"पहली समुद्र यात्रा"
अक्टूबर 1983 की बात थी बैंक की पहली एलएफ़सी
मे हम अपने अन्य दो साथियों अनिल रस्तोगी एवं संजीव टंडन के साथ लखनऊ से गोवा वाया
मुंबई घूमने का प्लान बनाया। हम लोगो की योजना कि इस एलएफ़सी मे जल,
थल एवं नभ की यात्रा को भी शामिल किया जाये और ऐसा हम लोग कर भी पाये। रेल की
यात्रा तो प्रायः अनेकों बार सभी कर चुके थे इसलिये रेल यात्रा मे वो रोमांच और
उत्सुकता न थी, हवाई यात्रा का ज्यादा
अनुभव न होने से गोवा से बापसी मे मुंबई यात्रा का रोमांच रहस्य,
उत्सुकता इसलिये गायब हो गई कि एयर बस की 3x4x3 अर्थात
दायें तरफ की खिड़की से बायें तरफ की खिड़की
के बीच दस यात्रियों की लाइन मे खिड़की की सीट से हम सभी वंचित रहे और मन मारकर बीच
की चार सीटों मे हम तीनों मित्रों को जगह मिली। इसलिये पहली हवाई यात्रा का वो उत्साह उमंग खिड़की से बहार खुले आसमान
और नीचे जमीन को तांक-झांक न कर सके। आसमान से जमीन पर खेत खलिहान,
झोपड़ी मकान, झील तालाब आधी देखने की
मन मे बनाई कल्पनाओं और कहानियों के सुख से वंचित जो रहे। इसलिए इस यात्रा का रोमांच
और खुशी का सपना खिड़की की सीट न मिलने के
कारण आधा अधूरा रहा अर्थात धरा का धरा रह गया। पर इस यात्रा मे पानी के जहाज की
मुंबई से गोवा की समुद्री यात्रा यादगार यात्रा बन गई।
उन दिनों सूचना तकनीकि इतनी प्रोन्नत नहीं
थी। मुंबई मे अनेकों लोगो से पूंछ-तांच्छ कर पानी के जहाज का टिकिट बुक करायी।
बुकिंग कार्यालय से सूचना से पता चला कि तीन श्रेणियों का टिकिट उपलब्ध था। नीचे
दर्जे का टिकिट शायद 20-30 रूपये का था जिसे लोअर डेक कहते दूसरी श्रेणी अपर डेक
की थी शायद 100 के आस पास की थी। तीसरी और विलसता से परिपूर्ण प्रथम श्रेणी मे
कैबिन थी जिसका किराया हवाई टिकिट से भी
ज्यादा था सही सही याद तो नहीं पर कीमत
शायद 400 रूपये के उपर थी। मित्रों ने आपस मे तय कर अप्पर डेक का टिकिट कटाया। पूर्व मे हम लोगो को इन तीनों श्रेणी की बहुत अधिक जानकारी न थी।
यात्रा वाले दिन तय समय और स्थान पर हम लोग
निश्चित समय से पूर्व बंदरगाह पर पहुँच गये। समुद्र जहाज की यात्रा सुबह 7-8 बजे प्रस्थान
होनी थी। बंदरगाह पर एक बड़े हाल मे धीरे
धीरे समुद्री यात्रा के यात्री आने शुरू हो गये। पता किया तो बताया गया बंदरगाह का
गेट निश्चित समय पर खुलेगा तभी यात्रियों का समुदी जहाज पर प्रवेश प्रारम्भ होगा। जो अनुभवी यात्री थे वे
पहले आगे लाइन मे खड़े हो गये। कुछ यात्री जिनपर सामान ज्यादा था रेल्वे स्टेशन की
तरह बंदरगाह पर उपलब्ध कुलियों की सेवा ले खाली हाथ लाइन मे खड़े हो गये। हम तीनों
मित्रों को समुद्री यात्रा का कोई पूर्व अनुभव न था इसलिये आराम से मस्ती मे पीछे
खड़े थे। लोअर डेक के यात्रियों का प्रवेश द्वार अलग था। अप्पर डेक और कैबिन के
यात्रियों के लिए एक अलग प्रवेश द्वार था। निश्चित समय पर जैसे ही प्रवेश द्वार
खुला 4-5 सौ यात्रियों की भीड़ एक दम से लकड़ी के काफी चौड़े तख्ते से जहाज पर चढ़ने
के लिये दौड़ी। हम तीनों तो इस दौड़ की जानकारी न होने के कारण पीछे खड़े भीड़ छँटने
का इंतजार कर रहे थे। व्यवस्था से परिचित न होने के कारण रेल्वे स्टेशन के चालाक
कुलियों की तरह ही बंदरगाह के कुलियों ने अपने अपने यात्रियों के लिये मौके की
छाया दार शेड के नीचे की जगह चादर विछा कर घेर ली। तभी हमे समझ आया कि अपर डेक
पूरे का पूरा अनारक्षित जगह है। जिसको जहां जगह मिले घेर कर अपना सामान या चादर
विछा कर अपने कब्जे मे ले सकता है। तभी मैंने अपने मित्र अनिल को साथ ले सामान के
साथ संजीव को नीचे छोड़ कुछ सामान आदि हाथ मे ले पानी के जहाज पर दौड़ा और मुख्य प्रवेश द्वार के
बाएँ तरफ जगह पाने के लिये पहुंचा। वहाँ थोड़ी सी जगह पाकर सहयात्रियों/कुलीओं से थोड़ा कहा सुनी कर फैल कर बैठ गया। पूरा नज़ारा
अनारक्षित रेल मे सीटों के लिये मारामारी की तरह ही था। मैंने उक्त जगह की रक्षा और कब्जा दोनों मित्रों
के सामान सहित आने तक उसी तरह बनाये रखा
जैसे बचपन मे राम लीला देखने के लिये सबसे आगे की जगह घेरने के लिये दरी,
फट्टी विछा कर करता था।
तब तक दोनों मित्र भी सामान के साथ ऊपरी डेक
पर आ गये थे। हम लोगो ने अपने अपने सूटकेस से चादर निकाल विछा अपना कब्जा पक्का कर
लिया था। जगह की तरफ से अब हम लोग निश्चिंत थे। तभी हम लोगो ने पता किया कि सीमित
संख्या मे किराये पर मोटे रबर फ़ोम के गद्दे तीस रुपए के किराये पर उपलब्ध है। हम
लोगो ने तुरंत ही किराया दे कर तीन गद्दों को किराये पर ले लिया जो एक अच्छा
निर्णय था। आराम दायक गद्दों की बजह से लकड़ी के डेक पर सोने के कष्ट से हम लोग बच
गये थे।
इसी बीच हम दो लोग शिप के भ्रमण हेतु अपने
एक मित्र को सामान के देख भाल हेतु छोड़ चल दिये। रेल की तरह सीमित संख्या मे
टॉइलेट उपलब्ध थे। चूंकि यात्रा की शुरुआत थी अतः संडास साफ सुथरे थे। लोअर डेक मे
किचिन थी। पूर्व भुगतान पर रात का खाना बुक कराने पर उपलब्ध
था। जिसका लाभ हम लोगो ने उठाया। लोअर डेक मे भीड़ ज्यादा थी कुछ लोग बकरियों को
लेकर जा रहे थे। लोग काफी सामान के साथ थे। प्राकर्तिक रोशनी उपर दीख रहे रोशन दान
से आ रही थी। भीड़-भाड़ यहाँ ज्यादा थी। अधिकतर यात्री आर्थिक रूप से कमजोर श्रेणी के
लग रहे थे। एक सिरे से अंडरग्राउंड तल जो
समुद्र से नीचे था और जिस पर बड़े बड़े इंजिन जेनरटर चल रहे थे,
तीव्र शोर के कारण आपस मे बातचीत भी संभव
न थी।
तेज धूप के कारण हम लोगो को शेड के नीचे
ठंडी समुद्री हवाओं के कारण चैन से बैठने का भरपूर सुख मिल रहा था। इसी बीच जैसे
रेल मे चाय, स्नैक्स,
बिस्कुट, नमकीन मे बेचने बाले
होते है बिलकुल उसी तर्ज़ पर कुछ बेंडर जहाज पर सामान बेच रहे थे। इसी बीच रेल
टिकिट चैकर की तरह सफ़ेद शर्ट और काली पेंट मे यहाँ भी टिकिट निरीक्षक से सामना
हुआ। अपना टिकिट चैक करा हमने जिज्ञासा बस बगैर टिकिट यात्रा की जहाज पर गुंजाईस के
बारे मे पूंछा?
मुस्करा के बोला दिल्ली की तरह यहाँ बगैर
टिकिट यात्री नगण्य संख्या मे होते है! जैसे जैसे सूरज ढल रहा था उपर डेक पर
यात्रियों की चहल-पहल बढ़ गई। चोरी चपाटी आदि का डर न महसूस होने के कारण हम तीनों भी अपर डेक पर भ्रमण के लिये पीछे के एक छोर से
भ्रमण हेतु रवाना हुए। पीछे का हिस्सा जो आगे के नुकीले हिस्से से कई गुना लगभग
100 फीट से ज्यादा रहा होगा। इंजिन से निकलने बाले पानी और जहाज द्वारा अपनी तेज
गति से दोनों ओर हटाये जा रही पानी की विशाल जलराशि से उत्पन्न होने बाली आवाज से
गुंजायमान था। जहाज के आखिरी हिस्से मे तेज गति से बढ़ते जहाज को देखना अपने आप मे
एक अद्भुद रोमांच था कुछ कुछ बैसा ही जैसा हमने एक बार मालगाड़ी के आखिरी गार्ड के
डिब्बे मे यात्रा का रोमांच को महसूस किया था।
(https://sahgalvk.blogspot.com/2018/09/blog-post_44.html)॰
लोग ढलते सूरज की तस्वीरे लेने के लिये अपना स्थान
ढूंढते नज़र आए। अबतक मस्त ठंडी हवाओं के आगोश मे लोगो के चेहरे पर एक अलग खुशी का
अहसास था। कुछ विदेशी अपने साथी महिला मित्रों के साथ प्रेमालाप मे मग्न थे जिनको
हम देशी "बेचूलर" कौतूहल और उत्सुकता लिये कभी कभी तिरछी निगाहों से
देखने के मोह से पीछे नहीं रहे। अधिसंख्य यात्री पर्यटक ही थे कुछ परिवारों के साथ
और कुछ हम लोगो कि तरह क्षणे-छाँटे।
पानी के जहाज का अगला हिस्सा कुछ डरावना,
भय उत्पन्न कर देने वाला था। जहाज का तेज
गति से समुद्री लहरों को चीर कर आगे बढ़ना रहस्य और भय मिश्रित रोमांच को पैदा कर
देने वाला था। जहाज के अग्रतम हिस्से से तीस-चालीस फुट नीचे समुद्री लहरों को
चीरने की आवाज हृदय विदीर्ण करने वाली थी। जहाज की तीव्र गति डर और दहशत पैदा करने
वाली थी। कदाचित ही कोई कमजोर दिल वाला आदमी जहाज के अग्रभाग के
सिरे पर ज्यादा देर ठहर सके?
धीरे धीरे सूर्य भी अस्ताञ्चल मे छुपने की तैयारी मे था और दूसरी तरह जहाज पर लोगो
के घूम-घूम कर वातावरण से उत्पन्न आनंद और
उल्लास को अनुभव करने का चरमोत्कर्ष।
अब तक अंधेरा घिरने लगा था। दूर दूर तक जहाज
के एक ओर घोर स्याह अंधेरा जो अनंत व्याप्त था और दूसरी तरफ देश के पश्चिमी
समुद्री तट के किनारे पर बसे घरों से तारों की तरह निकलने वाला टिमटिमाता मद्धिम
प्रकाश और अँधेरों के बीच पहाड़ों तथा
समुद्री किनारों पर लगे नारियल के पेड़ों का आभास देती आकृतियाँ। रात के आठ-नौ बजे के
बीच लोअर डेक मे स्थित किचिन मे रात्रि भोजन ठीक-ठाक ही था पर गरम और ताज़ा। कुछ और
देर भ्रमण पश्चात जब मोटे रबर फ़ोम के गद्दों पर आराम हेतु पहुंचे तो सारी थकान
तिरोहित हो चुकी थी। रात मे कुछ सर्दी भी बढ़ गई थी लेकिन हम लोगो के पास आवश्यक
कपड़ो के इंतजाम के कारण यात्रा और भी सुखद और आनंद देने वाली हो गई। रात मे एकाध
जगह शायद जहाज किसी स्टेशन अर्थात शहर मे रुका था लेकिन अर्ध-चेतन मन पर गहरी नींद के प्रभाव के कारण उसका भान न हुआ। सुबह के सात बजे के लगभग
हम लोग गोवा के बन्दरगाह पर थे। जहाज बन्दरगाह पर लगाने के लिये बड़े बड़े लोहे के
लंगर डाले जा रहे थे बन्दरगाह पर लोहे की
रैलिंग के पर सैकड़ों की संख्या मे लोग जो शायद पर्यटन से जुड़े होटल वाले,
साइट सीइंग वाले, कुछ कुली और शायद कुछ
गोवा के मूल निवासियों को लेने आने बाले मेजबान दिखाई दे रहे थे।
इस तरह हमारी पहली समुद्री यात्रा हवाई यात्रा के मुक़ाबले ज्यादा
सुखद, रुचिकर,
आनंददायक और यादगार रही।
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
❤️❤️👍👍
बहुत ही सुन्दर!!
वाह! क्या भावना है!
मैं भी भावुक हो गया और Gateway of India से Goa तक का यात्रा आप लोगों के साथ पूरा किया!!
बहुत सुन्दर!!👏🏻👏🏻👏🏻
- शंकर भट्टाचार्य।
एक टिप्पणी भेजें