-:माहेश्वर
-2:-
29 नवम्बर 2019 को तय कार्यक्रमानुसार सुबह
6 बजे उठ कर नर्मदा नदी के तट की ओर प्रस्थान किया। घाट पर बहुत कम लोग थे। प्रसार
भारती के ऐप पर विविध भारती के दिल्ली
केंद्र से सुंदर सुंदर मनभावन भजनों का श्रवण करते हुए मै भी घाट की बुर्ज पर बैठ सूर्योदय
का इंतज़ार करने लगा। घाट साफ सुथरा था एक-दो स्थानीय व्यक्ति नहा रहे थे। यध्यपि
मै भी नहाने का विचार ले कर ही होटल से निकला था,
पर मन मे ये सोचा था कि अपरचित नदी तट के
किनारे पहले दूसरों को नहाता देख नदी की गहराई और खतरे का अध्यन कर लिया जाये,
यदि परिस्थिति अनुकूल हुई तभी डुबकी लगाने उतरेंगे। जब खतरे का न्यूनतम अनुमान लगा
लिया तभी बैग से तौलिया,
अंडर बीयर बनियान निकाल पास की सीढ़ियो पर रख नर्मदा मैया को प्रणाम कर पानी मे
उतरे। मै समझता था हरिद्वार मे गंगा नदी
की तरह पानी ठंडा बर्फ की तरह होगा पर
हमारी सोच के विपरीत पानी सद्द सा हल्का गुनगुना था। तुरंत ही दो -तीन
सीढ़ी उतर कर शरीर को पानी के अनुकूल ढाल पानी मे छलांग लगा दी। थोड़ा तैरना आने के कारण
नदी मे 8-10 कदम तैरते हुए, पानी मे डुबकी
लगा कर बापस आये। ठंड का कोई अहसास नहीं था। अब तो एक के बाद एक पाँच-छह डुबकी लगा नर्मदा स्नान किया और तब नर्मदा नदी और उगते सूरज को प्रणाम कर
नदी से बापस आये। शरीर मे एक नई शक्ति और ऊर्जा को महसूस कर कपड़े बदल कर नर्मदा तट
के घाटों का प्रातः कालीन भ्रमण शुरू किया। सूर्योदय के कुछ चित्र ले घाट पर आगे
बढ़ा। अब तक श्रद्धालुओं का नदी के तट पर आना भी शुरू हो गया था। बड़ी संख्या मे
ग्रामीण महिला पुरुष एक डंडी और पानी का कड़ीदार स्टील का डिब्बा लिये नज़र आये। ये
वो श्रद्धालु थे जो नर्मदा नदी की पैदल परिक्रमा करने के पुण्य उद्देश्य लेकर महीनों की
यात्रा नदी के किनारे किनारे करने के लिये निकले थे। नर्मदा नदी की परिक्रमा लगभग
600 किमी लंबी होती है जो एक कठिन व्रत और तप की तरह होती है। इसके करने बाले बड़े
ही जीबट बाले साहसी और कठिन व्रतधारी होते है।
अब तक सूरज भी आसमान मे तेज चमक के साथ अपनी
उपस्थिती दर्ज़ करा चुका था। चाय की तलब हमे मोहन चाय बाले की दुकान पर ले आई। जो
अभी अभी ही चाय की पतेली चढ़ा चुका था और जिसे बगैर चीनी की चाय देने मे कोई हर्ज़
नहीं था। बढ़िया चाय वो भी पाँच रुपए मे। .....और क्या चाहिये.............. !! एक
बार फिर से हम अहिल्याबाई घाट से होते हुए विश्वनाथ मंदिर के रास्ते होटल पहुंचे।
10 बज चुके थे। सामान पैक कर "कृष्णा होटल" के कोम्प्लीमेंट्री नाश्ते
के लिये ऑर्डर किया। मालिक नहीं था उसके छोटे भाई ने हमसे पैसे ले कर बाज़ार से लाकर
नाश्ता कराया और पैसे को बापस करने का आश्वासन दिया पर पैसे की बापसी का हमे अभी भी इंतज़ार है।
11
बजे तक सामान लेकर होटल से विदा लेकर हम पुनः गिरीश पंडित जी के सावंरिया
रेस्टुरेंट मे पहुंचे ताकि सुबह का भोजन कर माहेश्वर से प्रस्थान किया जाये। कुछ
समय इंतज़ार के बाद एक बार यहाँ पुनः गरमा गरम खाना खा कर कुछ कदम दूर तट पर पहुँच नर्मदा मैया को प्रणाम कर एक बार पुनः आने की आशा
लिये बापस इंदौर के लिये निकले। लोगो ने महू-माहेश्वर मार्ग से इंदौर जाने की सलाह
दी। लोगो ने बताया कि ये रास्ता अच्छा और कम ट्रैफिक बाला है,
और ऐसा था भी। हमको मंडलेश्वर होकर ही महू जाना था। कुछ लोगो के बताये अनुसार हमने मंडलेश्वर मे भी नर्मदा के घाट का भ्रमण
करने का निश्चय किया लेकिन निराश हुआ क्योंकि मंडलेश्वर के घाट माहेश्वर के घाटों
के सामने दूर दूर तक मुक़ाबले मे नहीं थे। अब हमारी मोटरसाइकल महू की तरफ दौड़ने लगी
लेकिन अपनी मंथर गति से। रास्ता शांत खेत खलिहानों से होकर गुजर रहा था। यहाँ से
जामगेट 35 किमी था जो पहाड़ की ऊंचाई पर बना था और 8-10 किमी पहले नीचे घाटी से उपर
पहाड़ी पर दूर से नज़र आ रहा था। इस रास्ते से हम घाट की चढ़ाई पर चढ़ते हुए पहुंचे।
दूर बहुत दूर किले नुमा इमारत जो जाम गेट
थी हमे नीचे से दिखाई दे रही थी। घाट की चढ़ाई चढ़ते हुए हम जाम गेट की ऊंचाई पर
पहुंचे। जहां पर लंगूरों की फौज हमारे स्वागत के लिये तैयार थी। एक छोटा नमकीन का
पैकेट मेरे पास था जिसे मेहमानवाजी वश मैंने उन लंगूरों को अर्पित किया उनमे से कुछ ने हमारी मोटरसाइकल पर
बैठ मेरे हाथ से नमकीन उठा-उठा कर एक अच्छे मेहमान की तरह ग्रहण किया। जाम गेट कुछ
इस तरह बना था कि इसके एक ओर पहाड़ और दूसरी ओर खाई है और एक मात्र रास्ता गेट के
अंदर से होकर ही जाता है। हमे लगता है राज्य या जागीर की सुरक्षा के खातिर ही इसका निर्माण तत्कालीन
राजा या नाबाबों द्वारा कराया गया होगा ताकि कोई भी व्यक्ति बगैर अनुमति के प्रवेश
या निकासी नहीं कर सके। कुछ मिनिट दरबाजा पार कर मैंने पहाड़ और खाई के बीच दरबाजे
को देखा एक सेलफ़ी भी ली। आसपास चाय नाश्ते के स्टाल भी लगे थे। आने जाने बाले कुछ रुक कर सेलफ़ी आदि
ले गहरी घाटी को बड़े गौर से निहार रहे थे। सूरज का प्रकाश अनुकूल न होने के बाबजूद
हमने एक फोटो घाटी की ली जो बहुत ज्यादा अच्छी नहीं आई। आगे रास्ता खेतों,
खलिहानों के आसपास सड़क के दोनों ओर बसे ग्रामीण आवासों से होकर जा रहा था। अगले
20-25 किमी ऐसे ही शांत रास्ते से गुजर कर हम महू की ओर बढ़े। इस तरह महू मे डॉ॰ अंबेडकर की जन्मस्थली के
दर्शन पश्चात हम लगभग 6 बजे हमारे मित्र विजय गुप्ता जी के इंदौर स्थित कार्यालय
से साथ साथ उनके आवास पर पहुंचे जहां पर हमारे एक अन्य मित्र श्री विनोद अग्रवाल
के साथ 2-3 घंटे गपशप और यात्रा व्रतांत की चर्चा
कर भोजन उपरांत रात्रि विश्राम किया।
(महू
स्थित डॉ॰ अंबेडकर जन्मभूमि विवरण अगली पोस्ट मे)
विजय सहगल







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