मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

रिकवरी


रिकवरी





यदि आप ट्रेन मे सफर कर रहे हैं और आपने समुचित टिकिट नहीं लिया या बगैर  टिकिट यात्रा करते पकड़े गये तो रेल विभाग न केवल रेल किराया  तुरत-फुरत बसूल करेगा  बल्कि किराये के अतिरिक्त जुर्माना भी लगायेगा इसके अलावा सजा का भी प्रावधान हैं जो छः माह तक का हो सकता हैं और और इस पूरी प्रक्रिया  मे आपकी इज्जत की जो थुक्का-फ़ज़ीती होगी बो  अलग जिसकी ज़लालत को आप सालों साल नहीं भूल पायेंगे। यदि आपने पैसेंजर का टिकिट लिया और मेल या एक्सप्रेस ट्रेन मे चढ़े तो जुर्म हैं। एक्सप्रेस मेल का टिकिट लिया और आरक्षण बाले डिब्बे मे चढ़े तो जुर्म हैं। मेल एक्स्प्रेस का टिकिट हैं और सुपर फास्ट ट्रेन मे चढ़े तो जुर्म हैं। साधारण टिकिट बाले राजधानी ट्रेन मे यात्रा करे तो जुर्म हैं। कहने का तात्पर्य हैं यहाँ आपने जाने अनजाने मे यात्रा के सैकड़ों नियम मे किसी एक की अनदेखी की तो आप  जुर्माना और सजा के भागीदार बन सकते हैं। हम दृढ़ मत के साथ कह सकते हैं हिंदुस्तान मे मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के हर एक उस  आदमी को  जो रेल से यात्रा करता हैं  को  अवश्य ही रेल तंत्र के इन घटनाओं से जीवन मे कभी न कभी  एक बार अवश्य ही रु-ब-रु होना पड़ा होगा। आपने मेल एक्सप्रेस का  टिकिट लिया और  अगर 10 रूपाय का सुपर फास्ट टिकिट नहीं लिया तो रेल्वे ने आपको एक अपराधी की तरह जुर्माना लगा कर आपकी इज्जत की छीछालेदर करने मे कोई कसर नहीं छोड़ी होगी। इसके विपरीत यदि आप बैंक का 10 रुपये, 10 हजार, 10 लाख तो छोड़ो  10 करोड़, 10 अरब या इससे भी ज्यादा रकम हड़प कर जाते हैं और मांगने के बाबजूद नहीं लौटते तो आप का बाल भी बांका होने बाला नहीं है। बल्कि ऋण की रकम जितनी ज्यादा होगी बैंक बालों को बसूली के लिये उतनी ही इज्जत से ऋणियों से  पेश आना पड़ेगा बर्ना खुद बसूली अधिकारी की नौकरी भी खतरे मे पड़ जाये तो कोई बड़ी बात नहीं। जहां एक ओर रेल्वे 10 रुपये की बसूली के लिये आपको अपराधी बना कर तुरत फुरत बसूली या जेल की सजा करा सकती हैं  बही दूसरी ओर बैंक अपने रुपये की बसूली के लिये सालों साल अपने  जूते घिसते रहते हैं और बसूली नहीं होती, "माल्या महान" इसके साक्षात उदाहरण हैं। एक देश एक कानून  पर बसूली के दो  रूप अलग अलग??  पर देश की  व्यवस्था का दुर्भाग्य देखिये रेल्वे के किराये की बसूली करना  और बैंक के ऋण की बसूली करने  के आदेश देने बाली  न्याय व्यवस्था अलग अलग बसूली कानून से संचालित होती है!! ऐसे कानून हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर बड़े सवालिया निशान खड़े करते है??  चलिये आगे बढ़ते हैं.....  

बात उन दिनों की है जब मेरा और मेरे मित्र श्री अश्वनी मिश्रा का स्थानांतरण डबरा (जि॰ ग्वालियर) शाखा मे हुआ और डबरा से हमारे मित्र श्री यशवीर सिंह और  श्री जय प्रकाश संतवानी का स्थानांतरण ग्वालियर शाखा मे हुआ। श्री संतवानी जो उन दिनों डबरा शाखा मे  ऋण और ऋण बसूली का कार्य देख रहे थे। हम चारों कार्य मुक्ति के समय डबरा शाखा की कार्यप्रणाली पर ऐसे ही चर्चा कर रहे थे। संतवानी जी  ने जाते समय हम से विशेष आग्रह किया कि ऋण के दो मामले मे हमने ऋणियों को उनकी आवश्यकता के अनुसार बहुत  ही कम समय मे ऋण दिया पर बसूली हेतु अपनी चप्पले घिसी और  अथक प्रयास किये पर निरर्थक। उन्होने व्यक्तिगत आग्रह कर कहा कि इन दो प्रकरणो मे लोगों से बसूली जरूर करे तो  हमे बड़ी खुशी होगी।  पहला ऋण बसूली का मामला  एक रेल विभाग मे कार्यरत  टीसी का था जिसको मकान निर्माण का ऋण दिया गया था। दूसरा न्यायालय मे कार्यरत 4 कर्मचारियों को वेतन के विरुद्ध व्यक्तिगत ऋण थे।

मैंने सबसे पहली प्रथिमिकता इन दोनों ऋण मामलों मे वसूली को रखा। पहले मामले मे रेल विभाग मे कार्यरत एक कर्मचारी जो टीसी के पद पर कार्यरत था और बैंक से ऋण लेकर स्टेशन के पास ही मकान के दो हिस्सों को निर्माण करा कर मकान को किराये पर देकर खुद रेल्वे के आवास मे रह रहा था।  दो भागों मे बने इस मकान को उसने सरकारी विभागों  को किराये पर दे रखा था जिससे उसे किराये के रूप मे  अतिरिक्त कमाई हो रही थी फिर भी वह मकान की  किश्ते जानबूझ कर अदा नहीं कर रहा था, रेल्वे की  नौकरी और पगार तो पक्की आ ही रही थी।  खाता एनपीए  हो गया था। हमने आते ही ऋणी को पूरा ऋण जमा करने का नोटिस दिया और सेर्फ़ेसी कानून  के अंतर्गत नोटिस देकर प्रॉपर्टि को बैंक के कब्जे मे लेकर पेपर मे विज्ञापन दे दिया। विज्ञापन के बाद दोनों किरायेदार जो सरकारी विभाग थे को नोटिस जारी किया कि वे  मकान खाली करे इसी बीच खाली न होने कि दशा तक  किराया बैंक को अदा करे। इस नोटिस की जानकारी के बाद उक्त रेल्वे कर्मचारी तमतमाते हुए एक दिन बैंक आया और क्रोध से बोला आप मकान खाली करने का नोटिस  देने बाले कौन होते हो? मैंने भी उसी लहज़े मे जबाब देकर कहा "मकान मालिक"! उस को बतलाया कि अब  बैंक ही मकान मालिक की हैसियत से किरायेदार से मकान को खाली कराने का नोटिस देकर मकान को खाली करने का आग्रह कर रहा  हैं? ताकि बैंक  खाली मकान की  नीलामी करा कर ऋण राशि की बसूली कर सके। अब तो टीसी महोदय के होश फाख्ता थे। कानून की  ताकत का अहसास उन्हे हो गया था। हमने उनसे स्पष्ट कहा आप समस्त अति देय किश्ते तुरंत जमा करें और भविष्य मे यदि  कोई किश्त देरी से आई तो मकान कि नीलामी तय हैं। उन्होने पूरा अतिदेय जमा कराया। और भविष्य की किश्ते मेरे रहते लगातार खाते मे जमा कराते  रहे।

दूसरे मामले मे न्यायालय के जो 4 कर्मचारी थे। उन चारों के खाते भी एनपीए थे और औसतन हर खाते मे 40-50  हजार रूपये  अति देय थे।  उनको भी हमने पूरा ऋण जमा करने का नोटिस दिया। उसके बाद ऋणियों द्वारा दिये गये कुल ऋण राशि  के चैक को बैंक मे प्रस्तुत किया जो "अपर्याप्त धनराशि" के कारण बैंक से बापस आ गये। उन बापस चैक के आधार पर चारों को बकील के माध्यम से चैक कि रकम जमा करने का नोटिस दिया। जैसा कि होता हैं उन कर्मचारियों ने नोटिस को हल्के मे लिया मै भी यही चाहता था। किसी भी कर्मचारियों ने कोई पैसा जमा नहीं किया। हमने नेगोशिएबिल इन्स्ट्रुमेंट एक्ट कि धारा 138 के तहत मामला बैंक एडवोकेट के माध्यम से कोर्ट मे दाखिल कर दिया। केस रजिस्टर्ड होने के पूर्व हमे कोर्ट मे प्रस्तुत होना था। हम जैसे ही कोर्ट मे पहुंचे प्रायः जैसे  न्यायालय होते हैं उक्त न्यायालय  उनसे कुछ हट के था। महापुरषो के सुंदर सुंदर सद्वाक्य लिखे थे गांधी जी, गौतम बुद्ध, भगवान महावीर, अंबेडकर जी  की तस्वीर लगी थी देख कर अच्छा लगा था। एक सुंदर और गहरा संदेश देती दो लाइन की कविता भी लिखी थी जो मेरे दिल को छू गई। उसमे सुंदर लेखनी से लिखा था :-

"बीती हुई इस घड़ी को कौन लौटा पयेगा।
इस धरा पर इस धरा का सब धरा रह जायेगा॥"

मैंने इन लाइन को कोने मे खड़े हो के यूं ही अपने पास लिख कर रख लिया। इतने मे बैंक का नाम लेकर अर्दली ने "हाजिर हो की आवाज लगाई"। मै कोर्ट के माननीय न्याधीश के समक्ष बैंक के बकील के साथ उपस्थित हो गया। जैसे ही मै माननीय न्यायाधीश के समक्ष पहुंचा अभिवादन कर मै उनके सामने खड़ा था। उन्होने पूंछा आप ही है बैंक के मैनेजर? मैंने स्वकृति मे अपना सर हिलाया। वह बड़े अनौपचारिक अंदाज़ मे मुस्करा कर  बोले "मैनेजर साहब आपने हमारे बाबुओं के विरुद्ध हमारी ही कोर्ट मे केस फ़ाइल किया हैं? ऐसा सुन कर मुझे लगा शायद मुझसे कोई गुस्ताख़ी हो गई!  मेरा मानना हैं कि न्यायालय मे बड़े से बड़े तीस मारखाँ ढीले पड़ जाते हैं। मै तो अदना सा मैनेजर ठहरा।  मैंने कहा श्रीमान हम लोग तो नौकर हैं। उच्च अधिकारियों का आदेश हुआ तो केस फ़ाइल कर दिया। आपका आदेश हो तो अभी  केस बापस ले  कर कोर्ट के बाहर चला जाता हूँ। माननीय न्यायाधीश बड़े अपने पन से बोले नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं। मैंने इन  सब बाबुओं को आज सुबह बुलाया था और उन सब को चेतावनी दी कि बैंक का पैसा बापस करों अन्यथा केस पंजीकृत कर कार्यवाही करेंगे एवं साथ ही साथ  विभागीय कार्यवाही भी करेंगे।  ऐसा सुनकर मै थोड़ा सहज हुआ। उन्होने मुझे इन कर्मचारियों को थोड़ा वक्त देने की गुज़ारिश की ताकि वे ऋण की राशि जमा करने का इंतजाम कर सके और मुझे अगली तारीख दे कर कहा कि हम उन कर्मचारियों को एक मौका देना चाहते है ताकि वे लोग  बैंक का ऋण बापस करें अन्यथा हम न्यायोचित कार्यवाही करेंगे। कुछ दिन बाद  न्यायधीश महोदय का बुलावा आया। उन्होने चारों कर्मचारियों के साथ हमारी मीटिंग की। उन्होने बताया कि  सभी कर्मचारियों ने यहाँ वहाँ से पैसा एकत्र किया है चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं यदि आपके बैंक के नियमानुसार कुछ ऋण राशि या व्याज मे छूट मिल सकती है तो आपकी इन के लिये बड़ी मदद होगी। हमने कुछ दिन का समय मांग कर अपने प्रादेशिक कार्यालय मे श्री प्रवीण पोद्दार से उक्त संबंध मे समुचित कार्यवाही का निवेदन किया  जो उन दिनों  रिकवरी विभाग का कार्य देख रहे थे। ऋण काफी पुराने थे एवं एनपीए थे। प्रवीण जी ने भी तुरंत कार्यवाही कर प्रत्येक कर्मचारी को अच्छी ख़ासी रकम बैंक नियमानुसार  छूट प्रदान कर दी।  जब हमने पुनः माननीय न्यायधीश से संपर्क कर उनको बैंक कि तरफ से दी गई छूट का निर्णय से अवगत कराया। जिसे सुनकर चारों कर्मचारी खुश थे। जल्दी ही उनलोगों ने समझौते कि रकम बैंक मे जमा कर दी हमारा आभार जता कर  अभिवादन कर बैंक और हमारे प्रति  कृतज्ञता ज्ञपित की।

उन जज साहब और उनकी कोर्ट कार्यालय की तस्वीर आज भी हमारे मन मे बसी है। उनकी कोर्ट मे लिखी उक्त कविता को मैं यदा कदा उद्धरत करता हूँ जो मुझे आज भी कंठस्थ है।

विजय सहगल

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