बुधवार, 26 सितंबर 2018

हमारी जेल यात्रा



""हमारी जेल यात्रा"


 

राजकीय आदर्श विध्यालय झाँसी जहाँ मेरी प्राइमरी शिक्षा पूरी हुई अपने आप मे एक अलग विध्यालय था जो और दूसरे विध्यलयों से उसे अलग रखता था। आज का तो मालूम नहीं लेकिन उस समय हम सब को किताबी ज्ञान के साथ साथ सामाजिक जीवन से जुड़े वास्तविक पहलुओं से परिचय भी कराया जाता था। हमे याद है हमरी चौथी या पाँचवी क्लास मे सामाज शास्त्र के अंतर्गत जहाँ हमे पोस्ट ऑफिस के बारे मे पढ़ाया जाता तथा  पिता या  प्रधानाचार्य को पत्र लिखना सिखाया जाता।  हम सभी बच्चों को पोस्ट ऑफिस के कार्य प्रणाली दिखाने के लिये प्रधान डाकघर झाँसी  भी ले जया गयाजहाँ हम सभी बच्चों को स्वयं पोस्ट कार्डअंतर्देशी पत्र और लिफाफों को न केवल दिखाया गया बल्कि पोस्ट कार्ड भी एक एक कर क्रय कराये गये और उन पर सभी बच्चों को पिता के नाम पत्र भी लिखवाया गया एवं उसे पोस्ट बॉक्स मे पोस्ट कराया गया।  पोस्ट ऑफिस की हर खिड़की की कार्य प्रणाली बताई गई कि कहाँ मनी ऑर्डर किया जाता या पंजीक्रत पत्र जमा होते या कहाँ टेलेग्राम किया जाता है। बेसिक ट्रेनिंग कॉलेज से संबद्ध होने के कारण बी. एड. के शिक्षक हमे खजूर की पत्तियों से हाथ पंखा बनाना या दिवाली मे लगाये जाने बाले कंडील या  अग्गासिये  बनाना सिखाया जाना  भी शिक्षा का एक हिस्सा था। जिन्हे मै आज भी बनाना नहीं भूला हूँ।  हमे कृषि या काष्ठ कला मे से कोई एक विषय का चयन छठी क्लास मे करना होता था जिसे आगे आठवी तक पढ़ाया जाता था। कृषि विषय चुनने के कारण  मैदान मे फूलों के लिये क्यारी बनानाक्यारी की गुड़ाईनिराई वीज रोपना पौध लगानासिंचाई करना  आदि भी हमारी शिक्षा का एक अंग था। फार्म हाउस मे गहूँआलूगोभी आदि की खेती करनागेहूं की  खेती को रहट के माध्यम  से खेतों मे सिचाई करने हेतु  क्लास के  8-10 छात्रों का ग्रुप बैलों की जगह स्वयं लग कर रहट चला कर मस्ती और हास-परिहास करते थे।  जैसा कि प्रायः बच्चों के आपसी झगड़े स्कूल मे हो जाते है उस एक  दिन भी ऐसा हुआ जब  दो छात्रों का आपस मे झगड़ा हुआ। घटना साधारण थी किन्तु उसे कानून व्यवस्था के पाठ से जोड़कर सामाजशास्त्र  का विषय बना  दिया गया कि किस तरह झगड़े का निपटारा कर पुलिस अपराधी को न्ययालय मे केस चला कर अपराधी को सजा दिलाती है और उसे किस तरह जेल की सजा दी जाती है। इस किताबी पाठ को वास्तविक जीवन मे किस तरह लोगो के साथ किया जाता है इस हेतु हम सभी क्लास के बच्चों को जेल भ्रमण कराया गया और इस तरह हमे जीवन के कठोरतम एवं कड़वी सच्चाई से जेल यात्रा के माध्यम से रूबरू कराया गया। उस अविस्मरणीय जेल यात्रा का भय मिश्रित उत्साह का विवरण यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

हम सभी क्लास के बच्चे अपने अध्यापको के साथ जिला जेल झाँसी के मुख्य द्वार पर लाइन लगा कर एकत्रित हुये। एक रजिस्टर मे सभी छात्रों की प्रविष्टि करी गयी। लोहे के बहुत बड़े  मुख्य द्वार मे प्रवेश के पूर्व हम सभी छात्रों की बाएँ  हाथ की हथेली पर जेल की एक गोल रबर की मोहर लगाई गई और सख्त हिदायत दी गई की इस रबर सील की छाप मिटना नही चाहिये अन्यथा मिट जाने की दशा मे जेल से  बाहर नहीं आने दिया जायेगा। पूरी जेल भ्रमण के दौरान सभी बच्चों ने हथेली पर लगी सील का पूरा ध्यान रखा ताकि रबर की सील की छाप न मिटे।   सील की ताकत का एहसास आज भी हमे  जीवन के अनेक क्षेत्रों  मे गाहेबगाहे अफसरशाही  के रूप मे अब भी देखने को मिल जाता है। जब सभी बच्चे और अध्यापको का बड़े दरवाजे मे प्रवेश हो गया तो मुख्य दरवाजे पर तैनात बंदूक धारी संतरी ने   ताला लगा कर बंद कर दिया,  तत्पश्चात एक उतना ही बड़ा दरवाजे का ताला खोल कर जेल के प्रांगण  मे प्रवेश कराया गया और पुनः उस दरवाजे को अंदर से बंद कर दिया गया। हमे बताया गया की जेल का मुख्य एवं दूसरा दरवाजा सुरक्षा की द्रष्टि से  दोनों एक साथ नही खोले जाते ताकि कोई भी सीधे बिना बाधा के  जेल से न जा  सके। इस तरह हमारी कौतुहाल पूर्ण  जेल यात्रा शुरू हुई।  

दूसरे मुख्य दरवाजे के साथ ही मुख्य जेल अधिकारी का कार्यालय बना हुआ था। कार्यालय के बगल मे ही एक हाल था जो लोहे की जाली के माध्यम से दो भागो मे विभक्त किया गया था। इस हाल का एक गेट कार्यालय मे तथा जाली के अंदर बाला दूसरा गेट जेल के अंदर खुलता था। इस जगह का इस्तेमाल कैदियों को उनके परिजनो से मुलाक़ात हेतु किया जाता।  

हम सभी बच्चों को पहले बैरकों मे बंद कैदियों से मिलवाया गया जो अपना नाम बता कर अपराध को संक्षेप मे बताते थे। प्रत्येक कैदी को दो-दो कंबल दिये गये थे। एक बैरक मे 6-8 कैदी रखे जाते। कुछ बैरकों मे चारपाई नुमा चबूतरे कैदियों को सोने के लिये बने थे। बैरक के एक कोने मे निस्तारण हेतु शौचालय बनाये गये थे। हर बैरक मे पीने के पानी हेतु मिट्टी के घड़े रखे हुए थे। कुछ कैदी मिल कर जेल मे स्थित कुआं से पानी खींचते नज़र आये जो जेल मे पीने के पानी की व्यवस्था मे लगे थे। हमने जेल मे आटा पीसने बाली बैरक भी देखी जहाँ दो कैदी मिल कर खड़े होकर चार फुट ऊंचे चबूतरे पर बनीघरों मे स्तेमाल की जाने बाली चक्की से आकार मे  कुछ बड़ी चक्की से हाथ से आटा पीस रहे थे।  इस तरह की 15-20 चक्की बैरक मे लगी थी जो सुबह से शाम तक दो-दो  कैदियों द्वारा चलाई जाती एवं जिससे कैदियों को खाने के लिये आटे की पूर्ति की जाती। एक बैरक मे कैदयों को हाथ से कालीन बनाते हुये देखा। इसी तरह मसाला पीसने का कार्य भी हो रहा था। जेल मे ही अंदर सब्जी की खेती करते हुए कुछ कैदी निराई-गुड़ाई का काम कर रहे थे। रसोई का नजारा कुछ अलग था। बड़ी-बड़ी पत्थर की हौदी मे आटा  गूथा जाता। हौदी के किनारे दोनों ओर पाँच छः कैदी  खड़े होकर  हाथों से पानी मिला कर आटा गूथते। उस गुथे हुए आटे को एक ऊंचे (लगभग 4- 4.फुटचवूतरे पर जो लगभग 15-16 फुट लंबा और 5-6 फुट चौड़ा था चार पाँच कैदियों द्वारा बड़े बड़े वेलन की मदद से  आटे को  बेला जाता और लोहे की गोल पत्ती से बने साँचे  की सहायता से  विले हुए आटे पर पटक पटक कर  गोल रोटी के आकार मे काटा जाता। उन कटी हुई गोल रोटियों को बड़ी सी भट्टी के ऊपर मोटे लोहे के बड़े  तबे पर सेका जाताबड़े-बड़े भगौनों मे दाल और सब्जी बनाई जाती। एक समान ड्रेस पहने कैदियों को भोजन और सब्जी थालियों मे दी जाती जैसा कि हम प्रायः फिल्मों मे देखा करते। हर जगह जेल प्रहरी नज़र आते जो जेल की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाने मे सहायता करते। जेल परिसर के चारों ओर ऊंची ऊंची निगरानी टावर बनी हुईं थी जिन पर चढ़ कर जेल प्रहरी बंदूकों से सुसज्जितचौवीसों घंटे पहरा देते। आकस्मिक स्थिति से निपटने हेतु एक बहुत बड़ा अलार्म मुख्य दरवाजे के ऊपर लगा था।  जेल मे एक छोटा अस्पताल भी था जहाँ बीमार कैदियों का आवश्यकता पड़ने पर इलाज किया जाता। चहर दीवारी के अंदर कुछ छोटी-छोटी बैरकों बनी थी इन बैरकों मे संगीन अपराधियों को कड़ी निगरानी मे अलग अलग रखा जाता।  जेल यात्रा के अंत मे हम सभी बच्चों को  उस जगह ले जाया गया जिसे हम सभी थोड़ा भय मिश्रित उत्सुकताऔर रोमांच से देखने को व्याकुल थे। जेल के अंदर एक चहर दीवारी से घिरा एक अलग स्थलजिसके चारों ओर घास फूस लगी हुई थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे महीनो से यहाँ कोई आया न हो।   वह था फांसी घर। हमे बताया गया की इस फांसी घर मे पिछले अनेक वर्षों मे कोई फांसी नही हुई। एक बड़ा सा चबूतरा जो 7-8 फुट गहरेनीचे तलघर नुमा कमरे के ऊपर बना था।  जिसके दोनों ओर लोहे के बड़े ऊंचे खंबे लगे थेजिनको ऊपर एक उतने ही मोटे खंबे से दोनों खंबों को जोड़ता  था। बीच मे एक कुंदा जिसके माध्यम से एक मोटी रस्सी गले मे डालने के लिये लटकाई जातीकिन्तु जो उस समय बहाँ नही लगी थी। चबूतरा जो दो लकड़ी के तख्तों से ढका हुआ था और तख्ते नीचे तलघर की ओर खुलते थे। जिसको खोलने का संचालन चबूतरे के पास स्थित लोहे के एक लीवर से किया जाता। हमे जेल कर्मचारियों ने बतलाया गया जब किसी व्यक्ति को फांसी दी  जाती तो उसके गले मे मुंह  पर काला कपड़ा डाल कर रस्सी का मोटा फंदा गले मे डाल लकड़ी के दोनों तख्तों के बीच चेहरा ढक कर खड़ा कर दिया जाता और जल्लाद द्वारा लीवर के खीचते ही तख्ते तलघर की ओर नीचे गिर जाते एवं अपराधी रस्सी से लटक कर, मृत्यु को प्राप्त हो जाता।  ठीक बैसा ही फांसी घर सन 2000 मे हमने सेल्यूलर जेल पोर्ट्ब्लेयर मे अंडमान निकोबार की यात्रा के समय देखा। इस तरह पूरे जेल की यात्रा  कर हम सभी बच्चे बापस मुख्य द्वार से निकल कर एक विशेष और  अविस्मरणीय यात्रा के पश्चात  अपने विध्यालय पहुँचे।

 

विजय सहगल

 

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