"नागवासुकि मंदिर - प्रयागराज"
बैसे तो प्रयागराज अनेकों बार जाना हुआ,
और पिछले दिनों महाकुंभ मे भी जाना हुआ पर दुर्भाग्य से प्रयाग के एक प्रसिद्ध और
आराध्य देव नागवासुकि जाना नहीं हो पाया। लेकिन अक्टूबर 2025 मे अपने काशी,
बैजनाथ धाम, अयोध्या के तीर्थाटन प्रवास पश्चात पुनः प्रयागराज जाना
हुए तो हमारा दृढ़निश्चय रहा कि मै अपनी अर्धांग्नि के साथ नागवासुकि,
लेटे हनुमान और किले मे स्थित वट वृक्ष के
दर्शन करूँ। हमारे इस प्रयास मे हमारे समधि श्री जेके रावल और उनकी धर्मपत्नी
श्रीमती रीना रावल जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा स्थानीय रहवासी होने से दर्शन सुगम
और सरल हो गए।
तो आइये सर्वप्रथम नागवासुकि की धर्मयात्रा
करते हैं। प्रातः त्रिवेणी के पवित्र संगम मे स्नान ने एक बार फिर से महाकुंभ के
स्नान की यादें ताज़ा कर दी यध्यपि कुम्भ के महायोजन और अभी के संगम स्नान मे जमीन
आसमान का अंतर था। तब महाकुंभ की व्यवस्था,
"न भूतो ने भविष्यति (एक संस्कृत वाक्यांश) अर्थात जो न पहले कभी हुआ हो और न भविष्य मे कभी होगा!! फिर
भी प्रयागराज का पवित्र संगम मे स्नान तो वह धार्मिक कृत्य और आस्था हैं जिसका हमारी सनातन संस्कृति मे सर्वोच्च कल्याण
कारी और पवित्र कार्य माना जाता है।
संगम स्नान के पश्चात अब हमारा लक्ष्य नागवासुकि
मंदिर के दर्शन करना था। इस समय अधिकमास होने के कारण कुछ भीड़ थी लेकिन महाकुंभ मे
हुई भीड़ के मुक़ाबले अपेक्षाकृत काफी कम थी क्योंकि तब इसी कारण हम नागवासुकि के
दर्शन नहीं कर सके थे। गंगा नदी के तट के विपरीत तरफ काफी ऊंचाई पर लाल पत्थर से बने
नागवासुकि मंदिर जाने के लिए बनी सीढ़ियो से होकर जब हम मंदिर मे पहुंचे तो नीचे गंगा
नदी के तट से मंदिर का दृश्य और उपर मंदिर से गंगा नदी का तट बड़ा विहंगम दृश्य
प्रस्तुत कर रहा था। मंदिर की सीढ़ियों के दाहिनी तरफ दीवार पर समुद्र मंथन की विशाल
पेंटिंग नागवासुकि मंदिर के महत्व को दर्शा रहा था। रावल साहब ने बताया कि बरसात मे बाढ़ की स्थिति
निर्मित होने पर गंगा नदी का पानी तटों को तोड़ कर मंदिर की सीढ़ियों तक को डुबो
देता हैं। ऐसे वक्त पर नदी की अथाह जलराशि के भयावह जलराशि की कल्पना ही की जा
सकती है।
जब हम लोग नागराज वासुकि को समर्पित इस मंदिर
की सीढ़ियों पर चढ़ कर मंदिर के प्रांगण मे पहुंचे तो मुख्य मंदिर के चारों ओर बने
बरामदों पर आचार्यों, ब्राह्मणों और
पुरोहितों द्वारा पितृ दोष और काल सर्प दोष के निवारणार्थ पूजा हो रही थी या उसकी
तैयारी चल रही थी। चावल को विभिन्न रंगों मे रंग कर लकड़ी की चौकियों पर पुरोहितों
द्वारा आकर्षक ढंग से नवग्रह, राहू केतू,
और काल सर्प की आकृतियाँ बनाई गई थी जो देखते ही बनती थी। मंत्रों और पूजन विधि
विधान से सम्पन्न कराये जा रहे थे। ऐसी ही आकृति और पूजन विधि मैंने हैदराबाद के
आईपीएस अकादमी के नजदीक बने एक मंदिर मे देखी थी। पुराणों मे उल्लेखित किवदंतियों
के अनुसार जब देवासुर संग्राम के दौरान समुद्र मंथन के लिए मथानी के रूप मे उपयोग
किए गए मंदराचल पर्वत को मथने के लिए रस्सी के रूप मे नागराज वासुकि ने उपयोग के
लिए अपने आपको समर्पित किया। स्कन्द पुराण
मे नागवासुकि के इस मंदिर स्थान को पृथ्वी पर नागहृद तीर्थ कहा जाता है। प्रतिवर्ष
नागपंचमी पर यहाँ एक विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। ऐसी मान्यता और विश्वास है
कि प्रयागराज मे त्रिवेणी संगम या गंगा स्नान
के पश्चात नागवासुकि मंदिर मे शेषनाग के दर्शन करने से पापों का नाश होता है और पितृ दोष/काल सर्प दोष
का सदा सदा के लिए निवारण हो जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान कृष्ण जब अपने
ग्वाल बालों के साथ गेंद खेल रहे थे तो नाग वासुकि ने उनकी गेंद चुरा ली थी। तब
कृष्ण ने नागवासुकि के घर मे जा कर भीषण युद्द कर गेंद बापस ली और पंचमुखी नाग के
फन पर खड़े होकर नदी से बाहर आए।
प्रांगण के मध्य मे बने नागराज वासुकि के
मंदिर के गर्भ गृह मे दर्शन और आरती कर कुछ मिनटों के लिए हम दोनों परिवारों
ने मंदिर मे बैठ कर नागवासुकि का ध्यान
किया। मंदिर के गर्भगृह तत्पश्चात मंदिर प्रांगण की एक परिक्रमा कर मंदिर प्रांगण
मे पितृदोष और काल सर्प दोष के निवारनार्थ चल रही पूजा के दर्शन किए जो बड़ा
मनोहारी दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे। कुछ समय मंदिर मे व्यतीत कर जब हम लोग वापस
नीचे जा रहे थे तो मंदिर के मध्य मे बैठे एक सपेरे को देखा तो साक्षात नाग राज के
दर्शन की उत्कंठा प्रकट की। सपेरे ने कोबरा नाग के दर्शन कराये जब मैंने कोबरा नाग
को सपेरे से लेकर अपने हाथ मे पकड़ा तो मानों चारों तरफ सन्नाटा खिंच गया!! श्रीमती जी और रावल साहब साँप को बापस
सपेरे को बापस करने का बार-बार आग्रह कर रहे थे। मैंने कहा भी कि जब सपेरा साँप को
पकड़ कर रख सकता तो मै क्यों नहीं? मै जंतुविज्ञान
का छात्र रहा हूँ, प्रायः ऐसे साँपों की
विष ग्रंथि और दांत को सपेरे निकाल देते
हैं। ऐसा कृत्य पशु अत्याचार निवारण के
तहत आता हैं।
अनेकों बार प्रयागराज की यात्रा के बाद अंततः
आज नाग वासुकि तीर्थ के दर्शन करना एक यादगार पल को अपने अन्तःकरण की स्मृतियों को
अपने मन मे सँजोएँ हम अपने गंतवाय की ओर चल दिये।
विजय सहगल





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