"साधो
ये मुरदों का गांव!"
अभी
कुछ दिन पूर्व हाथरस की दलित युवति से रेप की विभत्स घटना के बारे मे हम आप सभी ने
पढ़ा और टीवी पर देखा होगा। जिसकी कालांतर मे दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल मे मृत्यु
के समाचार ने पुनः एक बार पीढ़ा और वेदना का अहसास कराया। उस दलित और शोषित परिवार
का दुर्भाग्य देखो एक,
जवान बेटी के विरुद्ध यौन दुराचार की घटना ने न केवल उनकी बेटी के
अकाल और विभत्स हत्या ने गहन दुःख और
अपूर्णीय वेदना दी बल्कि पुलिस और जिला
प्रशासन के क्रूर और अमानवीय व्यवहार ने इस दारुण दुःख और वेदना को बल पूर्वक
प्रकट भी नहीं करने दिया? बेटी के साथ पूरे परिवार को जीते
जी मार डाला? अर्थात "बलात मारे और रोने भी न
देवे"? जिस शासन, प्रशासन की
ज़िम्मेदारी थी कि आम नागरिकों के सुख
शांति सुविधा प्रदाय हेतु कानून व्यवस्था को बनाये रखते उन्ही पुलिस और प्रशासन के
मुखियाओं ने उस निरीह, वंचित शोषित परिवार को अपनी पुत्री के
सम्मान पूर्वक अंतिम संस्कार से भी वंचित कर क्या अधम, क्रूर
और अतिवादी व्यवहार नहीं किया? एक दलित की बेटी की जीते जी
अस्मिता को जो शासन रक्षा न कर सकी उसकी मृतात्मा के विरुद्ध इतना अमानवीय, घृणित और कुत्सित व्यवहार जिले
के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा आखिर क्यों? इन
प्रशासनिक अधिकारियों के शिक्षण और
प्रशिक्षण मे क्या मानवीय संवेदनाओं का, विशेषत: समाज के
कमजोर वर्गों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार और वर्ताव का समावेश नहीं किया जाता? यदि ऐसा है तो लानत है इस प्रशासनिक संवर्ग पर,
धिक्कार है इस उच्चतम पदस्थ प्रशासनिक अधिकारियों की श्रेणी पर, कैसे ये सेवक, श्रेष्ठी देश के जन कल्याण, समाज उत्थान और समाज के अंतिम छोर पर खड़े नागरिक की सुख सुविधा और आर्थिक
कल्याण की नीतियों और कार्यक्रमों को लागू कर सकेंगे?
निर्धन
एवं दलित समुदाय के प्रति इस दुर्व्यवहार का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण लगता है, एक तो
उसका दलित वर्ग से संबंध होना और दूसरा उस
परिवार की अशिक्षा? यदि परिवार शिक्षित होता तो क्या जिलाधीश
महोदय या अन्य संबन्धित अधिकारी उसके साथ ये जुल्म ज्यादती कर सकते थे? दलित परिवार के एक व्यक्ति का एक ब्यान सुन कर मेरा हृदय दृवित हो शर्म
से झुक गया जब उसने कहा हमारे "हिन्दू धर्म मे रात को मृतक का शवदाह नहीं
किया जाता? सनातन धर्म और उसकी अस्थाओं मे विश्वास और निष्ठा
रखने वाले झंडाबरदार "श्रीमान पुरुष" उस दलित के साथ खड़े नहीं होना चाहिये? भावात्मक विचारों को संप्रेषण करने मे भी कोताही बरतना हमारे संकुचित सोच
को दर्शाता है? प्रशासन ने जबर्दस्ती बलपूर्वक उस मृतिका के
शव का दहन परिवार के सदस्यों की सहमति के विरुद्ध मध्य रात्री मे ही कर दिया। शासन
के लोग मृतिका के धर्मपालन और विधि सम्मत मौलिक अधिकारों की रक्षा न कर सके। जब
उसके परिवार के लोग अपने धर्मपालन हेतु शासन, प्रशासन से उस
अभागी का सम्मान सहित शवदाह हेतु सुबह होने की अनुनय विनय कर रहे थे तो निष्ठुर प्रशासक और रक्षक उसके
धार्मिक और मौलिक अधिकार को हनन कर "शवदाह" नहीं अपितु असम्मानीय असंस्कारित
और धर्मविरुद्ध विधि और पृक्रिया से "लंका दहन" की तरह ज्वलनशील द्रव्य की सहायता से "शव का दहन"
कर रहे थे। क्या हम सनातन धर्मलाम्बी और
हिन्दू धर्मपालन के पुरोद्धाओं को जातिगत भेदभावों से उपर उठ उस पीढ़ित, दलित परिवार के साथ इस नितांत
दुःख और वेदना की घड़ी मे खड़े नहीं होना
चाहिए? बड़े दुःख और शर्म की बात है कि समाज का एक तथाकथित
उच्च वर्ग बड़ी ही निर्लज्जता और बेशर्मी के साथ इस कुत्सित,
विभत्स कृत को "रेप" न बताने के प्रयास मे लगे है। कदाचित वे भूल जाते
है कि उस पीढ़िता के साथ बलात हिंसा कर उसकी हत्या की गई है जो किसी भी मायने मे
रेप से कमतर नहीं। ये लोग शायद पीढ़िता के शरीर की हड्डियों के टूटने, शरीर के अंगों को अंग भंग कर नृशंस, अमानवीय हत्या
की गंभीरता, गहनता और गहराई के कायरता पूर्ण कृत को "रेप"
न बता कौनसा वीरोचित और पुरुषोचित
क्षत्रिय धर्म साबित करना चाहते है?
इस
घटना के साथ ही बलरामपुर मे भी इन्ही दिनों एक युवती की कुछ मुस्लिम विक्षिप्त और हिंसक नराधमों
द्वारा बलात्कार और हत्या की हैवानियत पूर्ण कृत की भी जितनी निंदा और भर्त्स्ना
की जाये कम है। इस तरह के पशुवत कृत करने
बाले मानव के रूप मे हिंसक पशु है वे दैत्य किसी भी धर्म, मत
संप्रदाय और प्रांत से हो सकते है। ये सिर्फ और सिर्फ अपराधी है। इनके विरुद्ध बैसी ही कड़ी से कड़ी कार्यवाही होने
ही चाहिये जैसी कि पिछले दिनों दिल्ली के "निर्भया रेप कांड" मे
अपराधियों को फांसी की सजा दे की गई थी, लेकिन इस कार्यवाही
मे लगने वाला न्यायिक पृक्रिया मे लगने बाला समय निश्चित ही कम से कमतर होना
चाहिये!!
देश
के राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के मुखियाओं द्वारा दोनों नृशंस, घिनोनी और
अमानवीय घटनाओं मे पीढ़ित परिवारों के समक्ष अपनी संवेदनाओं और दुःख के प्रकटीकरण मे शर्मनाक भेदभाव भी सर्वथा निंदनीय
और भर्त्स्ना और कड़ी आलोचना योग्य कृत है।
धर्म
और समाज के अन्य वर्गों की अकर्मण्यता, अनासक्तता
और मौन भी समाज मे महिलाओं और बेटियों के विरुद्ध
लिंग आधारित उत्पीढन और हिंसा के ही समान
है। धर्म और समाज के इन निष्ठुर श्रेष्ठियों के इस मौन व्यवहार के कारण ही सैकड़ों
वर्ष पूर्व संत कबीर दास ने अपनी रचना मे शायद सही उल्लेख किया था :-
साधो ये मुरदों का
गांव!
पीर मरे, पैगम्बर मरि हैं,
मरि हैं ज़िन्दा जोगी,
राजा मरि हैं, परजा मरि हैं,
मरि हैं बैद और रोगी।
साधो ये मुरदों का गांव!
चंदा मरि है,
सूरज मरि है,
मरि हैं धरणी आकासा,
चौदह भुवन के चौधरी मरि हैं
इन्हूँ की का आसा।
साधो ये मुरदों का गांव!......................
कदाचित शासन, प्रशासन के अधिकारी समाज के प्रबुद्ध वर्ग, राजनैतिक राजनेता और धर्म के ठेकेदार ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, मुल्ला, मौलवी, संत कबीर दास जी की इन अंतिम पंक्तियों को अपने जीवन मे धारण करेंगे तो देश की बेटियों के संरक्षण और सुरक्षा की सार्थकता सुनिश्चित हो सकेगी?
नाम अनाम अनंत रहत है,
दूजा तत्व न होइ,
कहे कबीर सुनो भाई साधो
भटक मरो मत कोई।
विजय सहगल



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें