बुधवार, 12 अगस्त 2020

बांसुरी बाला


"बांसुरी बाला"
(जन्माष्टमी पर विशेष)






आज प्रातः सोसाइटी के अंदर ही भ्रमण लगभग समाप्त होने को ही था। विविध भारती पर रामचरित मानस का पाठ समाप्त हो कर समाचार के आरम्भ होने की "टुंग" "टुंग" के सिग्नल की आवाज शुरू हो चुकी थी।  जिसके बाद आजकल विविध भारती पर  मुंशी प्रेमचंद की कहानियों की श्रंखला के तहत हर रोज एक नई कहानी के वाचन का प्रसारण  सुनने का इंतज़ार कर ही रहा था कि अचानक बांसुरी की सुरीली तान सुनाई दी "यशोमत मैया से बोले नन्द लाला........." सुनकर  बरबस ही उस दिशा मे बढ़ चला जहां से आवाज़ आ रही थी। नजदीक ही सोसाइटी की बेंच पर एक बड़े ही साधारण रूप रंग और पहनावे का एक नौजवान अपनी मस्ती मे बांसुरी पर आज भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिन पर उक्त भजन की मदमस्त धुन बांसुरी पर प्रवाहित कर रहा था। मोबाइल पर अपने सारे तय प्रोग्राम को छोड़ कर मै उसके सामने बाली बेंच पर एक छोटा सा वीडियो बनाने मे लग गया। मुझे लगा था शायद सोसाइटी मे ही कार्यरत कोई कर्मचारी होगा पर बेंच के पीछे एक मोटे बांस पर चारों ओर लगी  अनेकों बांसुरी को करीने से लगा देख समझने मे देर न लगी कि ये नौजवान बांसुरी की सुरीली धुन बजा कर बांसुरी बेचने का व्यवसाय करता होगा। आसपास कुछ और भ्रमण कर रहे लोग भी उसके आसपास खड़े हो विडियो बनाने लगे। कुछ बच्चे भी उसके नजदीक खड़े हो सेलफ़ी लेने लगे। जैसे ही उसने उक्त गीत को समाप्त किया, मैंने उस युवा से बात चीत का सिलसिला शुरू कर उसका नाम ही पूंछा था कि एक भद्र महिला ने बीच मे टोक कर कोई अगला गीत बजा वीडियो बनाने की  फरमाइश कर दी लगा कोई संगीत का कार्यक्रम चल रहा हो। मै भी तन्मय हो अगला गीत जो उसने "श्री प्रभु"  की आरती "ओम जय जगदीश हरे..........." के रूप मे सुनाई। बांसुरी की स्वर लहरियाँ प्रातः के स्वर्णिम आभा मे घुल सुंदर एवं दिव्य वातावरण निर्मित कर रही थी। बहुत ही मनोहारी द्रश्य था। उस नौजवान ने अपना नाम मंजूर अली (मो॰-9958576226) बताया था। गाज़ियाबाद का रहने बाला था। पड़ा लिखा तो कुछ न था पर बांसुरी वादन पिछले 12-15 साल से कर रहा था जिसकी कोई विधिवत शिक्षा उसने कहीं से प्राप्त नहीं की थी। बांसुरी विक्रय ही उसकी जीविका उपार्जन का स्रोत था। उक्त महिला भी अब तक विडियो बना जा चुकी थी।

मैंने बांस के चारों ओर लगी बांसुरी के जब दाम पूंछे तो उसने सत्तर रुपए से चार सौ रूपये कीमत बताई। जब मैंने उससे पूंछा कि क्या मै भी उसकी तरह बांसुरी धुन मे बजा सकता हूँ? तो उसने कहा क्यों नहीं अभ्यास करके आप भी बांसुरी बजा सकते है। मै जानता था कि उसका उद्देश्य बांसुरी विक्रय तो है ही पर वह हमारी तसल्ली के लिए हमारी जिज्ञासा और बांसुरी बजाने के उत्साह को कम नहीं करना चाह रहा था। मै भी इस यथार्थ को जानता था कि बांसुरी को   धुन मे बजाना तो दूर बेसुरी बांसुरी फूंकना मे कठिन होगा क्योंकि बचपन मे कभी मेले ठेले मे  दूसरी तरह की बांसुरी बजाई थी। कुछ उत्सुकता बांसुरीवाले की भी थी कि मै कोई एक बांसुरी तो खरीद ही लूँ? बैसे मै भी मन ही मन तय कर चुका था कि उसके बांसुरी पर सुरीले गीत और भजन पर यूं ही पैसे देना शायद उसके व्यवसायिक नीति और मेरे भी  नैतिक मूल्यों के विपरीत होगा। मैंने एक दो बांसुरी ले मूल्य आदि की कुछ जानकारी हासिल करने के लिए निकाली। उसने चार सौ रूपये की बांसुरी तो खुद ही माना किया क्योंकि वे किसी निपूढ़ एवं संगीत मे पारंगत  बांसुरी वादक के लिये थी।  तब मैंने  ही उससे नीचे दाम बाली 160/- रूपये की बांसुरी लेने का निश्चय किया। उसने भी आराम से बैठ कर बजाने का अभ्यास करने को कहा। मैने भी पूरी तरह से पोली बांसुरी के ऊपरी छिद्र से फूँक कर बजाने की कोशिश की पर असफल रहा। उसने कुछ गुरु ज्ञान  दे बांसुरी बजाने की शिक्षा दी पर वह भी कुछ काम न आई। अब उसके चेहरे पर बांसुरी न बिक पाने के निराशा के कुछ भाव प्रकट होते उसके पूर्व ही मैंने उसे आश्वस्त करते हुए ये वचन कहे कि मंजूर अली मै जानता हूँ कि मै बांसुरी को वेसुरी ही सही फूँक कर बजा सका तो बहुत है पर बांसुरी को धुन मे गीत निकालना तो शायद बिलकुल भी संभव न हो? लेकिन मै आज इस बांसुरी को  हम सबके आराध्य भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिन के पवन पर्व पर इसको भगवान के साथ रख पूजन करूंगा एवं  उन पलों को स्मरण कर उल्लास और प्रन्नता का अनुभव करूंगा जो परमेश्वर ने यमुना किनारे अपने ग्वाल-बालों के साथ सांझा किए थे। मैंने कहा बांसुरी तुम्हारी  सुमधुर भजन की स्वर लहरियों की यादें एक बांसुरी बाले के रूप मे हमारे जेहन मे ताजा कराती रहेंगी।  

मै ये अच्छी तरह जानता हूँ कि मेरे लिये इस बांसुरी की शायद ही कोई उपयोगिता हो या बांसुरी के इस प्रयोजन से मै कदाचित ही संगीत का "क,, ग" भी सीख सकूँ? पर आज मुझे  भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिन पर रह रह कर  बांसुरी की कीमत दे ऐसी प्रन्नता हो रही है जैसे कबीर दास जी ने स्वयं के ठगे जाने पर मिलने बाले सुख को अपने दोहे की इन पंक्तियाँ मे उद्धरत किया है :-  

कबीरा  आप ठगाइये , और न ठगिए कोय 
आप ठगें सुख ऊपजे और ठगें दुःख होय 

मेरे एक मित्र इंदौर निवासी श्री कैलाश डेकाटे की बेटी रुचिरा डेकाटे की याद आना भी एक सुखद संयोग है। बेटी पेंटिंग मे बहुत ही पारंगत और निपूढ़ है। मै उसकी इस आर्ट से कई वर्ष पूर्व से परिचित हूँ। कुछ माह पूर्व उसने एक पेंटिंग बना फ़ेस बुक पर पोस्ट की थी जिसकी प्रासांगिकता मेरे जेहन मे थी अतः उस पेंटिंग का उपयोग मैंने साभार अपने इस ब्लॉग मे  शामिल किया है जिसके लिए रुचिरा का हार्दिक धन्यवाद सहित आपके अवलोकनार्थ उक्त पेंटिंग प्रस्तुत है।      

भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पवन पर्व की सुवेक्षाओं के साथ।

विजय सहगल

4 टिप्‍पणियां:

Deepti Datta ने कहा…

बहुत सुंदर लेख श्रीमान। बाँसुरी वाले का धुन एवं सुर पर नियंत्रण कमाल का है। Painting तो Marvellous.

विजय सहगल ने कहा…

दीप्ति जी उत्साह वर्धक टिपपड़ी हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद।

Chander Kumar Santani ने कहा…

👍

Unknown ने कहा…

Beautiful very nice