(गलवान
के शहीदों को समर्पित)
"नींद हमे कैसे आयेगी.........?"
देश के खातिर शपथ ओढ़ ली,
शीत भला ऐसे जायेगी?
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी?
चाहे हो गल्वानी घाटी,
हो समुद्र सी झील शिखर पर।
भले कटे धड़ शीश हमारे,
न पाओगे जमी इंच भर॥
मार मार कर मरे द्वादश,
"चीनी" चैन,
कहाँ पायेगी?
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी?
हिम से आच्छादित चोटी ही,
उष्ण से भरा बिछोना है।
दुश्मन छुप घाटी मे बैठा,
युद्ध अवश्य सम्भावी होना है॥
दुष्ट वैरी
की नियत खोट है,
संधि भला क्या हो पायेगी?
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी?
पगडंडी पर टिकी निगाहें,
घाटी बहें अविरल धाराएँ।
भ्रमित शत्रु को करके,
उसकी
सीमा पर पद चाप सुनाएँ॥
सजग प्रहरी हम है देश के,
नींद तुम्हें निश्चित आयेगी।
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी?
खेत रहे यदि युद्ध भूमि मे,
सीमा पर तुम कफ़न ढाँपना।
सांस छोड़ना "कब्र" मे थोड़ी,
न शव मे कोई बंध बाँधना॥
अरि के आने की आहट से,
नींद तुरत ही खुल जायेगी।
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी?
भू विस्तारक,
शांति संहारक,
खबरदार जो कदम बढ़ाया।
धोखे पीठ छुरा तुम भौंके,
काल सन्निकट तुम्हरे आया॥
भाग्य भले रूठा बैठा हो,
कर्म ध्वजा अब फहरायेगी।
दुश्मन जब सरहद पर बैठा हो,
नींद हमे कैसे आयेगी।
विजय सहगल



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Ati Sunder
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