समानता और संभाव
की प्रतिमा-श्री रामानुजाचार्य, हैदराबाद
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अप्रैल 2025 को हैदराबाद से 39 किमी॰ दूर, हवाई अड्डा मार्ग पर स्थित श्री
रामानुजाचार्य की विशाल स्वर्णाभा से युक्त अप्रतिम,
अद्व्तिय, अतुलनीय
प्रतिमा को देखना एक आश्चर्यजनक, अद्भुद अनुभव था।
216 फुट ऊंची इस प्रतिमा को 11वी शताब्दी के महान वैष्णव संत और समाज सुधारक श्री
रामानुजाचार्य की याद मे बनाया गया हैं। श्री रामानुजाचार्य के वैष्णव मतानुसार, भगवान की दृष्टि मे प्रांत, भाषा, जाति, वर्ग और लिंग से परे ईश्वर सभी को समान दृष्टि से अपना
अनुराग और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। तत्कालीन समय मे समाज मे व्याप्त असमानताओं
का विरोध कर समाज मे परस्पर संभाव और एकरूपता के लिए श्री रामानुजाचार्य ने बहुत बड़ा काम किया था। पल्लामाकूल गोलकुंडा रोड, मुंचितल कस्बे मे चिन्ना जीयार जी यार ट्रस्ट के विशाल परिसर मे स्थित
हैं। श्री रामानुजाचार्य जी के जन्म के 1000 वर्ष के उपलक्ष्य मे इस स्टेचू को बनाया
गया हैं जिस पर लगभग एक हजार करोड़ रुपए की लागत आयी हैं और इस भव्य और विशाल
प्रतिमा का उद्घाटन प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी 5, 2022 को इस भव्य और दिव्य प्रतिमा का उद्घाटन किया था।
गोलाकार
कमल पुष्प पर श्री रामानुजाचार्य की ध्यान मुद्रा (हाथ जोड़े) मे विराजित इस
स्वर्णाभूषित भव्य और विशाल प्रतिमा मे
नीचे कमल के फूल की 54 पंखुड़ियां हैं। दक्षिण भारत मे वैष्णव मत के अनुसार श्री
रामानुजाचार्य के हाथ मे 135 फुट लंबा त्रिदण्डम हैं, जिसके ऊपरी सिरे पर ध्वज हैं, जो वैष्णव मत के पीठधिपति की पहचान हैं और जिसे हर आचार्य हमेशा अपने साथ
रखते हैं। कमल के फूल को 36 हाथियों की सूड़ उठाए प्रतिमाए चारों ओर गोलाकार रूप मे
बनी हैं। इन हथियों की सूड़ से लगातार पानी का प्रवाह गिरते देखना एक दिव्य अनुभव
हैं। कमल पुष्प पर बनी पंखुड़ियों पर चारों ओर भगवान विष्णु के प्रतीक 18 शंख और 18
चक्र भी बने हैं। स्वर्ण आभा से युक्त एक छत्र भी आचार्या के चरणों के पास स्थापित
हैं इस तरह के चाँदी के छत्रों को भक्तों के सिर पर रख कर आशीर्वाद देने की परंपरा
का निर्वहन दक्षिण भारत के मंदिरों मे सहज रूप से किया जाता हैं। मूर्ति के सामने दोनों ओर 108 सीढ़ियां चढ़ कर प्रतिमा
के पास उपर तक पहुंचा जा सकता हैं। अशक्त और वृद्ध जनों को मध्य और ऊपरी मंजिल तक
जाने के लिए व्हील चेयर और लिफ्ट की व्यवस्था भी हैं।
सीढ़ियों
से पहली माला पर जाने पर एक विशालाकार कक्ष हैं जिसके मध्य मे लगभग 4 फुट की
प्रतिमा की प्रतिकृति रक्खी गयी है जो कमोवेश विशाल प्रतिमा का ही प्रतिरूप है। मंदिर
के गर्भगृह मे स्थित अनेकों तोरण द्वार ही
नहीं पूरे परिसर का वास्तु दक्षिण भारत की नागर वास्तुकला, चोल, पल्लव, काकतीय, विजय नागर की
वास्तु कला के दर्शन यहाँ कदम कदम पर दिखलाई
पड़ते हैं। विजयनगर के रथ के छोटे प्रारूप के सुंदर दर्शन भी यहाँ होते हैं। पहली मंजिल पर स्थापित इस छोटी और भव्य प्रतिमा
की विशेषता ये हैं कि इस का निर्माण 120 किलो सोने से किया गया हैं। तमिलनाडू के
पेरंबूदूर मे अप्रैल सन 1017 मे जन्मे
श्री रामानुजाचार्य का देहावसान सन 1137 मे हुआ था। वे 120 वर्ष जीवित रहे, इस कारण ही प्रबंधन ने इस स्वर्ण
निर्मित प्रतिमा का वजन 120 किलो रक्खा हैं । रत्न जड़ित स्वर्ण प्रतिमा पर
विद्धुत प्रकाश की किरणे प्रतिवर्तित होकर एक दिव्य और आध्यात्मिक
स्वर्णाभा चारों ओर विखेर रही थी। उक्त प्रतिमा के अपूर्व और अलौकिक दर्शन बड़े ही भव्य थे। सनातन मे 108
का बड़ा महत्व है इसी कारण प्रतिमा परिसर के चारों ओर 108 मंदिर बनाए गए हैं जहां
पर भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को स्थापित किया गया हैं। जगह जगह स्वल्पाहार
और ठंडे पीने के पानी की व्यवस्था के साथ महिला और पुरुषों के प्रसाधन कक्ष भी
बनाए गये हैं। पूरे परिसर मे साफ सफाई की पर्याप्त और अच्छी व्यवस्था हैं।
मंदिर
दर्शनार्थियों के लिये यूं तो प्रातः 9.00
बजे से रात्रि 8.00 बजे तक लेकिन शनिवार और रविवार को 8.30 तक खुला रहता हैं और
प्रवेश शुल्क वयस्कों के लिये 250 रुपए और बच्चों के लिये 150 रुपए हैं। कार
पार्किंग शुल्क 50 रुपए हैं। खान-पान सहित सभी मूलभूत सुविधाएं अति उत्तम हैं।
लेकिन मेरी राय मे दर्शन के लिये मंदिर मे लगभग शाम छह बजे पहुँचना सर्वोत्तम समय
है क्योंकि 7.30 बजे से मंदिर मे श्री रामानुजाचार्य की 108 पुरोहितों द्वारा
समूहिक आरती, लेसर शो और म्यूज़िकल फाउंटेन का शो भी साथ साथ शुरू होता हैं लगभग एक
घंटे का ये भव्य कार्यक्रम अति दर्शनीय और प्रशंसनीय है जिसकी जितनी भी प्रशंसा की
जाय कम हैं और जिसे शब्दों मे वर्णित करना संभव नहीं। ध्वनि और प्रकाश (लाइट एंड
साउंड) का कार्यक्रम मंदिर पर चढ़ने वाली सीढ़ियों के सामने बने एक जल स्तंभ पर होता
है जिसके चारों ओर रंगीन फब्बारे लगे हुए
हैं।
रामानुजाचार्य
जी की आरती, मंत्रोचारण और गोविंदा...., जय श्रीराम..... के
जयकारों के बाद लेसर शो शुरू हुआ जिसका
केंद्र जलस्तंभ था जिसके नीचे वेलबूटे आदि हैं जिसके उपर सूँड और अगले दो पैरों
सहित हथियों की मूर्तियों हैं, जिसके ऊपर कलश आकृति और शीर्ष
पर कमल पुष्प की आकृति बनी है। फब्बारों के
स्थल के चारों ओर सैकड़ों प्लास्टिक की कुर्सियाँ रक्खी गई थी जिन पर बैठ कर श्रद्धालु
आरती, म्यूज़िकल फाउंटेन और लेज़र शो को देखा जा सकता हैं। जैसे
ही प्रकाश और फब्बरों का शुरू हुआ परिसर की सारी लाइट बंद कर दी गयी। फब्बरों की रंग बिरंगी लाइटों और ऊंची ऊंची धाराओं के बीच जल स्तंभ पर लेज़र शो का
पड़ने वाला प्रकाश अत्यंत ही चमकदार और सुंदर था, जो घड़ी घड़ी मे
तीखे रंग बदल कर एक अद्भुद और आकर्षक दृश्य
उत्पन्न कर रहा था। लेज़र शो के माध्यम से श्री रामानुजाचार्य की जीवनी को चित्रित किया
गया था। इस लेज़र प्रदर्शन के साथ जल स्तम्भ पर रंगों की बरसात के साथ जब फब्बारों की
जल की बौछार के संयोजन से अत्यंत आकर्षक और मनोहारी दृश्य प्रदर्शित हो रहा था। लेज़र
शो के अंत मे जल स्तम्भ के ऊपरी सिरे पर जैसे ही फबबरों की तीक्ष्ण धराए कमल पुष्प
की पंखुड़ियों पर गिरने लगी पंखुड़ियों के बीच से एकदम श्वेत रंग की श्री रामानुजाचार्य
की प्रतिमा उपर उठ कर दिखलाई देने लगी, जिस पर फब्बारों की जल
धाराएँ ऐसे गिर रही थीं मानो जल धाराएँ आचार्या श्री को जल स्नान समर्पित करने के लिए
होड़ कर रही हों। मैंने ऐसे अनेकों शो देखे हैं पर ऐसा अच्छा और जीवंत लेज़र शो कदाचित पहले कभी देखा था।
मंदिर
या अन्य धार्मिक स्थलों पर सुरक्षा की दृष्टि से मोबाइल का निषेध एक वाद-विवाद या चर्चा
का विषय हो सकता हैं लेकिन मंदिर के अंदर आप मंदिर के प्रबंधन द्वारा नियुक्त फोटो
ग्राफर को दो सौ रुपए प्रति फोटो का शुल्क
देकर अपनी या परिवार की फोटो निकलवा सकते हैं। एक अच्छी बात मंदिर प्रबंधन की और देखने
को मिली कि जो मोबाइल और जूते चप्पल आपसे प्रवेश द्वार पर जमा करवाये गए थे जिनका वितरण
लगभग 400 मीटर दूर निकास द्वार पर किया गया, ताकि इन वस्तुओं को प्राप्ति के लिए
आपको दुबारा प्रवेश द्वार पर न जाना पड़े। निकास द्वार पर ही भोजन हेतु भोजन कक्ष बनाया
गया है जहां आवश्यक शुल्क देकर आप दक्षिण और उत्तर भारतीय भोजन का आनंद उठा सकते हैं।
विजय
सहगल






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