे अच्छी महिला,
माँ समान अपनी स्वर्गीय छोटी बुआ का स्नेह स्मरण कर अपनी श्रद्धांजलि प्रेषित कर उन्हे
स्मरण करता हूँ। बुआ आज भी हम सभी तुम्हें
बहुत ही आदर और सम्मान के साथ स्नेह अभिवादन कर बार-बार
स्मरण करते है।
विजय सहगल

1 टिप्पणी:
Sundar yadey
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