"बसई"
गर्मियों
की छुट्टी मे प्रायः सभी बच्चे अपने मामा, चाचा, बुआ या मौसी के घर छुट्टियाँ बिताने जाते थे। बचपन मे मेरा अपने बड़े भाई
प्रदीप के साथ मध्य प्रदेश के जिला दतिया के एक छोटे से गाँव बसई आना जाना बहुत रहा।
बसई मे मेरे फूफाजी स्व॰ श्री भगवत नारायण
कंचन वहाँ के सरकारी विध्यालय मे प्राचार्य थे और बसई मे ही छोटे से मकान मे
किराये से रहा करते थे। आज का तो पता नहीं
पर उस समय बसई एक बहुत छोटा सा गाँव ही
था। उन दिनों वहाँ पर बिजली भी नहीं थी। रात के नितांत अंधेरे मे डूबा छोटा गाँव
बहुत शांत और सुंदर लगता था। फूफा जी को शतरंज खेलने का बहुत शौक था। वे अपने
मित्र के साथ स्कूल से आने के बाद दिन या रात को फुर्सत के खाली समय मे शतरंज खेला
करते। उनको देखा देखी हमने भी थोड़ा बहुत शतरंज खेलना सीख लिया था। शौचालय के लिये
घर से 60-70 कदम दूर जाना पड़ता था। दिन मे तो कोई बात नहीं पर रात मे अकेले जाने
मे अंधेरे से डर लगता था इसलिये अपने बड़े भाई को साथ ले जाया करता। जब तक हम
शौचालय मे होते लगातार थोड़ी-थोड़ी देर मे आवाज लगाते रहते "तुम हो न"?? अगर उत्तर देने मे कुछ भी विलंब हुआ तो आधा-अधूरा शौच निपटा कर तुरंत
बाहर भागते, कहीं ऐसा तो नहीं भाई खुद डर कर घर आ गये हों।
सुबह सुबह कभी बर्फ के साथ और कभी बिना बर्फ के रूह अफ़जा या दही या दूध की लस्सी
पीने मिलती क्योंकि बर्फ की उपलब्धता बढ़े लोगो या यूं कहे एक विलासता की वस्तु
होती थी। उस समय मे 10-20 पैसे मे एकाध पाव बर्फ मिलती थी।
लस्सी ग्रहण करने के बाद अपने अपने कपड़े-लत्ते लेकर हम लोग बुआ के साथ रहट पर
नहाने निकल जाया करते, जो घर से 1-1.5 कि॰मी॰ दूर खेतों के किनारे
आमों के पेड़ों के बीच हुआ करती थी। बुआ जी
अपने कपड़े के गट्ठर को धोने मे लग जाती तब तक हम लोग एकाध घंटे रहट के पानी से
मस्ती करते हुए खूब नहाते। रहट के पानी से नहाते और नहरों से बहते हुए पानी को दूर खेतों के बीच से रेल गाड़ी का आना-जाना देखना
बड़ा अच्छा लगता था। यात्री गाड़ी हो तो लोगो को डिब्बों मे बैठा देखना, हाथ हिलाते देखना कौतुहल का बिषय होता और यदि मालगाड़ी होती तो उसके
डिब्बों को गिनना और गार्ड साहब को हरी झंडी हिलाते देखना एक शगल होता। रहट से
बापस आने के बाद कड़क भूख लगती और प्रायः
पराठे के साथ सब्जी का नाश्ता कम खाना एक साथ हो जाता। कड़ी धूप और गर्मी मे निकलने
का तो कोई सवाल ही नही "जाये तो जाये कहाँ जायें" इसलिये हाथ का पंखा झलते
हुए नीचे दालान मे पड़े रहते। नींद तो आती नही थी लेकिन उस समय का देशी टी॰वी॰ की
खोज कर उसको देखा करते। आप हैरान होंगे कि गाँव मे जब लाइट ही नही थी तो टी॰वी॰ का
क्या मतलब? उस समय बसई मे क्या हिंदुस्तान मे भी टी॰वी॰ नहीं
आया था। होता इस तरह था। कि सड़क के गेट को बंद कर जब कोई तेज धूप मे सड़क से निकलता
तो उसकी ब्लैक एंड व्हाइट या कभी कभी गहरे रंग के कपड़े होने पर रंगीन परछाई दरवाजे
के उपर की दरांचो से दरवाजे के उपर दीवार पर हू-ब-हू बनती एवं चलती-फिरती दिखाई देती! जिसे देख कर
खूब उत्साहित होते। कभी कोई व्यक्ति साइकिल से निकलता तो बड़ी सुंदर चलती फिरती
फिल्म देखकर विज्ञान की दुनियाँ मे खो जाते। चूंकि गाँव छोटा था हर समय कोई आता
जाता नही दिखता तो हम दोनों भाइयों मे से ही कोई भरी दोपहरी मे दरवाजे के बाहर
फिल्म का हीरो बन कर एक्टिंग करते हुए
यहाँ से वहाँ निकलता फिर एक दूसरे से पूंछते की तुम क्या बनते हुए या करते
हुए निकले थे ताकि परछाई से बनी फिल्म की सत्यता की पुष्टि की जा सके। उन दिनों
रात मे घरों मे रोशनी के लिये मिट्टी के तेल का दीपक जिन्हे हम लोग ढिवरी भी कहते थे जलाये जाते
थे। कपड़े की बाती को मिट्टी के तेल मे भिगो कर जलाते थे। एक रात शतरंज खेलते समय
"मिट्टी के तेल का दिया" लुढ़क गया बोरी-फट्टी जिस पर बैठ कर शतरंज खेल
रहे थे उसमे आग लग गई बड़ी मुश्किल से आग
पर काबू पाया तब तो बुआ-फूफाजी की खूब डांट लगी। एक बार शाम का खाने के बाद पैदल
घूमते घामते बसई रेल्वे स्टेशन तक रात के घुप्प अंधेरे मे सन्नाटे के बीच फूफाजी
के साथ "चालक बंदर और धूर्त मगरमच्छ को मीठे जामुन खिलाने" की कहानी
सुनते हुए गये। वह यादगार कहानी और निस्तब्ध
स्याह काली रात मुझे आज भी अच्छे से याद है। रात मे छत्तों पर जमीन मे लाइन लगाकर
विस्तर लगा कर सोना का एक अलग ही सुख का अहसास कराता था। निपट अंधेरी रात मे आसमान मे बिखरे लाखों
तारों की चमकती रोशनी को देखना एक अलग ही
सुखद और यादगार अहसास देता। टिमटिमाते तारों से भरे अंतहीन आकाश मे अपने अस्तित्व
के बारे मे सोच कर एक अल्पता भरा आभास होता
ऐसा लगता मानो इतने बड़े तारों भरे स्याह आकाश मे अदने से आदमी क्या
अस्तित्व हैं।
मैं
11-12 साल का रहा हूंगा अपनी दोनों छोटी बहिनो के साथ स्कूल की छुट्टियों मे पुनः बसई जाना हुआ। वहाँ पहुँच कर पड़ौसियों से पता
चला बुआ-फूफाजी तो अपने घर तालवेहट गये हुए हैं। उन दिनों संचार संपर्क के इतने आम
सुलभ साधन नही थे। झाँसी से बसई के लिये भी सुबह शाम की ही बस सेवा थी। अब तो बड़ी
मुश्किल, क्या किया जाए? जैसे आये थे उल्टे पाँव बापस जाने
को सोच कर बस स्टैंड की तरफ जैसे ही कदम
बढ़ाये फूफाजी के पड़ौस मे रह रहे एक परिवार की महिलाओं ने हम तीनों छोटे-छोटे बच्चो
के बारे मे पूंछ परख की। जब उन्हे पता चला मास्टर साहब (बसई मे फूफाजी को लोग इसी
नाम से संबोधित करते थे) और बहिन जी (मेरी बुआ) के भतीजे भतीजी हैं तो उन लोगो ने
हमे अपने घर बुला लिया और बापस ये कहते हुए नहीं जाने दिया कि क्या हुआ तुम्हारी
बुआ नहीं हैं हम भी तुम्हारी बुआ की तरह हैं जब तक बहिन जी नहीं आ जाती तुम लोग
यही रुको। बहिन जी को जब मालूम पड़ेगा कि बच्चे आये थे और हमारे न होने की बजह से
बापस चले गये तो हमसे नाराज होंगे। उस
अपनत्व और ममतामयी माँ का आग्रह मैं न ठुकरा सका। ये सोच कर शायद अगले दिन बुआ आ
जाएंगी हम तीनों बच्चे उनके घर रुक गये। बड़ी सी हवेली नुमा वो घर काफी बड़ा था। घर
के बाहर लंबा चौड़ा चबूतरा उस घर कि संपन्नता को बयां कर रहा था। घर के बड़े आँगन मे
एक ओर रसोई थी जिसमे सुबह शाम का खाना होता। उस दिन बालमन पर बुआ के घर बसई मे उन को न पाकर
जो संकट सा लग रहा था उसे उस घर के सारे सदस्यों ने अपने प्यार और
अपनेपन के व्यवहार से बुआ के बसई मे न होने की कमी को दूर कर दिया था। हमे कुछ कुछ याद हैं उस परिवार
का बसई मे बस स्टैंड के पास बड़ी दुकानों मे अच्छा व्यवसाय था। वे कौन लोग थे नहीं जानता पर संयुक्त परिवार के सभी लोग बहुत ही स्नेहिल
और अच्छे लोग थे। इन 50 साल मे दुबारा बसई जाना नहीं हुआ। हम तीनों लोग उस परिवार
से ऐसे हिल-मिल गये कि बुआ के अगले
दिन-अगले दिन आने की बाठ जोहते रहे और उस
परिवार ने हमे आग्रह पूर्वक रोके रखा। 3-4 दिन निकल गये पर बुआ-फूफाजी का आना नहीं
हुआ और हम उन श्रेष्ठ जनों के परिवार मे
ही 3-4 दिन रुके रहे। आखिरकार चौथे या पांचवे दिन हम लोग बिना बुआ के बसई आये और बिना
मिले अपने घर बापस झाँसी पहुंचे।
आज
लगभग 48-50 साल बाद कभी सोचता हूँ कि बसई जैसी छोटी से जगहों या अन्य ऐसे छोटे
कस्बों मे आपसी भाई-चारा, रिश्ता, दूसरों के सुख-दुःख मे सांझेदारी, या दूसरों के रिश्तों को इतनी संजीदगी से निभाया जाना, जिसकी कल्पना भी बड़े शहरों या
महानगरों नहीं की जा सकती। बसई मे जिस
परिवार मे अविस्मरणीय बचपन के 4-5 दिन
व्यतीत किये अब सेवानिव्रत जीवन मे उस परिवार के बारे मे और अधिक जानने या मिलने
की उत्कंठा हमे अवश्य ही पुनः एक दिन बसई
ले कर जायेगी ऐसी हमारी आशा हैं।
विजय
सहगल

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