जीवन की कश्ती
भंवर मे फ़सी कश्ती, भगवान तुम उबारो।
जीवन भरा अंधेरा,
रौशन कर सँवारो॥
पथ मे है बड़े कांटे,
लोभों का
बड़ा डेरा।
चलना है बड़ा मुश्किल,
तृष्णा ने है जो घेरा॥
पथ को सुपथ बना कर,
जीवन सुगम सँवारो।
भंवर
मे फ़सी कश्ती,
भगवान तुम उबारो॥
कमजोर सी कश्ती पर,
सितम लहरों का बड़ा भारी।
दुर्बल सी मेरी काया,
मन-विषयों मे भटक हारी॥
मन को गमन बना कर,
सद् मार्ग पर विचारों।
भंवर मे फ़सी
कश्ती भगवान तुम उबारो॥
छिद्र लोभ के है,
पानी से भरी नैया।
डूब रही कश्ती के,
अब तुम्ही खिवैया॥
जीवन रूपी नैया,
भवतार कर उतारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥
लोभ मोह माया मे जन्म व्यर्थ बीता।
शेष बचा जीवन,
हो पथ प्रदर्शक गीता॥
जीवन अनंत यात्रा,
के चक्र से निवारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥
धर्म-सत्य,
प्रभा-पथ पर आगे कदम बढाना।
नर-नारी के उत्थान का संदेश है बताना॥
सद् भावना बढ़ा कर,
दुर्भावना उतारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो।
धन धान्य कमाने मे सारा जनम गवाया।
अंत समय "हरि बिना" ये काम न आया॥
ये तो यूं ही बीता,
अगला जनम सँवारो।
भंवर मे फ़सी कश्ती भगवान तुम उबारो॥
विजय सहगल

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