"मांडू"
18 नवम्बर को मुरैना के एक पूरे दिन की यायावरी के
बाद हमारे पास अपने झाँसी और ग्वालियर प्रवास मे सामाजिक कार्यक्रमों मे शामिल
होने के बाद 3 दिन बिल्कुल फ्री थे। इन तीन दिनों के सदुपयोग के लिये हमने
ग्वालियर से इंदौर जाने का कार्यक्रम बनाया जहां मेरे परम मित्र श्री विजय गुप्ता
जी आजकल पदस्थ है। हमने 26 नवम्बर को ग्वालियर से इंदौर रतलाम एक्सप्रेस से
प्रस्थान कर 27 नवम्बर की सुबह इंदौर पहुँच गये। लगभग 9 बजे हम गुप्ता जी के "स्पेस
पार्क" स्थित आवास पर पहुँच गये। हम चाय पान के बाद तय कार्यक्रम अनुसार नहा
धोकर तैयार हुए। व्यवसायिक जिम्मेदारियों के चलते गुप्ता जी को हमने आगे मांडू और
महेश्वर चलने को बाध्य नहीं किया। सूटकेस से दो जोड़ी कपड़े, आवश्यक अन्तः वस्त्र, सेविंग और टूथ ब्रश आदि
पिट्ठू बैग मे डाले और अपनी पहली घुम्मकड़ी यात्रा के लिये टिफिन का भोजन ग्रहण कर गुप्ता जी के साथ उनके कार्यालय पहुँच गया।
जहां से हमे हमारे पुरानी मित्र संजय
सक्सेना की मोटर साइकल से अपनी यात्रा शुरू करनी थी। गुप्ता जी के कार्यालय के
अधिकतर साथी हमारे भी परिचित थे या जिनके साथ हम अपने सेवाकाल मे कहीं न कहीं कार्य कर चुके थे। उन सभी से मिलने और
श्री नवीन बुंदेला जी जो पहले ही इन जगहों पर जा चुके थे से मांडू और माहेश्वर के
मार्ग की आवश्यक जानकारी लेकर यात्रा के लिये निकले। वास्तव मे ये हमारी पहली
पूर्वनियोजित यायावरी यात्रा थी। इससे
पूर्व हमारे यात्रा व्रतांत हमारे घर से या पैतृक घर से ही हुई थी। पहली बार हम घर
से दूर भ्रमण के लिये मोटर साइकल से निकले थे। लगभग सुबह के 11 बज चुके थे और
हमारा पहला लक्ष्य था इंदौर से मांडू जो कि लगभग 110 किमी था। हैलमेट लगा पिट्ठू
बैग को पीछे रख बिल्कुल घुम्मकड़ी लग रहा था।
मोटरसाइकल से शीघ्र परिचित होने के बाद हमे उसमे एक बड़ी कमी लगी की
मोटरसाइकल मे कोई भी पीछे देखने के लिये मिरर न था जिसके विना हम यात्रा के
अभ्यस्त नहीं थे। इंदौर बाइपास से होते हुए हम जा ही रहे थे कि एक नौजवान को देख
कर हम उसके व्यक्तित्व को नज़रअंदाज़ न कर सके। सड़क पर 50-100 मीटर आगे
निकलने के बाद भी हम गाड़ी को बापस मोड़ कर उनके पास आये। रास्ता पूंछना या बगल के
ठेले से दो केले लेना तो महज बहाना था। हमने अनौपचारिक मुलाक़ात की श्री पंकज कुमार
जी से जिनकी बुलेट मोटरसाइकल जितनी बड़ी और शानदार थी उतनी ही हष्ट-पुष्ट उनकी
पर्सनलटी थी। यूहीं बातचीत मे अपने 148 किलो के बजन के साथ उन्होने अपने को पूर्ण
स्वस्थ और फिट बताया सुनकर अच्छा लगा। पंकज जी से कुछ मार्ग निर्देशन ले हम आगे
बड़े। इंदौर से 20-25 किमी आगे हमने मानपुर मे
मोटरसाइकल मे बैक मिरर लगवा सहज रूप से यात्रा पुनः शुरू की।
अब पिट्ठू बैग इस यात्रा के दौरान तंग कर रहा था इस
समस्या को भी मानपुर मे ही एक रबर की रस्सी लेकर बैग को सीट पर अच्छी तरह बांध कर
आगे बड़े। मौसम ठीक था धूप अच्छे से खिली थी मोटरसाइकल पर यात्रा से हल्की हल्की
ठंडक मौसम की गर्मी को कम कर यात्रा को एक सुखद अनुभूति प्रदान कर रही थी। आराम से
यात्रा करते हुए हम लगभग 60 किमी की यात्रा पूरी कर चुके थे। रास्ते मे पिट्ठू बैग
को ठीक करने कराने मे पानी की बोतल कहाँ गिर गई पता न चला सुबह के टिफिन मे बची
रोटी सब्जी रखी थी जिनको ग्रहण कर आगे कस्बे के चौराहे से पानी लेकर अपनी यात्रा
जारी रखी। इस दौरान सड़क ठीक ठाक ही रही मुख्य हाईवे से हट कर स्टेट हाइवे भी ठीक
थे। मांडू धार जिले मे एक काफी प्रसिद्ध पर्यटक केंद्र होने के कारण सड़क संपर्क
अच्छा है। छोटे गाँव कस्बों से होकर आराम से मोटरसाइकल चलाना अच्छा लग रहा था।
मांडू से लगभग 11 किमी पहले एक काकड़ा खोह नमक स्थान पर कुछ लोग दिखे जो मांडू का
ही एक दर्शनीय स्पॉट था। पर्यटक ज्यादा नहीं थे। मै भी पैरों को कुछ आराम देने के
लिये मोटर साइकल को खड़ा करके काकड़ा खो की तरफ बढ़ा। एक बहुत गहरी खाई के मुहाने पर
हम खड़े थे। पास मे ही एक छोटा झरना जिसका पानी उपर से सैकड़ो फुट नीचे गिर रहा था।
पास मे ही एक दो सजे धजे ऊंट खड़े थे जो इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि यहाँ
पर्यटक आते रहते है पर आज उनकी संख्या न के बराबर थी। पर उस ऊंट बाले की बोहनी
कराने के लिये हमने उस के ऊंट पर सवारी करली। उसने बताया ये जगह जहां पर बुंदेलखंड
मे प्रसिद्ध वीर आल्हा ऊदल द्वारा मांडव्गढ़ का युद्ध हुआ था जिसमे दुश्मनों की फौज
से घिर जाने के कारण आल्हा ऊदल घोड़े पर बैठ कर छलांग लगाई थी। घोड़े के टाप के
निशान पहाड़ी पर देखे जा सकते है, इसलिए ये एक एतहासिक जगह
है। यहाँ से मांडू 4-5 किमी दूर था। कांकड़ा खोह से आगे बढ़ते हुए हमने आलमगीर
दरवाजे मे प्रवेश कर मांडू मे अपनी उपस्थिती दर्ज़ की। मांडू के प्रवेश करते ही
किले नुमा 3-4 दरवाजे मिले जो 6-7वे शताब्दी के परमार शासकों की राजधानी मांडू के
वैभव की कहानी ब्याँ कर रहे थे। मांडू एक बहुत छोटा गाँव है जो मुश्किल से
1.00-1.50 किमी लंबी सड़क के दोनों ओर विरल रूप से बसा है जबकि मांडू के पर्यटक
स्थल इस बसाहट के चारों ओर 7-8 किमी के दायरे मे फैले है जिनमे मुख्य 4-5 स्पॉट ही
पर्यटन के द्रष्टि देखने लायक है और जिनका रख रखाव भी पर्यटन विभाग द्वारा बहुत
अच्छी तरह से किया जा रहा है बाकी अन्य अनेक महल अर्ध खंडहर रूप मे यहाँ वहाँ
देखने को मिल जाएंगे जिनमे अंधा अंधी का महल, चोर कोट, लोहानी गुफा आदि है। मांडू पर 13वी शताब्दी मे मुगलों
के कब्जे के बाद काफी महल, बाबड़ी और मंडप आदि बनाए गये। पहुँचते हुए लगभग 2.30-3.00 बज
चुके थे चूंकि यहाँ घूमने के काफी स्पॉट है अतः हमने बगैर समय गवाये मांडू के
आखिरी छोर पर स्थित रानी रूपमति मंडप देखने का निर्णय लिया। विंध्याचल की पहाड़
श्रंखला मे स्थित मंडप 2000 फुट की ऊंचाई पर वसा है उसमे भी रानी रूपमति मंडप पहाड़
के सबसे ऊंचाई पर स्थित है। मोटरसाइकल को पार्किंग मे लगा पिट्ठू बैग को एक शिकंजी
बाले की दुकान मे रख कर महल के भ्रमण हेतु बढ़े। महल पर चढ़ने को सीढ़ियाँ और चढ़ाई पर
बने स्लोब थे। समय बचाने हेतु मै सीढ़ियों
से चढ़ा सीढ़ी कम थी पर ऊंची नीची थकाऊ चढ़ाई। कहते है राजा बाज़ बहादुर ने ये महल
अपनी प्रियतम रानी के लिये इस महल का निर्माण कराया था। पर्यटन विभाग मध्य प्रदेश
द्वारा बहुत ही सुंदर और सफाई के साथ इस स्थल का रखरखाव इस स्थल की सुंदरता को और
बढ़ा देता है। दो आयात की भुजाओं पर बने वरांडों के उपर दोनों किनारों पर बने छत्रिनुमा
वर्गाकार महल जिन पर गोल गुंबद बने है बहुत ही सुंदर वास्तु कला के नमूने है। आयात
की दोनों रेखाओं की एक सीध मे बने महल के गोल मेहराब ज्योमिति के उत्क्रष्ट नमूने
है। एक के अंदर एक महल के ये मेहराव ज्योमिति के सुंदर नमूने दिख रहे थे, दूसरे छोर का निर्गम
द्वार देखने मे बहुत ही सुंदर प्रतीत हो रहा था। इस तरह की ज्योमिति शिल्प मांडू
मे अन्य महलों, मस्जिदों, धर्मशालाओं मे जगह जगह देखने को मिलती है। रानी रूपमति महल की
सर्वोच्च छत्त से मांडू का बड़ा मनोहारी द्रश्य देखा जा सकता है। गुजरात मालवा से
आये सैकड़ों पर्यटक इस सुहावने मौसम मे महल से मांडू का नज़ारा देख आनंद से सराबोर
थे। महल के खुले क्षेत्र मे हरी घास के मैदान और सजावटी पौधे स्थल की सुंदरता मे
चार चाँद लगा रहे थे। महल से बापसी मे पिट्ठू बैग लेते समय नमकीन और थोड़ी मीठी
नीबू शिकंजी ने यात्रा की सारी थकावट दूर कर फिर से तरोताजा कर दिया।
हमारा अगली मंजिल राजा बाज बहादुर महल था। पहाड़ी की
ढलान पर रूपमति मंडप से 1-1.50 किमी
दूर बाज़ बहादुर महल था। आयताकार किले नुमा महल जिसमे दो आँगन बनाये गये थे उनमे से
एक आँगन मे पानी की सुंदर कुंड या वावड़ी बनाई गई है जिसके चारों ओर महल के कक्ष
बनाये गये थे। किले नुमा महल के ऊपरी छत्त पूरी तरह से खुली थी जिनके दोनों
किनारों पर रूपमति महल की तरह बारहदरी के खंबों पर टिकी गुंबद महल की शोभा बढ़ा रही
थी। सूरज ढलने को था, पक्षियों के झुंड अपने घरौंदों की तरफ कलरव करते जा रहे थे हमे
भी अपने आश्रय स्थल की तलाश थी। राजा बाज़ बहादुर और रानी रूपमति के वैभव की कहानी अपने
दिल मे समेटे/सँजोये हमने भी अपने अगले पढ़ाव आश्रय स्थल की ओर रुख किया।
होटल मे अपने बैग को रख रात्रि मे होने बाले प्रकाश
एवं ध्वनि कार्यक्रम मे शामिल होने 7.00 बजे के कुछ मिनिट पूर्व स्थल पर पहुंचा।
घुप्प अंधेरे मे हिंडोला महल को पृष्ठ भूमि बना ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम अत्यंत
रंग-बिरंगी रंगो, सुंदर संगीत और दृश्यों को समेटे मांडू अपने वैभव की कहानी
सुना रहा था। कार्यक्रम अत्यंत ही सुंदर और मनभावन था। मांडू को मुगल शासकों ने
शादियाबद नाम रखा जिसका अर्थ है खुशियों का शहर जिसको छोटे से मांडू गाँव मे घूमने
पर पल पल महसूस किया जा सकता है। उस दिन मांडू गाँव मे प्राचीन चतुर्भुज मंदिर मे
बड़ा धार्मिक आयोजन चल रहा था जिसके अंतर्गत उस दिन पूरे गाँव मे मिट्टी के दिये
घरों,
दुकानों होटेलों मे रोशन किये जा रहे थे जो कि मंदिर के धार्मिक आयोजन का
हिस्सा था। कार्यक्रम उपरांत एक भोजनालय मे भोजन के बाद दिनभर की यात्रा और कुछ
स्पॉट के भ्रमण की थकान के बाद थक कर बेहद
चूर था अतः होटल पहुँचते ही कब सो गया पता ही न चला।
(शेष अगले अंक मे)
विजय सहगल











2 टिप्पणियां:
Aapki activities ko dekh kar hume aisa lagane laga hai ki hum bhi budhe nahi hue hai.Vaise hi log kahate rahte hai.Sir motor cycle se itani lambi yatra kamal ke vyakti hai aap.Aap apna ye lekh Kadambini magazine mei as it is with photos bhejiye avashya chhapega.Cheque bhi aayega.Regards aapka bhai snpandey
बहुत बडिया सर जी����
एक टिप्पणी भेजें