शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2020

टॉइलेट एक (अ)प्रेम कथा

 

"टॉइलेट एक (अ)प्रेम कथा"





आप कल्पना करें यदि आप अपने परिवार के लिये कोई मकान अपनी रिहाइश के लिये किराये से ले रहे हों, मकान की लोकेशन अच्छी हो किराया कम हो तो निश्चित ही आप ऐसी जगह पर मकान लेना पसंद करेंगे। लेकिन किराएनामे के पहले आपको बताया जाये कि टॉइलेट के लिये आप और आपके परिवार को सड़क पार नगर पालिका के टॉइलेट मे जाना होगा, तो निश्चित ही आप मुफ्त मे भी उस मकान मे रहना पसंद न करें। यदि यही स्थिति बैंक शाखा के मामले मे हो तब  हम क्यों इस अति आवश्यक सुविधा के बिना शाखा परिसर मे  बैंक खोलने हेतु  चयन कर लेते है? बैंक एक व्यवसायिक संस्थान के नाते टॉइलेट की सुविधा न केवल स्टाफ बल्कि ग्राहकों की सुविधा की द्रष्टि से भी आवश्यक है। वैधानिक एवं मानवाधिकार के रूप से भी टॉइलेट की सुविधा के बिना शाखा खोलना क्या सामाजिक बुराई नहीं है? प्रादेशिक निरीक्षालय मे कार्य करने के दौरान लगभग चार साल तक विभिन्न शाखाओं मे जाने एवं निरीक्षण करने का सुयोग बना। इस दौरान निरीक्षण के दौरान जानकार हैरानी और आश्चर्य हुआ कि लगभग सात या आठ शाखा परिसर ऐसे थे जिनको किराये पर लेते समय उनमे टॉइलेट का प्रावधान ही नहीं था। इनमे से कई शाखाओं मे महिला स्टाफ भी पदस्थ थे। कई बारी शाखाओं के त्वरित खोलने के कारण अस्थाई रूप से टॉइलेट का कुछ समय के लिये न बन पाने के कारण टॉइलेट का  अस्थाई स्थगन तो समझ आता है। सरकारी और अर्ध सरकारी कार्यालयों मे स्थित शाखा  परिसर की स्थिति को तो फिर भी स्वीकार किया जा सकता है जहाँ विभाग के अन्य कर्मचारियों के लिये निर्मित टॉइलेट का  सांझा करने पड़े। पर मकान मालिक के निजी टॉइलेट को बैंक के स्टाफ के साथ सांझा करने का कोई कारण समझ से परे थे। शाखा के परिसर के निर्धारण के लिये बाकायदा एक समिति का गठन किया जाता है ताकि बैंक के अच्छे  व्यवसाय हेतु शाखा परिसर व्यवसायिक दृष्टि से अच्छी लोकेशन और समस्त सुविधाओं से परिपूर्ण हो पर अन्य बाते छोड़ भी दे तो कम से कम जीवन के लिये  अत्यावश्यक   टॉइलेट सुविधा को    कैसे      नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।  

फ़र्निचर, टेबल, कुर्सी, लॉकर, सेफ आदि के बारे मे बैंक के स्पष्ट मानक तय है। फ़र्निचर आदि मे व्यय एवं शाखा के उदघाटन आदि मे कई लाख रूपये खर्चने के बावजूद कुछ चंद हज़ार रूपये टॉइलेट के लिये भी शामिल करने मे बैंक को भला क्या आपत्ति हो सकती थी? पर कई बार कुछ अधिकारी अपने प्रभाव का अतिक्रमण कर उपलब्ध सुविधाओं मे कटौती कर देते है जैसा कि एक शाखा मे मेरे साथ हुआ था, (देखे ब्लॉग- घूमने बाली कुर्सी (https://sahgalvk.blogspot.com/2020/04/blog-post_11.html )।  कठिन से कठिन परिस्थितियों के बावजूद काम चलाऊ टॉइलेट बहुत ही कम खर्च मे कैसे भी परिसर मे चंद दिनों मे ही निर्मित कराई  जा सकता है।  लेकिन खेद और अफसोस है कि संबन्धित  अधिकारियों की इक्छा  शक्ति के अभाव मे  शाखा मे पदस्थ दूसरे स्टाफ के दुःख दर्द से अनिभिज्ञ इन अधिकारियों के व्यवहार के कारण कुछ शाखाओं मे सालों-साल  तक टॉइलेट का निर्माण नहीं कराने का दोष  इनकी लचर सोच का  ही नतीजा माना जा सकता है।  इन शाखाओं के नियमित निरीक्षण मे भी इस समस्या को उल्लेख करने  के बाबजूद समस्या का  निराकरण सालों तक न होना अपने आप मे हमारी कार्यशैली पर एक बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है??

इस संबंध  मे बैरागढ़ से चंद किमी दूर स्थित ग्रामीण  शाखा बरखेड़ा  के निरीक्षण अपने आप मे एक अनूठा अनुभव था। निरीक्षण के समय 4-5 दिन उक्त शाखा मे जाना हुआ। टॉइलेट जाने के लिये मकान मालिक के घर के अंदर स्थित उनके निजी टॉइलेट का इस्तेमाल करना होता था। ग्रामीण मकान बहुत बड़े अहाते मे बना था।  शुरू मे तो एक दो दिन शाखा के सब स्टाफ को लेकर गये। बड़े से मकान मे दो बड़े बड़े आँगन को पार करने के बाद सबसे आखिर मे टॉइलेट बना था। मुख्य द्वार से टॉइलेट की दूरी लगभग दो सौ फीट होगी। दुर्भाग्य से टॉइलेट कम संडास मे दरवाजा तो था पर उसकी कुंडी नहीं लगती थी। पानी के लिये फ्लैश भी न था। टॉइलेट के बाहर रखे वर्तनों से पानी भरकर डालना होता था।  एक बार टॉइलेट मे पानी डालने पर पानी ही बापस उछल कपड़ों पर आ गिरा।  जब कभी सब स्टाफ के न होने पर अकेले जाना होता तो बड़ी झिझक होती। टॉइलेट करते समय लगातार खाँसना और खखारना पड़ता क्योंकि कुंडी न लगने  की समस्या थी लगातार डर बना रहता कहीं कोई अन्य व्यक्ति टॉइलेट के इस्तेमाल के लिये न आ जाये। एक बार जब गये तो टॉइलेट के बाहर ही मकान मालिक का कपड़े धोने का स्थान था और कोई महिला कपड़ा धो रही थी। बड़ी अजीब स्थिति थी जब तक टॉइलेट हो कर बापस न निकल गये एक तरह का मानसिक बोझ ही दिमाक मे बना रहा। जब लघु शंका के निवृत्ति मे इतना कष्ट हो और यदि दीर्घ शंका का समाधान करना पड़े  तो इसकी कल्पना ही की जा सकती है।   इस तरह की समस्याओं के बीच प्रति दिन बैंक स्टाफ कैसे समस्याओं का  सामना करता होगा जबकि उक्त शाखा मे एक महिला स्टाफ की पदस्थपना थी तब नित्य ही वह इस समस्या का सामना कैसे करती होगी शायद हम पुरुष उसको नहीं समझ सकते।  

सागर कैंट शाखा की स्थिति तो और भी गई बीती थी जो सालो साल बनी रही। टॉइलेट तो दूर शाखा मे स्टाफ को भी बैठने के लिये आवश्यक जगह न थी। मुश्किल से 12X20 फीट की जगह। उसी मे मैनेजर, ऑफिसर, क्लर्क, कैश कैबिन, कैश सेफ, रिकॉर्ड रूम और ग्राहकों के मात्र खड़े होने भर  की ही जगह हो तो फिर टॉइलेट तो भूल ही जाओ? बगल मे ही शाखा और   चर्च की बाउंड्री वाल के बीच मात्र एक व्यक्ति के खड़े होने की छोटी सी  जगह को लोग टॉइलेट की तरह प्रयोग करते। धार्मिक जगह के बाहर की जगह को टॉइलेट की तरह इस्तेमाल करना हमे कतई रास न आया। शाखा के सामने सड़क के उस पार सैनिकों की बैरक मे बनी टॉइलेट प्रयोग कभी-कभी कर लिया करते लेकिन एक अंदेशा बना रहता कोई टोक न दे। इसके दीगर दूर दूर तक कैंट एरिया मे टॉइलेट करने कहीं भी खड़े होने पर सेना पुलिस का भी डर बना रहता कही पकड़े गये तो इज्जत का पलीता लगना निश्चित था। दो-तीन बार शाखा मे जाना हुआ कई बार टॉइलेट करने को अपनी सहन शक्ति तक रोके रखना ज्यादा आसान लगता। जब पुरुष स्टाफ का ये हाल था तो इस शाखा मे पदस्थ महिला स्टाफ के बारे मे सोच कर ही सिहरन होती है। आज की स्थिति क्या है मै अवगत नहीं हूँ? 

एक अन्य शाखा बालोद मे भी शाखा अच्छी लोकेशन पर स्थित थी पर टॉइलेट के लिये शाखा से बाहर निकल गली मे 40-50 कदम चल कर मकान मालिक के घर मे बने बरामदे से होकर सीढ़ियों से चढ़ पहली मंजिल पर जाना पड़ता था। मकान मालिक की निजी टॉइलेट का इस्तेमाल करना होता था। हर बार ही सुनसान निवास मे इस तरह प्रवेश करना कई बार इस आशंका को जन्म देता था कि कहीं अचानक कोई आ गया तो चोर होने का आरोप लगा कर देखते ही चिल्लाना शुरू न कर दे।

मेरी पदस्थपना कल्लेक्ट्रेट रायपुर मे नवीन शाखा खोलने से शुरू हुई थी। अस्थाई परिसर को तुरंत शाखा खोलने के लिये निश्चित कर कुछ दिनों मे ही शाखा को खोला जाना था। छोटा परिसर था शाखा मे  टॉइलेट नहीं थी लेकिन कल्लेक्ट्रेट परिसर मे अन्य स्टाफ के लिये निर्मित टॉइलेट का इस्तेमाल हम लोग कर लेते थे। लेकिन जैसे ही हमे स्थाई परिसर प्राप्त हुआ ठेकेदार से अनुमानित व्यय और प्रस्ताव के पचड़े मे न उलझ मैंने सामान्य व्यय मे से ही बमुश्किल दो ढाई हजार के व्यय से शाखा मे पीछे बने एक कमरे मे चार-चार इंच की दो दीवारों के बीच टॉइलेट का निर्माण दो दिन मे  करा लिया था।

लेकिन टॉइलेट से जुड़ी उपरयुक्त समस्याओं की कल्पना उन नीति निर्धारकों के संज्ञान मे शाखा परिसर को बैंक हेतु लेने के पूर्व क्यों कर नहीं आयी ये विचारणीय प्रश्न है?? निरीक्षण के दौरान मै ऐसी सात-आठ  शाखाओं मे गया जहां टॉइलेट की स्थाई/अस्थाई व्यवस्था न थी।  बैंक एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान है जिनको प्राइवेट बैंकों की ही तरह हमारी शाखाओं का चयन उपयुक्त व्यापारिक केंद्र के ही नजदीक होना चाहिये।  शाखाओं की मूलभूत सुविधाओं मे कुछ कमी कर या व्यापारिक एवं व्यवसायिक केंद्र से दूर किसी अव्यवसायिक स्थल पर शाखा के स्थान का चयन कर किराये के रूप मे कुछ हजार रुपयों की बचत से क्या हम जाने अनजाने  बैंक को  बहुत बड़े व्यवसायिक लाभ  से वंचित करने का अपराध नहीं करते? यह एक विचारणीय प्रश्न है? अन्य शाखाओं मे जहां टॉइलेट की सुविधा उपलब्ध न रही हो और जहां पर मै  निरीक्षण के लिये न जा सका वहाँ के टॉइलेट की प्रेम कथा मै नहीं लिख सका। 

विजय सहगल

3 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आपका अपने कार्यकाल के दौरान अनुभवों को मूर्त रूप देने का सुनहरा अवसर ब्लॉग के माध्यम से साकार हो रहा है

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सटीक और सही विश्लेषण । मैं भी मध्यप्रदेश में निरीक्षण विभाग में तीन साल रहा और इस तरह की समस्या से दो-चार हुआ । अपनी इंस्पेक्शन रिपोर्ट में इसका ज़िक्र भी किया लगता है संबंधित अधिकारियों को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।

विजय सहगल ने कहा…

कृपया इस लेख की एक प्रति अपने बैंक के हेड ऑफिस जरूर प्रेषित करे अब आप स्वतंत्र है अपने विचार रखने हेतु , यदि बैंक इस पर कुछ सोच विचार करेगा तो आपका यह एक समाज एवम् बैंक हेतु साहसिक एवम् सामाजिक पद होगा , सराहनीय व्याख्या👍🙏 Message received on whatsapp by Smt. Sadhna Mehrotra on 16.10.2020