"खोया बचपन"
ये कुछ पंक्तियाँ उन बच्चों को समर्पित जो भवन-निर्माण
कार्यों मे लगे अपने मजदूर माँ-बाप के जीविकोपार्जन के कारण गाँव के अपने स्कूल को
छोड़ कर महानगरों परिवार के साथ यूं ही दर-दर भटक कर अपना बचपन खो चुके हैं या धीरे-धीरे
ऊसे खोने की कगार पर हैं, उनकी व्यथा-कथा!!
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर।
जमाने को खुशियाँ! मुझे गम यहाँ पर?
बच्चों को आँगन तुमने दिया था।
बचपन-लड़कपन सबने जिया था॥
मखमल की चादर चाँदी का खिलौना।
धूल भरा रस्ता फटा सा बिछौना
॥
मेरे हिस्से आया, मुझको बयाँ
कर?
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर।
सुंदर सी वर्दी, बस्ते-किताबें।
इठलाके जाना लड़कपन बतावें॥
प्यारा मदरसा,
मोहब्बत के किस्से।
निरक्षर जवानी,
मुफ़लिसी मेरे हिस्से॥
चढ़ा आसमां वो,
सरजमीं मै कहाँ पर?
नहीं हैं शिकायत मुझे इस
जहाँ पर॥
रहने को उनके हवेली सजाना।
कच्चा घरौंदा तब खुद बनाना॥
रहने को जब वे हवेली मे आये।
उजड़ा घरौंदा वतन फिर पराये॥
देकर उन्हे घर,
मेरा घर फिर एक-खुले आसमां पर।
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर॥
नेकी ख़ुशी और बरक्कत बनादो।
दो जून की बस रोटी खिला दो॥
स्कूल का गम-बचपन का रोना।
तसल्ली दिलाना यादों मे खोना॥
बचपन भुला कर उसे तूँ जवाँ कर।
नहीं हैं शिकायत मुझे इस जहाँ पर॥
विजय सहगल

2 टिप्पणियां:
Bahut khub sir,kavi ban gaye.
Realy bahut sundar rachna likhi hai.
उत्साह वर्धक शब्दों के लिये धन्यवाद!
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