रविवार, 9 जुलाई 2023

होसूर-तमिलनाडू

 

होसूर-तमिलनाडू









बेंगुलुरु मे लगभग दो माह का प्रवास समाप्ती पर था। सरजापुर मे प्रायः बात बात पर तामिलनाडु स्थित होसूर का नाम लोगो के जुबान पर सुन कर 9 अप्रैल 2023 को मैंने होसूर जाने के निश्चय किया जो मेरे आवास से 21 किमी दूर था। यूं तो साधारणत: भारतीय परिवारों मे वरिष्ठ नागरिकों को मोटरसाइकल से घूमने की आज़ादी नहीं मिलती पर उस दिन होसूर (जिला कृष्णगिरी-तमिलनाडू)  से सब्जी लाने के मेरे एलान पर परिवार मे सहमति बनी कि चलो घर का एक आवश्यक काम साथ मे निपट जाएगा। 21 किमी॰ जाना और आना तथा एक घंटे की घुम्मकड़ि कुल दो घंटे के अनुमान के साथ मैंने घर से प्रातः 7 बजे प्रस्थान किया। पर घर के बाहर कोहरे सा मौसम देख लगा कि गर्म हुड की जैकिट  पहन लेना उचित होगा। इस आशय से मैंने जैकिट को पहन घर से प्रस्थान किया। मेरा अनुमान ठीक था अन्यथा जैकिट के बिना 21 किमी॰ के सफर मे सर्दी से घिग्घी बंध गयी होती।   

अनुमान से परे बेंगलुरु के सरजापुर से मात्र 6-7 किमी॰ ही निकले थे कि तमिलनाडू की सीमा आरंभ का बोर्ड देख थोड़ा रोमांच हुआ कि जमीन पर खिंची सीमा की रेखा के पार कितना कुछ बदल जाता है। राज्य स्तरीय कानून, टैक्स आदि के साथ प्रांत, भाषा, सांस्कृति के बदलाब को स्पष्ट रूप देखा और महसूस किया जा सकता था। सड़क और भी चौड़ी और साफ सुथरी थी। कोहरा और घना हो चुका था। पूरे छह मार्गी राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे मंथर गति से मोटरसाइकल की यात्रा जारी थी। कुछ गाँव और कस्बों से निकलते हुए अंततः अब हम होसूर शहर मे  प्रवेश कर रहे थे जिसके उपर से  मैसूर-कन्या कुमारी राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 44 रूपी फ़्लाइ ओवर का द्वार दिखाई दे रहा था। होसूर तमिलनाडू का एक छोटा पर महत्वपूर्ण औध्योगिक केंद्र भी है जहां टीवीएस, अशोक लीलैंड, टाइटन, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं अन्य बड़ी कंपनियों की फ़ैक्टरि और कारखाने है।  

फ़्लाइ ओवर के नीचे से निरुद्देश्य शहर की एक सड़क को पकड़ उसके अंतिम छोर तक जाने का निर्णय लिया। चंद मिनटों शहर की मुख्य सीमा से लगे  होसूर रेल्वे स्टेशन पर अपनी उपस्थिती दर्ज कर "अकड़ बकड़ बंबे बोल........ कर बाइक को दूसरी दिशा मे मोड दिया। मुख्य सड़क से लगभग दो सौ मीटर दूर बाएँ एक  दिशा की  ओर मोड़ दिया। देख कर सुखद आश्चर्य हुआ राजस्थान समाज द्वारा नवनिर्मित भव्य "आई माता मंदिर" जो सुंदर नक्काशी लिये संगमरमर के पत्थर से निर्मित था। धार्मिक और आध्यात्मिक भावों से निर्मित मंदिर के प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही एक सफ़ेद संगमरमर के पत्थरों से निर्मित वर्गाकार चबूतरे पर स्थित  भव्य और आकर्षक मंदिर का भवन दिखाई दिया। संगमरमर के फर्श पर हरे, पीले और नीले रंग के  वेल बूटे को उकेरा गया था। वर्गाकार चबूतरे पर चढ़ने के लिये बैसी ही नक्काशी सीढ़ियों पर की गयी थी। पास ही रंगीन मोर को लकड़ी की कलात्मक सज्जा से माता के  प्रतीक चिन्ह को सीढ़ियों के किनारे लगा कर रक्खा गया था। प्रांगण मे प्रवेश के बाद हम मंदिर के मुख्य मंडप मे खड़े थे। मंडप के आँगन के चारों ओर संगमरमर के स्तंभों पर बहुत बारीक नक्काशी की गई थी। श्री आई माता के दरबार को बहुत करीने से सजाया गया था। देवी माता के मंदिर के एक ओर भगवान गणेश और दूसरी ओर राधा-कृष्ण की सुंदर भव्य प्रीतिमायेँ विराजित थी। माता के चरणों मे अपना शीश नवा कर और प्रसाद ग्रहण कर अब हम यायावरी हेतु अगले पढ़ाव के ओर चल दिये।

मुख्य बाज़ार के बीच मे ही श्री शूलगिरी आंजनेय भगवान श्री  हनुमान जी की एक भव्य विशाल काय  प्रतिमा  स्थापित थी। जिसके ठीक सामने भगवान कृष्ण को समर्पित प्राचीन कृष्ण मंदिर था। जहां पर लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ दर्शन के मंदिर मे आ रही थी। मैंने भी इस भव्य और प्राचीन मंदिर के दर्शन के साथ दाल-चावल के प्रसाद का लाभ लिया। उक्त मंदिर का वास्तु-स्थापत्य काफी पुराना और दक्षिण भारतीय शैली के रूप मे निर्मित था। भगवान कृष्ण और राधा के दर्शन से मन और दर्शन  पश्चात चावल रूपी प्रसाद से उदर तृप्त हो गया।

अब बारी थी लगभग 800 वर्ष पूर्व निर्मित होसूर के प्रसिद्ध चंद्र चूड़ेश्वर मंदिर जो भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित भगवान शिव के दर्शन की।  मंदिर जो शहर के एक सिरे पर पहाड़ी पर निर्मित है और प्रायः शहर के हर स्थल से दिखाई देता है। राष्ट्रीय राजमार्ग के नीचे से होकर दाहिने तरफ की सड़क जो पहाड़ी पर स्थित शिव मंदिर की ओर जाती है। मंदिर के प्रवेश द्वार को सड़क के आर पार आकर्षक ढंग से रंग बिरंगी देवी देवताओं की प्रीतिमाओं से सुसज्जित किया गया है। पक्की डामर रोड मंदिर तक बनी है आप अपने या पब्लिक वाहन से मंदिर तक पहुँच सकते है। वर्गाकार रूप मे निर्मित मंदिर का विशाल प्रांगण बाहर से गेरुई और सफ़ेद रंग की पट्टियों से पेंट किया हुआ है। मंदिर के लंबे परिकृमा पथ बनाया हुआ है जिस पर  विशेष पर्वों के समय श्रद्धालु प्रवेश और निकास द्वार से आते जाते है पर सामान्य दिनों मे सहजता पूर्वक मंदिर के दर्शन किए जा सकते है। मंदिर के प्रवेश द्वार मे प्रवेश करते ही  प्राचीन पाषाण स्तंभों से निर्मित भव्य मंदिर के दर्शन होते है। मंदिर मे पूर्व दिशा की तरफ से दर्शन हेतु प्रवेश के पूर्व अन्य देवी देवताओं के छोटे छोटे मंदिर स्थित है जिनके दर्शन का लाभ भी श्रद्धालु लेते चलते है। मंदिर के मुख्य मंडप मे स्थित शिव मंदिर के दर्शन हेतु श्रद्धालुओं की लाइन लगी थी। मै भी अपनी बारी की प्रतीक्षा हेतु इंतजार कर रहा था। मंदिर के द्वार के समीप भगवान शिव की अत्यंत मनोहारी और आकर्षक प्रतिमा के दर्शन अप्रितम थे। फूलों और स्वर्ण आभूषणों से भगवान शिव और माता पार्वती का श्रंगार किया गया था। मंदिर मे धूप दीप की महक मन को प्रसन्न कर आनंद देने वाली थी। भगवान के स्वरूप के दिव्य और भव्य दर्शन इतने चित्ताकर्षण थे कि उनके दर्शन मात्र से मै अपनी सुधि-बुधि खो बगैर किसी अरदास के बापस आ गया। शायद ये देवाधिदेव का संकेत था कि मै उनके स्नेह आशीर्वाद  हेतु दुबारा दर्शन करने आऊँ! मंदिर प्रांगण मे ही वासू और उसकी पत्नी ईश्वरीय से मुलाक़ात हुई जो बड़ी तन्मयता से मंदिर परिसर की सफाई मे रत थे। मैंने उन दोनों की उनके सफाई के कार्य हेतु प्रशंसा कर कहा, कि सच्चे अर्थों मे तुम दोनों ही ईश्वर के भक्त हों जो मंदिर परिसर को साफ सुथरा रख मंदिर की पवित्रता, दिव्यता और भव्यता मे चार चाँद लगाते हों!! मैंने अपने  भाव भंगिमा और इशारों से उनको अपने विचारों से अवगत कराने की कोशिश की पर शायद भाषा की संवाद हीनता के कारण वे दोनों हमारी बात को नहीं समझ सके। लेकिन पास ही प्रसाद और स्वल्पाहार के दुकानदार से जब मैंने निवेदन कर उन सफाई कर्मी युगल को अपने मंतव्य को उनकी तमिल भाषा मे बतलाने को कहा, जिसे सुन कर दोनों पतिपत्नी कृतज्ञता के भाव से विभोर थे। जिसको उनके चेहरों पर संतुष्टि की मुस्कान से सहज ही समझा जा सकता था। कदाचित ही कभी किसी ने उनके कार्य की इस तरह प्रशंसा की थी। जब मैंने वासू से एक सेल्फी लेने का अनुरोध किया जो उन्होने सहर्षता पूर्वक स्वीकार कर इशारों से आभार व्यक्त कर धन्यवाद दिया।

मंदिर के निकास द्वार पर एक भव्य और विशाल निर्माणाधीन रचना देखी जो शायद मंदिर के प्रवेश द्वार की तरह रही थी। बापसी मे मंदिर की पहाड़ी से होसूर शहर के आकाशीय दर्शन मनोहारी थे। बापसी मे रास्ते मे पड़ने वाले अन्य मंदिरों के दर्शन करते हुए रास्ता बदल कर एक तालाब के निकट पहुंचे जो पहाड़ी से तो सुंदर दीख रहा था पर निकट के दर्शन इस कहावत  को चरितार्थ कर रहा था कि "दूर के ढ़ोल सुहावने, पास के ढप-ढप होयें!!

बापसी मे मुरगन जी के हाथ ठेले पर रुके बिना नहीं रह सका जो पके हुए पीले कटहल की बिक्री 120/- रूपये प्रति किलो की दर से कर रहे थे। खरीदने के पूर्व मैंने एक छोटे पीले कटहल के  टुकड़े का स्वाद लेने का निवेदन किया। उन्होने एक छोटे टुकड़े को मेरी ओर बढ़ाते हुए खाने का आग्रह किया। मैंने पहली बार इस तरह पके हुए कटहल का स्वाद लिया जो मीठा और थोड़ा आम का स्वाद लिये था। कच्चे कटहल की तरह उसमे कोई चिपचिपाहट नहीं थी। एक पाव पके कटहल को मैंने पैक करा कर मुरगन जी को धन्यवाद ज्ञपित किया।

होसूर शहर मे ही एक अन्य जगह पर काले और पील रंग के छोटे नारियल की तरह के फल को देख मै पुनः रुका। जो ताड़ फल था। जिसके बारे मे बचपन मे अच्छी राय नहीं रखता था। इसके रस से ताड़ी अर्थात एक तरह की देशी शराब की नकारात्मक कल्पना मेरे जेहन मे बनी थी। मैंने पहली बार इस फल का स्वाद चखा जो बड़े सिंघाड़े के आकार की तरह था जिसमे शीतल रस भरा था  जो प्रिय न सही लेकिन अप्रिय भी नहीं था। लोग बड़ी मात्रा मे इस फल को नारियल की तरह छिल्वा कर उसमे निकलने वाले 3 या 4 फलों को पैक करा रहे थे। मैंने भी एक फल को खाया और एक को पैक करा कर बैग मे रक्खा।

अब तक 3 घंटे के अनुमान से अलग  छह घंटे हो चुके थे। मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्या के चलते घर के लोगों से  संपर्क ने हो पाने के कारण परेशानी और बड़ गयी, जिसका अहसास घर पहुँचने पर लानत-मलानत से हुई।  खुशी इस बात की थी कि होसूर से लाई सब्जी-भाजी, फल के साथ पका हुआ कटहल और ताड़ के फल ने उनके क्रोधाग्नि  को शांत करने मे बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।                   

विजय सहगल

 

        

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

अति सुन्दर। आपके सभी वृतांत अत्यधिक रोचक होते हैं। धन्यवाद

बेनामी ने कहा…

[10/07, 02:02] Raman Chandrshekhsr: Sehgal Sir, your all description of travel are very interesting and ab aage kya ye utsukta banaye rakhti hai. Great ho Sir👍👍
[10/07, 02:03] Raman Chandrshekhsr: Hosur ka vritant padhne mein anand aa gaya. End toh bahut badia hai.