गुरुवार, 27 जून 2019

"केशर बऊ"


"केशर बऊ"




हर व्यक्ति के जीवन कुछ ऐसे अनाम  व्यक्ति जुड़ जाते हैं जिनसे उनका  कोई रिश्ता नहीं होता पर श्रद्धा, सम्मान और प्यार से एक अनजान रिश्ते का जन्म हो जाता हैं जिनका महत्व कभी कभी नजदीकी रिश्तों से ज्यादा होता हैं।  प्रायः मध्यम और छोटे हर शहरों या कस्बों मे ऐसे लोग  मिल जाते  हैं जिनकी प्रसिद्धि उस जगह उनके आचार और व्यवहार के कारण होती है और उस  रिश्ते को उस शहर मे "जगत" का दर्जा दे दिया जाता हैं उन्हे लोग अपना  जगत मामा, जगत दादा या दादी, भगत जी आदि  नाम का सम्बोधन कर  रिश्ता बना लेते हैं। उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की छाप उस जगह के असंख्य व्यक्तियों पर स्थाई रूप से बन जाती हैं। बचपन मे हमारे यहाँ भी "केशर बऊ" (बऊ का अर्थ बुंदेलखंड मे नानी/दादी के समकक्ष महिला) का  आना जाना था। झाँसी शहर मे अधिकांश लोग उन्हे इसी नाम से बुलाते थे, उन्हे "जगत बऊ" का दर्जा प्राप्त था। क्या बाल, क्या जवान या वृद्ध सभी उन्हे "केशर बऊ" कहकर बुलाते थे। 70-75 बर्ष से अधिक आयु रही होगी उनकी, हम सभी बच्चे उन्हे बऊ "राम-राम"  कह कर बुलाते थे।  जबाब मे वो बढ़े प्यार और अपनत्व मे आशीर्वाद देते कहती थी, "हमारे लाल खुश रहे और लाल के लाल खुश रहे"। उनके आशीष मे एक अपनत्व और प्रेम था। मेरी माँ बताती थी कि बो एक बाल विधवा थी उनका अपना भरा पूरा परिवार था झाँसी शहर मे उनका  काफी बड़ा मकान था। उनका जीवन शायद उस समय 30 रूपये की मिलने बाली सरकारी वृद्धावस्था पेंशन पर आश्रित था। उनका शहर मे सभी जाति समुदाय मे आना जाना था। लोग स्नेह और सम्मान बश भी अपने घरों मे तीज त्योहार या सहज भले मे बुलाते थे और यथोचित सम्मान भोजन वस्त्र या आर्थिक रूप से उनकी मदद भी करते थे। मेरी माँ से उनका स्नेह कुछ अधिक था क्योंकि बह प्राप्त पेंशन या जो भी नगदी उनके पास होती उसे हमारी माँ के पास रखती थी और वक्त जरूरत पर 2-4 रुपये के रूप मे धीरे धीरे वापस ले लेती थी। यूं तो उनके दूर, नजदीक के कई रिश्तेदार शहर मे रहते थे पर हमारे घर मे उनके लगाव का एक कारण और भी था क्योंकि हमारे पिता उनको मौसी कह कर संबोधित करते थे। कभी कभी वह हमारे घर कई-कई दिन रुक जाती थी और प्रातः 4-4.5  बजे अपनी मधुर आवाज मे राधा-कृष्ण के भजन, दातुन आदि  बुन्देली गीत गाती थी। कुछ माह पूर्व जब मैं झाँसी गया था तो माँ से उक्त बुन्देली भजन दातुन सुनाने का आग्रह किया था जिसे बाद मे रिकोर्ड कर मैंने "यू ट्यूब" पर भी डाला। प्रायः दीपावली पर हफ्तों पहले बनने बाले पकवानों की जब माँ तैयारी करती और केशर बऊ घर मे होती तो सुबह उनके गाये भजन वातावरण मे सुरीला रस घोल देते और वरवश ही ऐसा लगता जैसे जमुना नदी के किनारे उगते सूरज के पूर्व की  लालिमा आकाश मे मंद-मंद सुरीली वयार के साथ पक्षियों और चिड़ियों का कलरव सुनाई दे रहा हो। वो विस्मृत क्षण  आज भी याद कर  प्रसन्नता और खुशियों देते हैं।

केशर बऊ का बगैर किसी चूक के हर मंगलवार को बिजौली के हनुमान मंदिर  जाना निश्चित होता। बिजौली झाँसी से करीब 20-25 कि॰ मी. दूर था।  ललितपुर जाने बाली सारी  बसे बिजौली, बबीना, तालबेहट  होकर ही जाती थी। 75 साल की निडर  केशर बऊ लाठी टेकती हुई उम्र और परिस्थितियों परास्त करते  हुए पहले तांगा से बस स्टैंड जाती और फिर बस से बिजौली प्रत्येक मंगल को जाती।  हर तांगे  बाला या बस बाला केशर बऊ को सम्मान देते हुए  कभी कोई किराया  नहीं लेता था। कभी कभी तांगा न मिले तो पैदल ही  या कोई साइकल बाला या ठेले बाला उनकी सहायता कर उन्हे बस स्टैंड पहुँचा कर  इस पुण्य कार्य का बड़भागी बन जाता था। उनका  बिजौली गाँव मे भी ग्रामीण परिवारों से भी विशेष स्नेह था,  कभी कभी वे  दो चार दिन गाँव  मे भी  उन ग्रामीणों के घर रुक जाती थी।  किसी कारण किसी से नाराजी पर वो उसे प्यार भरी अंग्रेजी, बुन्देलखन्डी मिश्रित हिन्दी की गालियों की ऐसी बरसात कर डांटती की उसकी सिटी-पिटी गुम हो जाती। "इडियट-फूल, नकटा-थुकैल-बजताड़ी" हमसे जवान लड़ाता हैं। उनके इस क्रोध पर बरबस ही लोग मुस्करा कर उनके क्रोध को सिर माथे लगा लेते।   ये प्रेम भरी बुंदेलखंडी गलियाँ खड़ी भाषा की भीड़ मे आज  कही खो गई जो आज के इस आधुनिकता बादी माहौल मे खोजने से भी नहीं मिलती। मंदिर से खाने पीने का जो भी  प्रसाद मिलता उसे मंदिर से घर तक पूरे रास्ते 100-50 लोगो मे जरूर वितरित किया जाता। "अमृत रूपी" ये प्रसाद पाने का हमे अनेक बार मौका मिला। उनका घर अच्छा खासा  बड़ा था।  जो पैसे और देखरेख के अभाव मे खंडहर के रूप मे दिन-व-दिन तब्दील हो रहा था। लेकिन उस सूने  मकान मे मिट्टी के तेल का एक छोटा  दिया जला कर केशर बाऊ  लकड़ी चूल्हा जला कर जो बन पड़ता पकाती-खाती और उस अंधेरे घर मे  निर्भय होकर रहती। उनके घर मे जगह जगह बेरी के पेड़ उग आए थे अतः दिन भर बच्चे दीवारों पर चढ़ कर बेर तोड़ने और खाने आते रहते। बेरों के मौसम मे और घर पर अगर कोई पतंग कट कर आ जाती तो पतंग को सम्हाल कर रख लेती और  मुझे जरूर बुलाती। बेर और पतंग के साथ अगर कुछ खाने का समान या पकवान, मिठाई  घर मे रखी  होती  तो बड़े श्रद्धा और प्रेम भाव  से मुझे  खिलाती थी।  पता नहीं क्यों उस सबको देखकर बचपन मे  रामलीला मे देखे "शबरी के प्रसंग" की याद हो आती। इतना वात्सल्य और प्रेम रखती थी वे मेरे लिये। उम्र के इस आखिरी पढ़ाव मे मुझे लगता था कि अपनी  निर्धनता, संतान न होने का दुःख, नजदीकी परवारिक सदस्यों  और उनके बच्चों का उनके प्रति दुराव को झेलते हुए भी उनके दिल मे एक पल भी अपनों के प्रति शिकायत का भाव कभी देखने को  नहीं मिला। स्वाभिमान उनमे कूट कूट कर भरा था। कभी किसी बात पर वे मेरी माँ से भी नाराज हो जाती तो हफ्तों घर नहीं आती। जब कभी रास्ते मे मिल जाती तो हम अपने भाई के साथ उन्हे आग्रह पूर्वक घर ले आता।  जब घर पर आती तो माँ को उलाहने देकर डांटकर कहती इन बच्चों के आग्रह की  बजह से आ गई वर्ना नहीं आती और फिर पुरानी बाते भूल कर  हफ्तों घर पर बनी रहती जैसे कुछ हुआ ही न हो।  रात मे हम बच्चे प्रायः उन से कहानियों की फर्माइश करते तो वे "चुखरों माता" की कहानी सुनाती वो  बुंदेलखंडी कहानी मुझे आज भी याद और प्रिय है जिसे मैं अपने बच्चों और भतीजे-भतीजियों को भी उनके बचपन मे अनेक बार सुना चुका हूँ। हम कभी उस  कहानी को अपने ब्लॉग मे जरूर लिखेंगे। कुछ छोटी बुंदेलखंडी कवितायें भी बो सुनाती थी जिनको हमने अपने बेटे को सिखा कर उसके स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम मे बोलने के लिये भेजा था जिसे स्कूल मे काफी सराहा गया था।

उम्र के अपने आखिरी पढ़ाव मे उम्र दराज़ बीमारियों के कारण उन्हे काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इस आड़े वक्त मे उनके पड़ौसियों और रिशतेदारों  ने उनके परिवार के देवर और भतीजों को खबर की पर शायद अपनी  जिम्मेदारियों और समयाभाव के कारण उनके जीते जी बे लोग कभी न आ सके और एक दिन केशर बऊ के निधन का समाचार मिला। केशर बऊ  ईह लोक छोड़ कर परलोक सिधार गई और पीछे छोड़ गई  बो यादगार पल, मीठी यादें  हर उस व्यक्ति, बच्चे या युवा के साथ जो उसने  "बऊ, राम-राम" कह कर  उनके साथ बिताये थे। उनके निधन का समाचार उनके परिवार  और उनके भतीजों को दिया गया। जीते जी जिसको अपनों से कभी एक रोटी नसीब न हुई हो केशर बऊ के निधन  पर उनके परिवार ने   अपना अंतिम उत्तरदायित्व  बखूबी,  ज़िम्मेदारी पूर्वक, पूर्ण धार्मिक विधि-विधान और रश्मों-रिवाज  से  "अंतिम संस्कार" कर निभाया और ब्राह्मण भोज, तर्पण पिंड दान  आदि किया।  उस खानदानी  संपत्ति को जिसे केशर बऊ ने घोर निर्धनता के समय तमाम मुश्किलों, कठिनाइयों और अभावों के बाबजूद और उनके जीते जी  उन कुछ विघ्न  संतोषी  लोगों के सलाह को दरकिनार कर "कि इस मकान को बेच कर अपनी निर्धनता और अभावों को दूर करलो", अपनी  खानदान की  विरासत "उस मकान" को जिसे केशर बऊ ने  तउम्र  सहेज कर रखा था, उस मकान को  उनके परिवारजनों ने अपने  कानूनी अधिकार के तहत विक्रय कर उस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की और "केशर बाऊ" की कर्मस्थली मे कभी दुबारा न आने की सोच के साथ  अपने गंतव्य को प्रस्थान कर गये।

विजय सहगल       

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