गुरुवार, 29 जून 2023

गीता प्रेस,गोरखपुर से जय रामी रार

 

"गीता प्रेस,गोरखपुर से जय रामी रार "

 





एक बार फिर मोदी विरोध के चलते काँग्रेस के महासचिव जय राम रमेश ने सनातन धर्म के ज्ञान तीर्थ गीता प्रेस गोरखपुर को मिले गांधी शांति पुरुस्कार की तुलना गोडसे से कर अपने आप को संकट मे डाल लिया। गीता प्रेस पर काँग्रेस की इस अनुचित और अनधिकृत टिप्पडी के गंभीर दूरगामी, राजनैतिक दुष्परिणाम देखने को मिल सकते हैं?  एक बार ये पुनः प्रतिपादित हो गया कि आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों मे शिक्षित व्यक्ति के विचारों से भी  मूढ़ता की पराकाष्ठा परिलक्षित हो सकती है!! विदित हो कि मोदी के विचारों, कार्यकर्मों मे पूर्वाग्रह रखने के चलते काँग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं महासचिव जय राम रमेश ने गीता प्रेस को गांधी शांति पुरुस्कार प्रदान करने पर अपना विरोध प्रकट किया था।

2021 का गांधी शांति पुरुस्कार गीता प्रेस, गोरखपुर  को प्रदान करने की सूचना पर, 18 जून 2023 को काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जय राम रमेश की  ट्वीटर पर यह टिप्पड़ी कि, "गीता प्रेस को गांधी शांति पुरुस्कार देना वास्तव मे एक उपहास है", वे कहते है कि, "यह गोडसे और सावरकर को सम्मानित करने जैसा है"। जय राम रमेश की यह  टिप्पड़ी  उनके  मानसिक दिवालियापन को दर्शाती है। गीता प्रेस गोरखपुर को मिले गांधी शांति पुरुस्कार की तुलना गोडसे से करना उनकी अस्थिरचित्त मानसिकता की सोच मे पल रहे नासूर मे भरे मवाद की तरह है जिसका कोई इलाज़ नहीं है। जहां तक वीर सावरकर की बात है तो  भारत की स्वतन्त्रता मे उनके शौर्य, साहस, त्याग और बलिदान के समक्ष  जयराम रमेश एकांश भी नहीं है!! उनकी इस धारणा और विचार की  जितनी भी निंदा और भर्त्स्ना की जाए कम है। गीता प्रेस गोरखपुर के बारे मे उनकी यह टिपपड़ी  एक मूढ़  मानसिकता की सड़ी सोच का प्रतीक है। काश जय राम रमेश ने गीता प्रैस गोरखपुर के मूल उद्देश्यों का गहन न सही, कुछ सतही अध्यन किया और समझा होता।       

राजस्थान मूल की व्यापारी द्व्य श्री जयदयाल गोयनका, श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार द्वारा गीता प्रेस की स्थापना 1923 मे की गयी थी। लेकिन उक्त व्यापारी द्व्य द्वारा श्रीमद्भगवत गीता की मूल भावना "निष्काम कर्म" के अनुरूप कार्य करते हुए कभी भी इस संस्थान मे व्यापार नहीं किया। बगैर किसी लाभ की प्रत्याशा के चलते उन्होने इस संस्थान को चलाया। इस संस्थान के प्रबंधन ने कभी अपने निजी लाभ के लिए संस्थान के धन का  उपयोग नहीं किया। स्वयं  कॉंग्रेस जो 1975 मे लोकतन्त्र की हत्या की दोषी है। स्वतन्त्रता के बाद अनेक अवसरों पर कॉंग्रेस नेतृत्व के अनेक शीर्ष नेता भ्रष्टाचार, बेईमानी और आर्थिक घोटाले कर कॉंग्रेस  की नीतियों, सिद्धांतों और विचारों से डिगे हों पर गीता प्रेस गोरखपुर अपने नीतियों और सिद्धांतों पर सदा अडिग रहा, जिसके तहत उसने किसी व्यक्ति, संस्था या सरकारों से किसी भी तरह का कोई आर्थिक अनुदान या लाभ नहीं लिया, यहाँ तक कि अपने प्रकाशनों मे आर्थिक लाभ के लिए कभी भी कोई सरकारी या निजी विज्ञापन स्वीकार नहीं किया। इसी कढ़ी मे गीता प्रेस गोरखपुर को मिले  गांधी शांति प्रतिष्ठान के पुरुस्कार को तो स्वीकार किया पर पुरुस्कार के साथ मिली एक करोड़ रूपये की धनराशि को सविनय अस्वीकार कर दिया। ये होते है, श्रेष्ठी वर्ग के  व्यक्तियों और संस्थानों के उतकृष्ट और अतिउत्तम लक्षण जिसके प्रदर्शन मे काँग्रेस और जय राम रमेश हमेशा चूक करते रहे।

गीता प्रेस गोरखपुर को मिले पुरुस्कार से गांधी शांति पुरुस्कार के ही मान, प्रतिष्ठा और सम्मान मे वृद्धि हुई है, क्योंकि गीता प्रेस द्वारा पिछले एक शताब्दी से भारत ही नहीं विश्व को पाँच हजार ईसा पूर्व भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिये दिव्य संदेश को जन जन तक पहुंचाने का का जो सद्कार्य किया है वो अमूल्य है और जिसका कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता। श्रीमद्भगवत गीता के संदेश विश्व की सम्पूर्ण मानवजाति के लिए आज भी उतने ही प्रासंगिक है जितने आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व थे। निष्काम कर्म के माध्यम से मानव को जीवन जीने की कला सिखलाने वाला ये एक ऐसा दिव्य और पवित्र ग्रंथ है जिस को  वगैर किसी राजाश्रय के विश्व मे सर्वाधिक भाषाओं मे अनुदित और अनुवादित होने का गौरव प्राप्त है। अनेक विद्वानों, विचारकों, साहित्य के प्रवीण और श्रेष्ठ रचनाकारों ने इस पर अपनी टीका लिखी है। ऐसे निष्काम भाव से सनातन धर्म के  ग्रन्थों का प्रकाशन करने वाली संस्था के बारे मे जय राम रमेश की  ऐसी घिनौनी टिप्पड़ी पर कॉंग्रेस का मौन ये दर्शाने को मजबूर करता है कि इस दल और उसके अनुचरों  की सोच, सनातन धर्म के मानने वालों के प्रति कितनी थोथी और सतही है। काँग्रेस और उनके महारथी नेताओं द्वारा यदा कदा सनातन धर्म और धार्मिक संस्थाओं पर मन्तव्य, टीका और टिप्पड़ियाँ न केवल औचित्यहीन, अनावश्यक और अनपेक्षित है अपितु हिन्दू जन मानस के लिये असहनीय और क्रोधावेश से आहत करने वाली भी हैं। सनातन धर्म के मानने वालों के लिये हमारे चारों तीरथों की ही  तरह गीता प्रेस गोरखपुर भी एक ज्ञान तीर्थ की तरह है जो पिछले एक सौ सालों से सनातन धर्म के महान पवित्र  ग्रन्थों, यथा श्रीमद्भगवत गीता, रामचरित मानस, पुराण, उपनिषद, बालक, बालिकाओं और महिलाओं से संबन्धित 15 भाषाओं की करोड़ो पुस्तकों  का प्रकाशन करने वाला संस्थान है। कल्याण मासिक पुस्तक जैसे सद्साहित्य  की 2॰5 लाख से भी अधिक  प्रतियाँ हर माह, आज भी  प्रकाशित की जाती हैं।           

गांधी से मतैक्य या मत भिन्नता होना गोडसे की विचार धारा होना नहीं है। यदि ऐसा होता तो क्या गांधी जी के उस कथन कि, "अखंड भारत का विभाजन उनकी लाश पर होगा" को अनदेखा कर भारत के बँटवारे को स्वीकार करने वाली काँग्रेस, "गोडसे की विचार धारा" का प्रबल पोषण करने वाला  सबसे बड़ा दल नहीं है?? तब काँग्रेस और श्री जय राम रमेश की विचार धारा कहाँ थी। दुनियाँ के इतिहास मे इतनी सरलता से अपने निजी स्वार्थ के लिए इतना औचित्य हीन बंटवारा कहीं नहीं देखा गया!  तब क्यों न हमे  काँग्रेस को भी "गोडसे की विचारधारा" का बड़ा "पालक" मानना चाहिए जिसने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये गांधी के निश्चय को अनदेखा कर देश का विभाजन स्वीकार किया जिसमे  करोड़ों लोगों को न केवल अपना घर परिवार और  मातृ भूमि छोड़ने को मजबूर किया अपितु  इस विभीषिका  मे दस  लाख से ज्यादा लोगो को अकारण ही अपने प्राणों की आहूति देनी पड़ी।

काश!!  जय राम रमेश और काँग्रेस द्वारा गीता प्रेस गोरखपुर की आलोचना के पूर्व वहाँ श्रीमद्भगवत गीता की 7.2 करोड़ से अधिक प्रकाशित प्रतियों मे से एक श्लोक का भी सार ग्रहण कर उसका अनुसरण किया होता तो उनका जीवन यूं ही निष्फल न गया होता। भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 6 के श्लोक 7 मे कहते है कि हे अर्जुन -:

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।  (6.7)

अर्थात जिसने अपने-आप पर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्य प्राप्त हैं।

अभी भी वक्त है गीता प्रैस जैसी सनातन धर्म के आध्यात्मिक और धार्मिक ग्रन्थों के प्रचार, प्रसार के लिए समर्पित संस्थानों पर  कॉंग्रेस और उनके प्रवक्ताओं को अपनी नकारात्मक सोच से परिपूर्ण टीका टिप्पड़ी से बाज आना चाहिए, यही काँग्रेस के हित मे रहेगा!!

विजय सहगल

 

 

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

सहगल जी बहुत सुंदर शब्दों में आपने मणिशंकर ऐय्यर के मानसिक भाई जयराम रमेश की खाल में भूसा भरने का पुनीत कार्य किया ।यह व्यक्ति गोडसे जी का नाम भी लेने लायक़ नही है जिसने वगैर किसी व्यक्तिगत फ़ायदे के जान को हथेली पर रखकर पुनीत कार्य किया।सावरकर जी के तो पैरों की धूल छूने लायक़ यह देशद्रोही नहीं है।इन्हें और इनके मंदबुद्धि नेता को मुस्लिम लीग सेकुलर दिखाई देती है और गीताप्रेस को पुरस्कार देने में दोष दिखता है। मैं इन जैसे दोगले नेताओं पर गाली खर्च कर गाली का अपमान नहीं करना चाहता ।