"बलि", एक
बेटी न चढ़ती"
(हाथरस रेप
पीढ़िता के समर्थन मे)
जने कोख से साँप सपोले,
तब कैसे इनके संग "जी" ले।
हाथ का रस, बना जहर जब,
कैसे इस गरल को पी ले।
न जन्माती,
तुझसा कुलघाती,
हवस, राक्षस की न बढ़ती।
"बलि", एक बेटी न चढ़ती॥
किया कलंक कोख को तूने,
रिश्ते तार-तार कर तोड़े,
लज्जित, बहिन-बेटियों को कर,
नीच कुकर्म से नाते जोड़े।
नरपिशाच, दानव, कुलघाती,
काश घड़ी ऐसी वो आती।
जन्म तुम्हें देते ही मै,
मृत्यु वरण मुक्त हो जाती।
मानवता को किया कलंकित,
दुनियाँ मुझको धिक्कार रही है।
"लाश" हूँ जिंदा, लेकिन,
मृत "बेटी" चित्कार रही है॥
अवला थी, था कुल नीचा।
गूंगी जुबां, फिर भी क्यों खींचा?
हम बारम्बार, सताये जाते?
शिकार हवस बनाये जाते?
नहीं पादुका एढ़ी ज्यों थी?
पड़ी "बेडियाँ" पैरों क्यों थी?
सदियों से जो जुल्म सहा-ये।
होगा अंत कब, कोई बताये?
क्यों अछूत की तोड़ अस्थियाँ,
सत्ता के ये बज्र बनायेँ?
क्यों बेटियों को जीते जी,
"सती" बना कर जलें "चितायेँ"॥
धिक्कार मुझे उस ऊँचे कुल की,
काश, कोख सूनी कर पाती।
खुद को कोस रही तेरी माँ,
भले "निपूती" ही मर जाती॥
सम समाज के दम भरते हो।
छद्म आवरण छोड़, खड़े हो॥
साथ "सुता" के आना होगा।
साथ है "देश", बताना होगा॥
विजय सहगल


1 टिप्पणी:
एक मां की कोख से जन्म लेता है एक मानव और एक दानव भी! इसमें "मां" की क्या दोष! वो बेचारी तो अंदर से और बाहर से खोखली हो गई! रो-रो कर बुरा हाल है!
दानव का विचार नहीं होना चाहिए! वन होना चाहिए!
रामायण में हम तो यही देखें है!
समझ में नहीं आता कि परिणाम जानने के बाद भी लड़के ऐसा कैसे कर जाता है!
हम और कितना दुःख सहन करेंगे?
लगता है, फांसी भी ये दरिंदों को डरा नहीं सकती!
अतः, ऐसे लोगों को अधमरा करके ही फांसी पर लटकाना उचित होगा!
- शंकर भट्टाचार्य।
एक टिप्पणी भेजें