मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

नया दौर

"नया दौर"





दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
सितम आंधियों के अब न सहेंगे।
जुल्म ज़ालिमों के,अब न डरेंगे॥
कदम मंजिलों पर बढ़ते रहेंगे।
भले पथ मे कांटे सलते रहेंगे॥
सागर बीच कश्ती घना है अंधेरा ।
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
फुदके गौरैया,चहक रहे बच्चे,
टूटे घरौंदों मे काया से कच्चे॥
बिजलियाँ घरोंदे क्या गिराती रहेंगी?
तिनके घरोंदे जलाते रहेंगी?
दमन बिजलियों,बादलों के सितम।
चलेगा न ये, जीवन हर दम॥
नया दौर है ये,वक्त का है फेरा,
निर्बल "चिरैया" को वक्त ने उबेरा।
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥
आंधियां अंधेरों मे,पथ से जो भटकें।
बातियाँ "दीये" की खड़ी हो के डटके॥
झंझावातों को दिशा मार्ग देंगी।
अज्ञानता का,"हर" ज्ञान लेंगी॥
हौंसले दियों के अब कम न होंगे।
खुले आसमानों मे तूंफा लड़ेंगे।
चमक रोशनी की अविचल अड़ी है।
लौ जो दिये की,"तम" से बड़ी है॥
मिटेगा तमस,पड़े रश्मियों का डेरा,
दस्तक सुनहरी है,उजला सबेरा।
भटक रही आँधी ने नैया को घेरा॥

विजय सहगल


1 टिप्पणी:

azadyogi ने कहा…

बहुत ही सुन्दर विचार ।