सोमवार, 16 दिसंबर 2019

मांडू-2


"मांडू-2"

























28 नवम्बर 2019 को सुबह 6.00-6॰15 बजे आँख खुली तो काफी अच्छा महसूस कर रहा था,  कल दिन भर घूमने और यात्रा की थकान नदारद थी। 10-15 मिनिट यूं ही आलस दूर कर दैनिक कार्यों से निवृत्त हो  गरम पानी से नहा धोकर मांडू के शेष बचे पर्यटन स्थलों को देखने के लिये तैयार हो गया। लगभग 7 बजे हम शाही महल के परिसर मे टिकिट लेकर दाखिल हुआ। उक्त स्थल मे शायद मै  ही पहला दर्शक था जो उस विशाल शाही महल परिसर मे भ्रमण कर रहा था। इस विशाल लंबे चौड़े परिसर मे लगभग चारों ओर तालाब, बाबड़ी बनी हुई थी। मांडू का ये मुख्य पर्यटक स्थल शाही महल परिसर है जिसमे छोटे-बड़े 14 महल, तालाब, ड्योड़ी, मस्जिद आदि है। परिसर के प्रवेश द्वार पर पूरे क्षेत्र का मानचित्र बनाया गया है जिसमे 14 दर्शनीय स्थलों के नाम अंकित थे। इसी परिसर मे एक संग्रहालय भी बनाया गया है जिसको प्रातः 10 बजे से देखा जा सकता है।  

सूर्योदय मे परिसर मे स्थित जहाज महल पर उगते सूरज की सुनहरी किरणों से जहाज महल काफी खूबसूरत लग रहा था। सुबह के सुहावने और गुलाबी सर्दी के मौसम मे  और हल्की गुनगुनी धूप अच्छी लग रही थी। भ्रमण के साथ सुबह का घूमना भी हो रहा था। इस विशाल दो मंज़िला महल के चारों ओर पानी के तालाब बने है पर पश्चिम की  ओर पूरा महल विशाल तालाब के एक किनारे को घेरे  खड़ा है।  इसी कारण पश्चिमी तट से ऐसा प्रतीत होता है मानो विशाल जल भंडार मे कोई बड़ा दुमंजिला पानी का जहाज खड़ा हो इसीलिए इस महल को जहाज महल का नाम दिया गया है। इस शानदार वास्तुशिल्प की इमारत के एक ओर जहां पानी है वही दूसरी ओर प्रवेश द्वार सुंदर घास के मैदान और सजावटी पौधों से घिरा था जिससे  पर्यटन विभाग द्वारा संरक्षित परिसर स्थल की सुंदरता मे और भी निखार आ रहा था। साफ सुथरे मार्ग के बाये मे जहाज महल का प्रवेश द्वार और मार्ग के दूसरी तरफ दायें  तबेली महल, कपूर तालाब, हिन्दू बाबड़ी तथा अन्य अर्धखंडहर महल और किले बने है लेकिन अच्छे रखरखाब के कारण आँखों को सुंदर दिखाई देते है। हर इमारत के बाहर उस इमारत का संक्षिप्त परिचय दिया हुआ है अतः हमने किसी गाइड की सेवा की आवश्यकता महसूस नहीं की यों भी राजों, नाबाबों और रियसतदारों के इतिहास जानने की कभी बहुत ज्यादा  ईक्षा हमारी नहीं रही। बैसे भी इन एतिहासिक इमारतों के बनवाने बाले सियासत दानों से ज्यादा हमारी रुचि इन इमारतों के बनाने बाले कामगारों, मजदूरों, शिल्पकारों, वास्तुकारों के अनोखे वास्तु निर्माण मे रही है, जिनके मेहनत और सधे हाथों की कारीगरी दूर दूर से आये पर्यटकों को लुभाती रही है, पर इन कामगारों, वास्तुकारों, मजदूरों की बनाई  अनूठी इमारतें शतकों से आज भी हमे इन्हे देखने के लिये प्रेरित करती है पर खेद है  ये कामगार, वास्तुशिल्पी इतिहास के पन्नों मे गुमनामी के अंधेरे मे कहीं खो गये फिर चाहे कारीगर इन इमारतों के बनाने बाले हों या ताजमहल बनाने बाले कारीगर।     

जहाज महल के मुख्य हाल मे 4-5 बड़े बड़े बराण्डे है जिनके उपर एक खुली छत्त मानों जहाज के ऊपरी डेक का आभास कराती हो। छत्त के  दोनों छोरों पर बने छोटे गुंबद जहाज के  मस्तूल का अहसास कराते  है जिस तक पहुँचने के लिये नीचे से सीढ़ियाँ बनी है। जहाज महल के आगे हिंडोला महल है इसी महल को पृष्ठभूमि बना रात्रि मे यही प्रकाश और ध्वनि कार्यक्रम होता है। चूंकि ये महल हिंडोला अर्थात झूले से दिखाई देता है इसलिए इसका नाम हिंडोला महल पड़ा। इस महल मे  कहाँ से हिंडोला की भ्रांति होती है नहीं पता? पर इस महल को  देख कर हमे कहीं से हिंडोले की आकृति प्रतीत नहीं होती।   बैसे भी इतने बड़े हिंडोले हम जैसे छोटे लोगो ने कही कभी कल्पना मे भी नहीं देखे, ये भी शायद बड़े  नाबाबों के बड़े चोचले हों शायद? पूरे मांडू मे बनी इमारतों मे ज्योमिति विज्ञान के नमूनों के उत्कृष्ट उदाहरण  देखने को मिलते है वो इस हिंडोला महल के भीतरी बरामदों मे भी देखने को मिले। हर वरांडे के मेहराब दूर से देखने मे अति सुंदर प्रतीत  हो रहे थे।
आगे आयताकार रूप मे बनी दिलाबार खान मस्जिद है जो स्तम्भ युक्त गलियारे के रूप मे बनाई गई है और जिसके बीच मे एक विशाल खुला आँगन है यहाँ भी स्तंभों की ज्योमिति देखने को मिलती है। अन्य अनेक महल नुमा अर्ध खंडहर इमारतों से होकर हम तालाब के बीच मे निर्मित इमारत जल महल मे पहुंचे जो चारों ओर पानी से घिरी एक सुंदर टापू सी प्रतीत हो रही थी। जहां से पूर्वी छोर पर जहाज महल साक्षात पानी के जहाज के रूप मे द्रष्टिगोचर हो रहा था। पुरातत्व विभाग द्वारा उक्त महल के जीर्णोद्धार का कार्य प्रगति पर था।

एक बात जो  जो इस शाही परिसर मे कदम कदम पर देखने को मिली वह थी जल प्रबंधन। पूरे विशाल परिसर  मे जल का प्रबंधन बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से किया गया था जिसके नमूने आपको कदम कदम पर देखने को मिलेंगे। जल संग्रहण के लिये अनेकों छोटी बड़ी बाबड़ी, तालाब, हौद और अनेकों इकाइयों को बनाया गया था। वरसती पानी को एकत्रित करने के लिये छत्तों, खुले प्रांगण से बहने बाले जल को एकत्रित करने का इंतजाम जगह जगह देखने को मिला। जल के इस संचय और संग्रहण का जीवित प्रयोग इस पर्यटन स्थल को अन्य जगहों से अलग करता है। अब तक इस परिसर मे घूमते हुए लगभग तीन घंटे हो चुके थे अब चाय की तलब और नाश्ते की भूंख लगने  लगी थी। शाही परिसर से बापसी मे एक होटल से पोहे के साथ फीकी चाय का ऑर्डर  दिया पर पोहे तो ठीक थे चाय मीठी ही निकली पता चला यहाँ दूध मे पहले से ही चीनी मिला कर रखते है जिससे ही चाय बनाई जाती है। चाय को यूं ही छोड़ पास मे ही स्थित चतुर्भुज मंदिर के दर्शन हेतु पहुंचे। जहां पर एक बहुत बड़े धार्मिक आयोजन चल रहा था। छोटे से कस्बे मे काफी लोग एकत्रित थे। स्थानीय विधायक और आस पास के श्रद्धालूगण मंदिर परिसर मे एकत्रित होकर मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम मे शामिल हो रहे थे। भगवान श्री राम-सीता और लक्षमन के  दर्शन पश्चात मंदिर के सामने एक बार फिर चाय का ऑर्डर दिया चाय बाले ने बहुत ही स्वादिष्ट फीकी चाय बना कर दी तबीयत खुश हो गई। मंदिर मे फोटोग्राफी निषेध थी अतः फोटो नहीं ली।

अब वही पास मे स्थित चौथे पर्यटन स्थल पर पहुंचे जहां पर तीन स्पॉट दर्शनीय थे जो एक ही परिसर मे स्थित थे। सबसे पहले जमा मस्जिद देखी जिसकी सीढ़ियाँ भोपाल की ताजुल मस्जिद की तरह बनाई हुई थी। पर वास्तु की द्रष्टि से मांडू की मस्जिद का वास्तु निर्माण अति उत्क्रष्ट था। अनेकों स्थम्भों की ज्योमिति वास्तु पर बनी मस्जिद वास्तु शिल्प का उत्क्रष्ट नमूना थी। मस्जिद से होकर ही जाने बाले रास्ते से होशंगशाह का मकबरा पहुंचे जो एक ऊंचे चबूतरे पर संगमरमर के गोल गुंबद के आकार का ताजमहल की तर्ज़ पर बना था लेकिन एक मात्र अंतर उसको ताजमहल से अलग करता था वह था छोटा आकार और कोई भी मीनार का उस चबूतरे पर न होना। उसी मकबरे के बगल मे आयताकार विशाल कक्ष के रूप मे हिन्दू वास्तु पर बनी समानान्तर स्तंभों पर निर्मित धर्मशाला जिसके सैकड़ों स्तम्भ भी ज्योमिति वास्तु पर आधारित उत्तम वास्तुशिल्प को दर्शा रहे थे। बिलकुल एक सीध मे बने स्तम्भ सूत दर सूत समान दूरी पर।  इसके साथ ही मांडू के मुख्य मुख्य स्थलों का दर्शन पूर्ण हो चुके थे। लगभग 11 बजे होटल मे पहुँच सारे समान को पैक कर एक घंटे का विश्राम किया क्योंकि होटल का चैक आउट समय 12.30 था।  विश्राम पश्चात हमारी यात्रा पुनः शुरू हुई और हमारा अगला पढ़ाव था मांडू से  लगभग 45 किमी दूर नर्मदा नदी के तट पर बना पवित्र तीर्थ माहेश्वर। जिसका विवरण अगली पोस्ट मे।

विजय सहगल              

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