"श्रमिक कानून
संशोधन विरोध"
"अर्थात सरकारों की-नकटा थुकैल बज्जताड़ी"
औरंगाबाद रेल हादसे मे 16 मजदूरों की रेल
दुर्घटना मे मृत्यू की खबर ने अंदर तक दिल को झकझोर दिया। इन मजदूरों की जिस चाहत
ने रेल की पटरियों पर चल इनके कार्य स्थल से घर बापस पहुँचने की यात्रा ने इन्हे मजबूर किया वही इनकी अकाल मौत का कारण बनी। "एक
रात्रि" के सुख और शांति की चाह ने इनकी इस "गृह यात्रा" को "अंतिम
यात्रा" मे तब्दील कर दिया। उनकी "चैन
की एक निद्रा" की चाह ने इन मजदूरों को "चिर निद्रा" मे विलीन कर दिया।
जिस मालगाड़ी ने पटरियों पर सोते उन मजदूरों के शरीर को चिथड़े-चिथड़े कर टुकड़ो मे
उसी तरह बाँट दिया, कि बो अगर जिंदा भी
होते तो पलायन से उपजी त्रासदी, जीते जी उन के
सपने को ये निर्दयी और नाकाम व्यवस्था भूख और प्यास से इनके बीबी और बच्चों को तिल
तिल कर मरने को मजबूर कर देती। मजदूरों के घर बापसी मे पलायन के दौरान उनकी मौत का
ये सिलसिला आज भी जारी है।
"कौन दोषी
है इन मजदूरों की अकाल मृत्यू के लिये"??
शायद ये सवाल इस बेरहम, बेदिल धन
पिपासुओं, पद लोलुप्तों और नरपिशाच नेताओं और नौकर शाहों की साँठ गाँठ से उपजी
व्यवस्था मे उतना ही वेमानी है जितना एक कसाई के लिये बकरे की जान?
हर बार की तरह इस घटना की जाँच और कारणों पर कमेटियाँ का गठन और न्यायिक अधिकरण के गठन की खाना पूर्ति की
औपचारिकता निभा दी जायेगी। शायद पैसठ दिनों के इस "लॉक डाउन" मे अन्य
अनेक या प्रत्येक मुद्दे पर सहमति बनी या न बनी हो,
पर "मजदूरों के लॉक डाउन मे घर बापस जाने
की चाह" पर कतई सहमति इस दौरान न बन सकी। सरकारों और राजनैतिक नेताओं का
दोगलापन कदम कदम पर इन प्रवासी मजदूरों का पलायन का कारण बना। इन नेताओं के दोहरे
नकाब रूपी नीतियों की बहुत बड़ी कीमत इन
मजदूरों को चुकानी पड़ी। कहीं कहीं हजारों किलोमीटर की अनवरत पैदल यात्रा और कहीं कहीं तो "कीमत" के रूप मे इन
निरीह, गरीब और लाचार मजदूरों को अपनी जान भी
"अकाल मृत्यु" के रूप मे चुकानी पड़ी!!
नियति का इससे बड़ा
दुर्भाग्य क्या होगा कि जिन बेबस, असहाय,
असमर्थ और विवश मजदूरों ने दो जून की रोटी के लिये अपना घर छोड़ा,
अपने परिवार और बच्चों के सुखमय और सुखद भविष्य की कल्पना सँजोये अपनी मातृभूमि से
सैकड़ों और कही कही हजारों किलोमीटर दूर पलायन किया। उनके पलायन जिक्र हमने अपने
ब्लॉग "सपनों की उड़ान" (https://sahgalvk.blogspot.com/2019/03/blog-post_8.html) मे एक बार किया था।
काश! समाज
के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्तियों की छद्म चिंता करने बाली ये "श्रमिक
कल्याणकारी सरकारें", यदि उनके ही जन्मभूमि मे रोज़गार उपलब्ध करा देती
तो इन लाचारों को अपनी जान गँवाने के ये दुर्दिन न देखने पड़ते। वहीं दूसरी ओर यदि
इन वेवश लाचारों ने अपनी मातृभूमि से विलग
अपने श्रम से देश के सुदूर राज्यों मे जाकर अपने श्रम रूपी रुधिर से आर्थिक विकास
का जो तंत्र उन शहरों मे स्थापित कर उन
पूँजीपतियों की वैभव शाली अट्टालिकाओं को गगनचुम्बी ऊंचाइयों तक उठाया। क्या उन भामाशाहों,
मठाधीशों, धनवानों का नैतिक और
मानवीय कर्तव्य नहीं था, कि जिन मजदूरों
और कर्मकारों के बल पर वे धनाढ्य बने (उनमे से कुछ तो विश्व की नवधनाढ्यों की सूची मे प्रथम स्थान रखने बाले
भी है), उन विपत्ति के मारे श्रमिकों को अपने धन से ऐसे आपदा के समय दो वक्त का भोजन
करा पाते? ये कैसा दुर्भाग्य कि
कोविड रूपी महामारी के फलस्वरूप उत्पन्न हालातों के मद्देनज़र देश के प्रधानमंत्री
के आवाहन के बावजूद इन दौलतमंद पूँजीपतियों,
ठेकेदारों ने इन श्रमिकों,
मेहनतकशों को लॉक डाउन के कारण बंद
कलकारखानों का पारिश्रमिक प्रदान नहीं किया जिसकी बजह से एक बार फिर इन अभागों को "दो
जून की रोटी" के लिये अपने गृह वतन पैदल पलायन कर बापस जाने को विवश किया। इन
करखानेदारों और ठेकेदारों के मजदूरों को लॉक डाउन से उत्पन्न बंदी मे वेतन से
वंचित करने की नीति के कारण ही कुछ श्रमिक लॉक डाउन के प्रारम्भ मे,
कुछ तालाबंदी के मध्य मे और कुछ तालाबंदी के अंतिम पढ़ाव मे अपने गृह नगर बापसी को
विवश होते रहे और इस तरह ये पलायन का दौर पूरे देश मे तालाबंदी की शुरुआत से
लेकर अंत तक और आज भी सतत जारी है। सड़क पर
पुलिस की बाधा या भय के कारण इन लोगो ने रेल की पटरियों के रास्ते पलायन का रास्ता पकड़ा। रेल की पटरियों पर चलने की
व्यथा को मैंने एक बार खुद भुक्तभोगी की हैसियत
से अपने ब्लॉग "संदलपुर टू सिथौली" (https://sahgalvk.blogspot.com/2018/11/blog-post.html)
मे व्यक्त किया था। कितनी कठिन थी वो यात्रा जो इन मजदूरों के पलायन की यात्रा के सामने उसका एकांश भी न होगी। सोच कर सिहरन होती है कि
कैसे ये मजदूर रेल की पटरियों पर यात्रा करने को मजबूर हुए।
अहो दुर्भाग्य इन निर्धन असहाय मजदूरों को
जिस "दो वक्त की रोटी" ने अपने जन्मभूमि से दूर श्रम की तलाश मे पलायन
के लिये महानगरों की कर्मभूमि की ओर मजबूर
किया और इस अभागी "कोविड महामारी" के कारण इन्ही महानगरों की दैत्य रूपी
सरकारों लोभी अधिष्ठानों और लालची नियोक्ताओं के दोहरे नकाबों,
छद्म और झूठे वचनों/आश्वासनों से विमुख कर "दो वक्त की रोटी" की उसी चाहत
और सुरक्षा के भाव ने पुनः उन्हे बापस
अपने गाँव और कस्बों की ओर पलायन के लिये विवश किया ठीक उसी तरह जैसा "सूरदस
जी" ने अपने इस पद मे लिखा है :-
"मेरो मन अनत कहां सुख पावै"।
"जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै"॥
इन मजदूरों का दुर्भाग्य देखिये जो फिक्रमंद
सरकार इन भाग्यहीन श्रमिकों की जन्मभूमि मे शासित है और वे भी सरकारे जो इन
मेहनतकशों की कर्मभूमि पर शासित थी इन दोनों ही जन विरोधी और श्रम विरोधी सरकारों
ने औरंगाबाद रेल दुर्घटना मे मारे गये श्रमिकों को,
जो जीते जी "दो वक्त की रोटी" न दे सकी हों उन
पत्थर दिल, कठोर,
अमानवीय शासकों द्वारा शासित दोनों ही सरकारों ने उन मृत श्रमिकों की मौत की कीमत पाँच-पाँच लाख रूपये देने का निश्चय
किया और जो "रेल्वे", मजदूरों पर आई इस आपदा के समय वापस उनके गृह
नगर भेजने मे इन वेसहारा श्रमिकों को "सामान्य श्रेणी" के डिब्बे मे "एक
अदद सीट" उपलब्ध न करा सकी हो उसने
इन मजदूरों की लाशों को उनके गृह नगर भेजने का बंदोबस्त किया। कदाचित ये निरंकुश नौकर शाह और राजनैतिक नेतागण
उन श्रमसाध्य कार्य के पश्चात आराम की श्रमिक नीति के अधिकारों मे विश्वास के
प्रणेता इन कामगारों को "श्रम" से उपजे परिश्रम और परिश्रम के फल रूपी पारिश्रमिक
की व्यवस्था मे कोताही न वरतते तो उन्हे रेल की पटरियों पर श्रमसाध्य कार्य के
पश्चात आराम के लिये इस तरह मजबूर न होना पड़ता।
पहले से ही मौजूद मूलभूत श्रमिक क़ानून अर्थात "आठ घंटे काम,
आठ घंटे घर परिवार के साथ आमोद-प्रमोद और शेष आठ घंटे आराम" के बाबजूद जो
नीति नियंता श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा "कोविड महामारी आपदा" के इस आढ़े
समय मे न कर सके,
उन मजदूरों के पैरोंकारी विधि संस्थाये भी जिन मेहनतकशों की "जीवन यापन"
के मूलभूत अधिकारों की रक्षा न कर सकी वे सरकारें श्रमिकों के अधिकारों मे कटौती
कर श्रमिक क़ानूनों मे संशोधन हेतु तत्पर है । श्रमिक पलायन मे जिन सैकड़ों श्रमिकों
ने अपने प्राणों की आहुति "जीने के इस मूलभूत" अधिकार के लिये होम कर दी
ऐसी कुछ श्रम विरोधी उत्तर प्रदेश,
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र,
उड़ीसा और गोवा की सरकारों ने विदेशी
उध्योग को आकर्षित करने हेतु श्रमिक क़ानूनों मे बदलाव किया है कुछ और प्रदेश भी
उनके इस नक्शे कदम पर चलने के तत्पर है। इन क़ानूनों के बदलाब से श्रमिक अपने उन अनेकों
श्रमिक अधिकारों से वंचित कर दिये जाएंगे जो श्रमिकों को भारतीय संविधान मे उपलब्ध
है। जिसमे मुख्यतः है "निश्चित नियामक कार्यकारी "आठ घंटे" पर लगी
रोक को बढ़ा बारह घंटे करना"। बारह कार्यकारी घंटों के बाद मजदूर कितने घंटे घर
परिवार को देगा और कितने घंटे वो आराम करेगा इस सवाल पर एक विचारणीय प्रश्न चिन्ह है??
काम के इन आठ घंटे के वैधानिक अधिकार के इन निश्चित नियामक कार्यकारी घंटों के कानून का सरासर दुर्पयोग बैंक सहित सरकारी और गैर सरकारी
विभागों के संगठित क्षेत्रों मे आज भी जब बखूबी देखा जा सकता है तब फिर नये श्रमिक
कानून संशोधन को असंगठित क्षेत्र मे देखने और सुनने और रोकने बाला कौन होगा??
फिर तो "जब सैयां भये कोतवाल तो फिर डर
काहे का"। ऐसे श्रमिक विरोधी कानून मे संशोधन कराने मे लिप्त
है ये सरकारे और तुर्रा ये कि हम श्रमिकों के कल्याण कारी योजना मे विश्वास करते
है अर्थात "मुँह मे राम बगल मे छुरी" !!
"केशर बऊ" (ब्लॉग:- https://sahgalvk.blogspot.com/2019/06/70-75-30-2-4-4-4.html)
आज सालों बाद एक बार पुनः स्मरण हो आई है जो बुंदेलखंडी भाषा मे अपना आक्रोश और विरोध
जिन शब्दों मे करती थी उन्ही शब्दों का हू-ब-हू प्रयोग कर हम भी इन छः सरकारों
द्वारा "श्रमिक कानून मे संशोधन" का विरोध इन सरकारों को "नकटा,
थुकैल, बज़्जताड़ी" कह कर,
करते है।
विजय
सहगल


