ज़िंदगी
मे कभी कुछ ऐसी घटना घट जाती है जो हमेशा याद रहती है। उम्र तो याद नहीं पर शायद
8-9 साल या एक-दो साल आगे पीछे का रहा हूंगा, पापा के मुकदमे
की तारीख थी। पापा को, जो रेल्वे मे थे, छुट्टी न मिलने के कारण मुकदमे की तारीख अटेंड नहीं कर सकते थे मुझे कोर्ट मे जाने का मौका मिला। वो अनुभव हमारे अन्तर्मन मे किसी भयावह घटना के
रूप मे आज भी बिल्कुल स्पष्ट है। न्यायालय
का सख्त
अनुशाशन और नियम कायदों का अनुपालन फिल्मों के माध्यम से पहले ही हमारे ज़ेहन मे
था। एक दिन पूर्व उन्होने मुझे और मेरे बड़े भाई प्रदीप को सारी बाते विस्तार से
बता दी थी। कब कैसे और क्या करना है अच्छी तरह बता दिया था।
गर्मी शायद
मई जून का समय था, कचहरी सुबह की थी। सुबह 8 बजे हम दोनों
भाई कचहरी पहुँच गये थे। वादी, प्रतिवादी, मुंशी वकील सभी यहाँ वहाँ एक कमरे
से दूसरे कमरे मे आ जा रहे थे। उस उम्र मे मै बड़े लोगो की भीड़ मे एक अदृश्य भय के
साथ अपने आप को कहीं गुम महसूस कर रहा था कुछ कुछ "लॉस्ट चाइल्ड" की
तरह। हमे आठ आने (पचास पैसे ) दिये गये थे चार आने रिश्वत के रूप मे पेशगार जी को देने थे एवं चार आने हमे कुछ खाने पीने के लिए दियेगये थे। हम दोनों भाई मोर्चा सम्हाले कोर्ट के
दरवाजे पर, टकटकी लगा कर अर्दली की आवाज का इंतज़ार कर रहे थे, कि न जाने कब आवाज़ लगा दे, "विष्णु नारायण बनाम
फलां-फलां, हाजिर हो"!! जैसा कि हमे बताया गया था। पर "हाजिर हो" की आवाज कभी भी लग सकती
है। हम दोनों भाई कोर्ट की दालान मे एक कोने पर बैठ कर बड़े ध्यान से कोर्ट के अर्दली
की आवाज बड़े ध्यान से सुन रहे थे कि कहीं सुनने मे कोई चूक न हो जाय नहीं तो केस ख़ारिज़
न हो जाय और पापा को लेने-के-देने न पद जाएँ। केस की पुकार लंच टाइम तक नहीं आई। लंच मे सारा कोर्ट परिसर
मानो कैंटीन की तरफ बढ़ रहा था, चाय-पकोड़ी, समोसे-कचोड़ी आदि की आवाजों से
कैंटीन गुंजायमान थी। सभी अलसाये से बैठ आराम कर रहे थे। भूख तो हम दोनों को भी लगी थी, परंतु पैसे का गणित कुछ मनमाफिक नहीं बैठ रहा था, क्योंकि चार
आने तो पेशकार को देने थे और शेष बचे चार
आने मे दोनों का काम नहीं चल रहा था। कैंटीन मे समोसे, चाय या
कचौड़ी की कीमत आठ आने से कम न थी। यद्यपि घर मे
5-10 पैसे की चोरी करके चाट पकोड़ी/पानी की टिक्की अनेकों बार खाई होगी परंतु उस
दिन पेशकार को दिये जाने वाले चार आने मे से 5-10
पैसे चोरी करने की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। और हिम्मत भी नहीं हुई कि पेशकार अंकल से कह सके
कि रिश्वत मे कुछ पैसे कम ले लो ताकि कुलबुलाती भूंख को मिटाने एक समोसा ले सके!! कोर्ट का मामला जो ठहरा!! और न्यायधीश भी तो
कोर्ट मे बैठे थे, अगर पेशगार जी के पैसों मे कमी कर यदि समोसे/कचोड़ी खाते हुए पकड़े जाते तो? कहीं जज साहब मामला न पलट दें!! बाल मन पर ऐसे अनेक सवाल जबाब आ रहे थे!! हमारे अन्तः करण मे ये सवाल उठा? पापा के
आदेश मे कमी-बेसी कही और होती तो हम कर भी देते परन्तू पेशकार के रिश्वत के चार आने मे कमी कही मुकदमे को
कमजोर न करदे, ये सोच कर डर लगा और हम दोनों भाइयों ने तय
किया की पेटपूजा के लिये किसी दूसरे विकल्प पर विचार करे। भूख तो लग रही थी वहाँ
देखा, कुछ बच्चे 10-10 पैसे मे पेट भर पानी पिला
रहे है, तब हम दोनों ने डट कर कई छोटे छोटे गिलास पानी अपनी
क्षमता से ज्यादा पिये और पुनः मोर्चा सम्हाल "हाजिर हों" की आवाज का
इंतजार करने लगे. अचानक कुछ देर बाद अर्दली की आवाज आयी "विष्णु नारायण - xxx हाजिर हो"। हम डरते सहमते कोर्ट के अंदर कोर्ट के बाबू, पेशकार जी के समक्ष हाजिर थे।
हमने पूरी निष्ठा और ईमानदारी और न्याय मे अपनी पूरी आस्था और विश्वाश के साथ पेशकार जी के लिये नियत तय राशि, चार आने, उन्हे दे दिये और पापा द्वारा सिखाया रटा-रटाया
जबाब कचहरी के बाबू को बताया कि,
"वकील साहब आ रहे है और अगली तारीख
चाहिए"। कागजी खाना पूर्ति के पश्चात अगली तारीख मिल गई, जिसे बकील साहब को नोट करा कर जैसे-तैसे कचहरी से घर की ओर पैदल चल दिये जैसे
मानो मुकदमे की अगली तारीख पा कर कोई बड़ा युद्ध जीत
कर भी भूख से परास्त होकर थके-हारे सिपाही अपने डेरे की ओर जाता है!! कानून का राज
बदस्तूर आज भी बैसे ही चल रहा है जैसे, "श्री लाल शुक्ल के उपन्यास
"राग दरबारी" की तरह जिसमे अपने आपको मै उस लँगड़े की तरह पाता हूँ जो
कचहरी मे कभी नकल, कभी बयान और कभी बहस या पैरवी के लिये पेशी दर पेशी, या तारीख पे तारीख के लिए भटक
रहा था??
5 टिप्पणियां:
Sehgal ji
We as a common man still face the same ordeal in court of India. We have to sit hours and hours for case and when time comes or a call receives , we entangle in question answers of opposition lawyer and in a shortwhile judge saheb announce another date later than 2 months and this continue.
न्यायिक व्यवस्था पर क्रोध तो कर नहीं सकते, हाँ दया तो बहुत आती है।
बहुत रोचक ढंग से अपने घटना का चित्रात्मक वर्णन किया। प्रणाम आपकी लेखनी को।
*Indian judicial system is not meant for delivering timely justice to the plaintiff(victim).Date after date is a constant process.Several judges transfer during the course but justice remains undelivered.There is no time line to dispose off the case.It is often noticed in several cases either appellant or defendent expires.Now these days,judges are not impartial whatever may be the reasons.Justice delayed is justice denied.May God save from courts.It is time consuming & expensive too.Our judicial system needs to be reformed.*
*Your experience of court was well defined & attractive as well.*
👍👍👍🌹🙏🌹
Surender singh Kushwah Gwalior
सर गज़ब लिखते हैं। कोर्ट सामने दिखने लगा। आज भी हालात वही हैं। बस रेट बड़ गये हैं, महंगाई के हिसाब से।
हरीश अग्रवाल भोपाल
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