सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?
आज तुम्हारा घर पे आना।
बिसरे दिनों की याद दिलाना॥
विस्मृत क्षण सब हरे हो गये।
स्वप्न, स्वर्ण से खरे हो गये॥
पर आने मे देर बहुत की।
बाट जोहते रहे, श्रवण की॥
कुछ और अधिक पहले तुम आते,
तुम कुछ कहते, सुन हम पाते॥
अब गहन नींद न,
शोर सुनाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?
चाह मिलन की, थी तुमको भी,
वही चाह थी, मुझको भी॥
दुनियाँ देखे, मिलन हमारा,
तुमने पुष्प दिया था प्यारा॥
पर तुम सहज भले मे आते?
भले लता-पुष्प न लाते॥
मै भी देख,
तुम्हें खुश होता।
अब क्या होता?,
जब उड़ा पखेरू, छोड़ के सोता?
सूनी आँखों,
"न" सुमन सुहाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?
मैले-वस्त्र, स्वच्छ कम थे,
पर रिश्तों, मे अहम न थे।
धवल अँगौछा, पहनाकर।
प्रबल प्रेम मुझ पे दर्शाकर॥
पर, असर अँगौछा,
न कर पाया।
महज,
पिण्ड को ही ढँक पाया॥
"सर्द" सुनहरी पर जो लाते।
देख नयन हर्षित हो जाते॥
असर "ऊन" का,
अब न सुहाये।
सूरज ढलने पर तुम आये,
तो क्या आये?
बहती धारा मे आते,
नदी नीर जब सिंधु समाये,
तो क्या आये?
विजय सहगल


6 टिप्पणियां:
आप विलक्षण प्रतिभा के लेखक है इसने किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए मैं आपकी लेखनी का कायल हूं
धन्यवाद सक्सेना जी, आपके ऊर्जास्पद शब्दों के लिये।
Namaste sir barabar aapki rachana parh raha hun .badhia hai
धन्यवाद मेरे अनाम मित्र। आपके प्रेर्णास्पद शब्दों के लिए।
बहुत ही सुन्दर रचना, बहुत बहुत धन्यवाद । ----0खत्री योगेन्द्र आजाद, पटना ।
उत्साहवर्धन हेतु धन्यवाद, योगेंद्र जी।
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