#बुरहानपुर-म॰
प्र॰#
23 मार्च 2025 को मै अपनी ग्वालियर हैदराबाद
के तीसरे पढ़ाव के रूप मे बुरहानपुर मे अपने भाई श्री संतोष खत्री के आतिथ्य का
सौभाग्य प्राप्त हुआ। बुरहानपुर प्रवास के
दौरान शहर भ्रमण कराने मे मेरे भतीजे श्री सुमित खत्री हमारे सारथी और संवाहक बने।
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमा पर वसा बुरहानपुर ऐतिहासिक दृष्टि के साथ साथ
अपने केला उत्पादन के लिये मशहूर हैं। रेल्वे और सड़क परिवहन के माध्यम से केले की पूर्ति सारे देश
मे की जाती हैं इसलिये ही कृषि पर आधारित बागवानी से यहाँ के गाँवों मे आर्थिक
समृद्धि और किसानों के रहन सहन को आप स्पष्ट रूप से आवागमन के दौरान देख सकते हैं।
अन्य पारंपरिक राजशाही वाले शहरों की तरह ही बुरहानपुर शहर किले नुमा चारदीवारी से
घिरा हैं और शहर मे प्रवेश या निकासी के लिये 7 दरबाजे बने हैं। मुगलों की दक्षिण
विस्तार की नीति का प्रधान केंद्र होने के कारण इस शहर की सुरक्षा भी सुनिश्चित की
गयी थी।
ताप्ती नदी के तट पर स्थित शाही महल (किला)
का निर्माण आदिल खान द्व्तिय ने सन 1457 से 1503 ई॰ के बीच कराया था। किले नुमा यह
शाही महल कभी 7 मंज़िला हुआ करता था,
जिसके अबशेष पूर्व दिशा की तरफ ताप्ती नदी के तट की तरफ अभी भी देखे जा सकते हैं। 1536 ईस्वी मे गुजरात विजय
के बाद हुमायूँ अपनी दक्षिण क्षेत्र के विस्तार नीति के तहत बुरहानपुर आया था।
इसके उपरांत बुरहानपुर को केंद्र मानकर दक्षिण विस्तार के अभियान चलाये जाने लगे। मुगल
राजकुमार शाहजहाँ को बुरहानपुर का गवर्नर बनाये जाने पर शाहजहाँ ने इस किले को
अपना निवास बनाया। मुगलों के दक्षिण विस्तार नीति के कारण इस
किले को खजाने को रखने के रूप मे उपयोग किया जाता था क्योंकि किले के
पूर्वी दिशा मे ताप्ती नदी के प्रवाह के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उत्तम स्थान था,
जहां सोने-चाँदी के अकूत भंडारण की व्यवस्था थी। सुरक्षा की चाक चौबन्द व्यवस्था
के बावजूद मराठा शासक छत्रपति संभाजी महाराज ने 31 जनवरी 1681 से 2 फरवरी 1681 मे,
तीन दिन तक बुरहानपुर शहर को बंधक बनाकर मुगल शासकों की संपत्ति,
सोना-चाँदी, आभूषण और अन्य
हीरे-जवाहरात लूट कर अपनी सेना के साथ सुरक्षित रायगढ़ बापस पहुँच गये थे। बुरहान पुर के बाद छत्रपति संभाजी महाराज ने
मुगल शासको के औरंगाबाद मे भी इसी तरह की
एक अन्य खजाना लूटने की घटना को अंजाम दिया था। यही कारण हैं कि,
इन घटनाओं से घबड़ा कर औरगंजेब ने दीक्षिण विस्तार की अपनी नीति से मुँह मोड लिया
था।
बैसे तो किला जीर्ण शीर्ण अवस्था को प्राप्त
हो चुका था परंतु भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण मे आने के पश्चात यहाँ के रख
रखाव की अति उत्तम, अच्छी व्यवस्था हो गई
हैं। किले के अंदर हरी घास के मैदान और साफ सफाई के कारण प्रातः भ्रमण करने वालों के लिये एक अच्छा
स्थान उपलब्ध हो गया। टूटे फूटे भग्नावशेष देख कर ये पहचानना कठिन था कि उसमे महल
कौन सा था या इन भवनों का क्या उपयोग था?
क्योंकि हम सुबह प्रातः 7 बजे पहुँच गए थे। लेकिन सफ़ेद संगमरमर पर रंग विरंगी मुगल शैली मे बनी पेंटिंग को देख
कर पहचानना कठिन न था कि यह तब के शासकों का स्नानालय था।
प्रातः सूर्य देव के उदय के साथ स्वर्ण आभा
लिये सूर्य रश्मियों जब किले के ऊपरी छत्त पर
बने तीन अर्धवलयाकार द्वारों को प्रकाशित कर रही थी तो नीचे ताप्ती नदी के
घाटों को देखना एक सुखद और आनंद दायक अनुभूति दे रहा था। किले के उत्तरी छोर से
नीचे, जब ताप्ती नदी की ओर निहारते हैं तो किले
की पाँच मंज़िले स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं। ऐसा कहाँ जाता हैं कि यहीं पर शासकों
का खजाना रक्खा जाता था।
ऐसा कहा जाता हैं कि ताज महल मूलतः
बुरहानपुर मे बनाया गया था। मुमताज़ महल
जिसकी याद मे शाहजहाँ ने बुरहानपुर मे ताज महल बनाया था,
17 जून 1631 मे, अपने चौहदवे बच्चे को
जन्म देते समय बुरहानपुर मे उनका देहांत हो गया था। 17 साल बाद,
ताजमहल के 1748 मे पूर्ण होने के बाद मुमताज़ की दो अस्थाई कब्रों से निकाल कर आगरा के ताज महल दफनाने को प्रेम
का प्रतीक बताना समझ से परे हैं? इस पर विद्वान
और बुद्धिजीवि ही कुछ प्रकाश डाल संकेंगे?
इस विषय मे कृपया हमारे ब्लॉग दिनांक 21 मई 2022 का अवलोकन कर सकते हैं। ( https://sahgalvk.blogspot.com/2022/05/blog-post_20.html
)
हमारी बुरहानपुर यात्रा के सारथी सुमित ने जब
मुझे एक जगह ले जाकर खड़ा कर दिया तो सामने
ताजमहल को देख कर सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ!! लगा कि मै स्वपन देख रहा हूँ?
लेकिन साक्षात ताजमहल को देख कर आश्चर्य से अचंभित था। यहाँ यमुना नदी का किनारा
तो नहीं था लेकिन खेत खलिहानों के बीच ताजमहल को देखना निश्चित ही रोमांच देने
वाला था। मैंने सुमित से हँसते हुए पूंछा,
पता करो!, कहीं बजरंग दल ने आगरा
का ताजमहल चोरी कर, उसे यहाँ बुरहानपुर तो
नहीं ले आये?? सुमित ने बताया कि ये
आधुनिक ताजमहल, आईआईटी,
एनईईटी, जेईईई जैसे परीक्षाओं
की कोचिंग देने वाले युवा आनंद चोकसे नामक नौजवान के सफलता की कहानी कहता हैं। क्षेत्र
मे अपने आप मे इस इकलौते कोचिंग सेंटर के संचालक ने ये सफ़ेद संगमरमर का ताजमहल अपने
निजि उपयोग के लिये बुरहानपुर मे बनवाया हैं। जब मैंने सुमित खत्री,
जो स्वयं चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं से पूंछा कहीं इस ताजमहल के निर्माण मे भी
मजदूरों के हाथ तो नहीं कटवाये गये जैसे प्रेम के प्रतीक!! आगरा के ताजमहल मे हुआ था?
सुमित ने मुस्कराते हुए कहा ये आगरा का नहीं बुरहानपुर का ताजमहल है!!
केला उत्पादन के साथ केले के सहायक उत्पाद
जैसे केला चिप्स का भी यहा ऊटपादन होता
हैं। किसी जमाने मे अपने हैंडलूम कपड़े के निर्माण के लिये प्रसिद्ध बुरहानपुर मे
मावा जलेबी भी काफी लोकप्रिय, प्रसिद्ध हैं।
गनीमत है कि इस मावा जलेबी का स्वाद भारत के राजनैतिक नेताओं के मुँह नहीं लगा
अन्यथा बुरहानपुर मे भी मावा जलेबी की फ़ैक्टरि लगाने की चर्चा शुरू हो जाती। बुरहानपुर
मे किला, मस्जिद आदि के साथ
अत्यंत महत्वपूर्ण मंदिर और एतिहासिक गुरद्वारे भी हैं। यहाँ बड़ा गणपति मंदिर,
रोकड़िया हनुमान मंदिर, रेणुका मंदिर,
श्री इच्छादेवी जैसे प्रसिद्ध मंदिर हैं साथ ही साथ बुरहानपुर मे एक एतिहासिक
गुरद्वारा भी हैं, जहां सिक्खों के पहले
गुर, गुरु नानक और दसवें गुरु,
गुरु गोविंद सिंह, अपने नांदेड़ प्रवास पर
जाते हुए कुछ दिन यहाँ रुके थे। गुरु गोविंद सिंह जी ने गुरुग्रंथ साहब के एक
पृष्ठ पर अपने हस्ताक्षर किए थे जिसकी प्रति गुरद्वारे मे श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ
रक्खी है, जिसके दर्शन का सौभाग्य
मुझे भी प्राप्त हुआ।
इस तरह एक और शहर का भ्रमण कर हमने अपनी
अगली मंजिल शेगाँव की तैयारी शुरू कर दी।
विजय सहगल











1 टिप्पणी:
सहगल जी आपकी रोमांचक विवरण शैली के साथ इतिहास पर भी पकड़ बहुत अच्छी है । आपके वृत्तांत उस जगह को सचित्र सामने लाकर प्रस्तुत कर देते हैं ।
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