शुक्रवार, 17 मार्च 2023

बेंगुलुरु का ग्रामीण पर्यटन

 

"सरजापुर, थिन्ड्लु ग्रामीण पर्यटन"












1 मार्च 2023 से सरजापुर, बेंगलुरु क्षेत्र के ग्रामीण पर्यटन ने पिछले लगभग 15 दिन मे मेरा मन मोह लिया। यह कोई धार्मिक, इतिहासिक, प्राकृतिक या कोई चुनौती पूर्ण पर्यटन स्थल नहीं था फिर भी क्षेत्र के मौसम, लोगो के मिजाज और क्षेत्र की समृद्धि देखते ही बनती थी लेकिन क्षेत्र मे उत्तम कानून व्यवस्था की स्थिति ने सोने मे सुहागे का काम किया। बेंगलुरु के बाहरी क्षेत्र और ग्रामीण परिवेश से घिरे इस क्षेत्र मे भी बेंगलुरु के विकास की बयार बहने लगी है। बड़ी संख्या मे अवसीय इमारतों ने  इस क्षेत्र मे विकास की गाथा लिखनी शुरू कर दी है।

अपने ठहरने के स्थान से भ्रमण हेतु मैंने हर दिन एक नये रास्ते का अनुसरण किया। कभी सड़क से कभी कच्चे रास्ते से तो कभी पगडंडी और कभी खेतों की मेड़ से होते हुए गुजरने  का अहसास किसी आज़ाद पंछी की तरह आसमान मे  उड़ने से कम न था। सुबह की सर्द हवाओं मे एक पतली जैकिट या स्वेटर का साथ लगातार उत्तर भारत की गुलाबी सर्दियों का अहसास कराता रहा। वाहनों की गहमा गहमी से दूर महानगर के शोर और प्रदूषण से मुक्त कच्ची पगडंडी पर जब सुबह के छह बजे  विविध भारती पर भक्ति संगीत और संगीत सरिता  के बाद "भूले-बिसरे गीतों" और "हम है राही प्यार के"  नगमों को सुनते हुए मीलों, सुनसान रास्तों पर चलने के साथ का  सुखद अहसास हो तो  शब्दों मे ब्याँ करना मुश्किल हो जाता है। एक स्वप्निल आदर्श गाँव की परिकल्पना के साथ जीने का स्वर्गिक आनंद अविस्मरणीय रहा।

सरजापुर से होसकोट और हौसूर रोड के बीच वसे इन गाँवों  मे ग्रामवासियों की समृद्धि की कहानी कदम कदम पर देखने को मिली। गाँव के लगभग हर घर  मे 3-4 उत्तम नस्ल की काली सफ़ेद गायें देखने को मिल जाएंगी। उत्तर भारत मे जहां आये दिन "अमूल्य दूध" की बढ़ी कीमतों से नागरिक भले ही दुःखी रहते हों पर यहाँ दूध उत्पादन और उसकी  उपलब्धता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि "नंदनी मिल्क समिति" का पैकेट दूध 45 रुपए लीटर मे उपलब्ध है। यदि आप प्रातः भ्रमण के साथ निजी दूध डेयरी से दूध लाने मे सक्षम है तो दूध का रेट 35-37 प्रति लीटर मे  भी सुलभ है। हर गाँव मे दूध संग्रह केंद्र ग्राम वासियों की आर्थिक समृद्धि मे मील का एक पत्थर साबित हो रहे है। 7 मार्च 2023 को होलिका दहन के दिन गाँव मे लकड़ी और सूखे चारे की व्यवस्था तो हो गयी पर गाँव के घरों से गाय के गोबर के उपले अर्थात कंडे  मिलना दूभर हो गया क्योंकि सभी ग्राम वासी गाय के गोबर को अपने खेतों मे जहां तहाँ एकत्रित कर कम्पोस्ट खाद के रूप मे उपयोग करते नज़र आये।  फिर क्या था परंपरा तो निभानी थी, सड़क किनारे पड़े गाय के सूखे गोबर को एक थैली मे भर कर होलिका दहन के लिए गाय के गोबर के उपलों/कंडों  की औपचारिकता पूरी की जिसे पड़ौस की एक महिला ने अपनी सिद्धहस्त रंगोली से और भी सुंदर बना दिया।

गाँव के बाहरी क्षेत्रों मे जहां तहाँ लंबे चौड़े गड्ढे खोद कर वारिस के पानी की झीलों के निर्माण के कारण न केवल प्रवासी पक्षियो का डेरा है बल्कि खेतों की सिंचाई हेतु नलकूप के माध्यम से पानी, सहजता से उपलब्ध है। गाँव के हर घर जल के अंतर्गत पानी के नल का कनैक्शन भी उपलब्ध कराया गया है। यध्यपि कर्नाटक मे किसी भी दल की सरकार की ईमानदारी पर हमेशा सवालिया निशान रहे है पर ग्रामीण क्षेत्रों मे पीने के स्वच्छ "आर॰ओ॰" पानी को  महज 5/- रुपए मे 25 लीटर पानी का जार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की  जितनी भी प्रशंसा की जाये कम होगी। निश्चित ही इस "स्वच्छ जल योजना" से ग्रामीणों को अनगिनित जल जनित बीमारियों से बचने मे महत्वपूर्ण योगदान है।  जिसका सफल संचालन  मैंने थिण्ड्लु, एमसी हल्ली, कुन्दन हल्ली और सरजापुर  गाँव मे देखा। यूं तो परंपरागत धान, ज्वार की खेती के अतिरिक्त सब्जी की खेती की पैदावार को तो सारे देश मे जगह जगह देखा जा सकता है, आम, चीकू, अमरूद, नारियल की बागवानी को यहाँ देखने को मिली  जो  यहाँ के किसानों की उन्नतशील खेती और प्रगतिशील सोच को दर्शाता  है। पर फूलों की खेती और सिल्क के कीड़ों को पालन इस क्षेत्र के किसानों के पुरुषार्थ को बाकी से अलग रखता है। सड़क किनारे इमली के पेड़ों की बहुतायत देखने को मिली तो जरूर पर पेड़ों पर लदी पकी इमिलियों को देखने से लगता नहीं था कि इस कृषि उपज को लोग अपनी अतिरिक्त आय के लिए उपयोग मे लाते,  अन्यथा सड़क किनारे पैरों तले या वाहनों से रौंदी जा रही इमली के फलों की ये दशा देखने को न मिलती। खेत, खलिहानों और बगानों मे आवश्यक रूप से  ड्रिप इरीगेशन (बूंद बूंद सिचाई) का उपयोग भी यहाँ के किसानों की  आधुनिक वैज्ञानिक सोच को समान रूप से दर्शाता दिखा।

गाँव के प्रायः हर घर मे दो-तीन उच्च श्रेणी के निजी, टैक्सी या स्कूल वाहन बेंगुलुरु की यातायात व्यवस्था के सुचारु संचालन मे  अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है। गाँव मे शायद ही कोई घर  बेरोजगारी की समस्या से ग्रस्त नज़र आया हो।          

5 मार्च 2023 को  प्रातः भ्रमण मे केरल के एक सूचना तकनीकि इंजीनियर श्री गिरीश से भेंट हुई जो रविवार को साठ हज़ार रुपए की वार्षिक लीज़ पर ली गयी कृषि योग्य भूमि पर फूलों की खेती करवाते नज़र आये। उन्होने बताया पीले और सफ़ेद गुलबहार फूल साप्ताह मे  एक दिन 7-8 मजदूरों को लगा कर यहाँ से नजदीक हौसूर फूल मंडी मे एक सौ रुपए प्रति किलो  तक की दर से बिक जाते है। एक आईटी इंजीनियर द्वारा फूलों की खेती करते देख अच्छा लगा। इसी तरह श्री मंजु नाथ जो कॉमर्स के स्नातक है और पूरे साल गुलाब के फूलों की खेती मे रत है को भी देख अच्छा लगा। मंडी मे गुलबहार के फूलों के मुक़ाबले फूलों के राजा  गुलाब के फूलों के आधे रेट अर्थात 50/- कि॰ मे बिक्री की जान थोड़ा अफसोस हुआ। घरों और फूलों के  इन खेतों  को, पौध उपलब्ध कराने की नर्सरियाँ  भी जहां तहाँ देखने को मिली जहां पर गुलाब के पौधों की कलम और अन्य विभिन्न फूलों की पौध को बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जा रहा था। झीलों के किनारे भ्रमण के दौरान प्रवसी पक्षियों और कुछ नितांत जंगली रस्तों मे जंगली खरगोश और साँपों को देखना रोमांचकारी अनुभव था। सरीसृप समूह के इन रेप्टाइलस  प्राणियों की उपस्थिती शायद झील किनारे बने  मुर्गी पालन केन्द्रों के कारण संभव रही होगी।

हाँ नित्य लगभग दो घंटे के भ्रमण के बाद ऊर्जा ग्रहण करना तो बनता था, जिसे नागराज और राजप्पा जैसे ताजे हरे नारियल के बिक्रेताओं ने पूरा किया, जिसकी कीमत मात्र 30 या 35 रुपए के भुगतान कर प्राप्त किया। एक ओर कोरोना काल मे जहां डिजिटल भुगतान पर राजनैतिक दलों के बीच वाद-प्रतिवाद होते दिखे थे लेकिन इस पूरे क्षेत्र मे नारियल जैसे छोटी कीमत के उत्पाद सहित हर छोटे बड़े हॉकर, दुकानदार के पास पेटीएम, यूपीआई, भीम जैसे डिजिटल भुगतान प्लेटफोरम की सुविधा को देख कर "डिजिटल इंडिया" के बढ़ते कदम का अहसास भी आनंद दायक था, न खुल्ले पैसे का झंझट न नगद रखने का सिरदर्द।    

यूं तो स्वच्छ भारत अभियान से लोगो मे कुछ जागरूकता आयी है पर भारत के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों की तरह यहाँ भी गंदगी, कचरा और कूड़ा जहां तहाँ देखने को मिले। खाली प्लॉट, सड़क के किनारे गाँव के छोरों पर एक समान रूप से अनुपयोगी प्लास्टिक, खाली डिब्बे, बोतलों का कचरा को  देखा जा सकता था। सरजापुर के इन ग्रामीण क्षेत्रों मे महंगे घरों, विलासता पूर्ण वाहनों से यहाँ की आर्थिक समृद्धि और विकास का अनुमान लगाना कठिन न था, पर यहाँ के रहवासियों की आर्थिक समृद्धि को सड़क किनारे पड़े कचरे के बीच खाली बीयर और उच्च श्रेणी की व्हिस्की की बोतलों, विदेशी ब्रांड की सिगरेट के खाली पैकेट से भी देखा जा सकता है। काश सूचना तकनीकि के इस क्षेत्र मे मेघालय के मौलिन्नोंग-गाँव (https://sahgalvk.blogspot.com/2023/01/blog-post_21.html) की परिकल्पना साकार हो पाती।   

5 मार्च 2023 को एमसी हल्ली ग्राम मे भ्रमण के दौरान कहीं से दक्षिण भारतीय संगीत वाद्ययंत्र की मधुर तान सुनाई दी। उसी दिशा मे कदम बढ़ाने पर लगा शायद कर्नाटक संगीत का कोई औडियो या वीडियो बज रहा होगा। पर नजदीक पहुँचने पर देख सुखद आश्चर्य हुआ जब   दक्षिण भारतीय परिवेश मे कर्नाटक शैली के चार पारंगत संगीतज्ञ, संगीत वाद्ययंत्र बजाते नज़र आये, जो गली मे स्थित मंदिर के  किसी धार्मिक आयोजन मे  पारंपरिक मंगल ध्वनि के लिए आये थे। बड़ी तल्लीनता और तन्मयता से लगभग 20-25 मिनिट तक कर्नाटक संगीत के श्रवण ने मन को मोह लिया। इस संगीत मंडली का नेतृत्व श्री सुरेश बाबू कर रहे थे जिन्होने बताया कि वे धार्मिक, सामाजिक शादी विवाह आदि के आयोजनों मे आमंत्रित किए जाने पर अपने संगीत की प्रस्तुति शुल्क सहित देते है। आप भी इस छोटे से  वीडियो के  दर्शन-श्रवण का आनंद लीजिये और हाँ घर मे मंगल कारज की अवश्यकता पड़ने पर आप दिये गए नंबरों पर इनसे संपर्क कर सकते है। इस तरह देश के सबसे बड़े सूचना तकनीकि केंद्र बेंगलुरु के एक छोर पर स्थित सरजापुर के ग्रामीण पर्यटन की यात्रा एक सुखद यात्रा थी।  

विजय सहगल     

कोई टिप्पणी नहीं: