"उगादिया सुभाष्यागड़ु" ("ಯುಗಾದಿಯ ಶುಭಾಶಯಗಳು")
यूं तो प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी चैत्र
नवरात्रि, गुड़ि पड़वा,
नवसंवत्सर, चेटी चांद और उगादि
पर्व मनाया गया पर आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा विक्रम संवत 2080 तदानुसार 22 मार्च
2023 को कर्नाटक के गाँव "ठिन्द्लु" मे मनाये जाने वाले उगादि पर्व मेरे लिये विशेष था।
आज का पारंपरिक प्रातः भ्रमण स्थगित था जिसके बदले गाँव की गलियों मे सुबह सुबह
उगादि त्योहार के अवसर पर हर घर मे चल रही तैयारियाँ को देखने-परखने का विशेष दिन
था। छोटे से गाँव की गलियों मे एक अजनबी को पहचानना कठिन नहीं था,
अतः समस्या ये थी कि एक बाहरी व्यक्ति के नाते ग्रामीण वासियों से अपने आप को कैसे
जोड़ा जाये? ताकि एक अजनबी होने की
पहचान का ठप्पा सहज और सरल किया जा सके। इस हेतु सूचना तकनीकि ने मेरी सहायता की।
गूगल अनुवाद के माध्यम से मैंने "उगादि की शुभकामनायें" का कन्नड अनुवाद
("ಯುಗಾದಿಯ ಶುಭಾಶಯಗಳು"), "उगादिया सुभाष्यागड़ु" को याद कर लिया। अब क्या था
घर के सामने उगादि के तैयारी मे खड़े बच्चे,
बड़े, बच्चियों और महिलाओं को जब "उगादिया सुभाष्यागड़ु" बोला तो मै उनके लिये एक अजनबी
नहीं था। कुछ लोगो ने प्रत्युत्तर मे "सुभाष्या" किसी ने "थैंक
यू" और किसी ने "सेम टू यू" कह मुस्करा कर अभिवादन किया। कुछ छोटे
छोटे बच्चे जब "उगादिया सुभाष्यागड़ु" कह मुस्करा कर खड़े रह जाते तो उनके पिता बच्चे
को "थैंक यू अंकल" कहने को प्रेरित करते। आप विश्वास मानिए एक छोटे से
कन्नड वाक्य "उगादिया सुभाष्यागड़ु" के कारण मै बड़ी आसानी से उनके साथ घुल मिल गया।
यूं तो गाँव के घरों मे हर रोज रंगोली
डालने/बनाने की परंपरा है। पर आज तो कन्नड नव वर्ष उगादि का विशेष अवसर था। आज तो
हर घर मे लोगो को उगादि का उत्साह देखने को मिला। समान्यतः गाँव मे आने जाने वाले
स्कूल वाहन उगादि अवकाश के कारण बंद थे। ग्रामीण वासी साइकल,
स्कूटी पर आम, नीम और केले के पत्ते
लाते-लेजाते दिखे। कुछ घरों के बाहर पानी से धुलाई कर,
घर की महिलाओं और बच्चियों द्वारा रंगोली
बनाई जा चुकी थी और कुछ घरों मे इसे बनाने की तैयारी चल रही थी। प्रायः गाँव के हर
घर मे बंधी गायों को स्नान करा कर माथे से लेकर पूंछ तक जगह जगह हल्दी और रोली से
तिलक किया जा रहा था। गाय के पैरों मे भी इसी तरह हल्दी कुमकुम का चन्दन लगाया गया
था जो सनातन धर्म मे गाय मे 33 करोड़ देवताओं के वास की हमारी मान्यता को दृढ़ करता
है। मैंने कुछ घरों मे बनी रंगोली को अपने मोबाइल मे कैद किया और रंगोली बनाने
बाली बच्चियों और महिलाओं की मुक्त कंठ से प्रशंसा की। कुछ घरों मे ज्योमिति से
शानदार रंगोली बनाई गयी थी तो कहीं रंगोली मे सिद्धहस्त महिलाओं ने फ्री हैंड से
चावल के आटे से अपनी कल्पना से तुरंत लाइन और वृत्त/अर्धवृत्त से सुंदर रंगोली
बनायी। कुछ घरों मे रंगोली के बीच रंग बिरंगे फूलों को केंद्र मे स्थापित कर
रंगोली की सुंदर मे चार चाँद लगा दिये थे। कुछ रंगोलियों मे बच्चे "हैप्पी
उगादि" लिखना न भूले!! रंग बिरंगी बेलों,
फूलों और पत्तियों के बेल बूटे देखते ही बनते थे। हर घर मे आम के पत्तों से बनाए बंदन वार से
सजाया गया था। बच्चों को गुड़ के पकवान के साथ नीम की पत्तियों को देने की प्रथा है
जो इस बात का प्रतीक था कि जीवन मे आने कड़ुवे मीठे क्षणों को सहजता से लेने और
जीने का संदेश हो।
एक ग्राम वासी श्री सुरेश तो मुझे अपने घर
ले गये और उगादि के अवसर पर बनाई जाने वाली मीठी रोटी जिसे हमारे यहाँ "पूरंपूरी"
कहा जाता है खिलाई। स्वादिष्ट कॉफी पिलाने के बाद अपने खेत से लाई लगभग एक-डेढ़ किलो बीन्स बिदाई स्वरूप दी। इस मेहमानबाजी की
एक खास सबसे बड़ी बात ये थी कि श्री सुरेश हिन्दी और
अँग्रेजी से पूरी तरह अनिभिज्ञ थे और मै सिवाय "उगादिया सुभाष्यागड़ु" के अलावा कन्नड मे ज़ीरो था।
लेकिन शायद प्राचीन काल मे चेहरे के हाव भाव,
आँखों से बोलने और हाथ के इशारे ही दो
अजनबी सभ्यताओं सांस्कृतियों और भाषा के व्यक्तियों के बीच कहने,
जानने समझने के माध्यम रहे होंगे। ये मेरे जीवन का एक अजीब रोमांचित अनुभव था जिसे
शब्दों मे ब्याँ करना कठिन है।
शाम के समय एक चल समारोह सारे गाँव मे
निकाला गया। गाँव के ही एक प्रबुद्ध निवासी श्री
श्रीनिवास जी से मुलाक़ात हुई। उन्होने बताया कि हमारे परिवार द्वारा हर
वर्ष उगादि पर हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए भगवान आंजनेय के मंदिर से एक रथ यात्रा
गाँव मे निकाली जाती है। इस परंपरा को दो सौ साल से भी ज्यादा का समय हो चुका है।
सात घोड़ो के रथ पर भगवान आंजनेय की प्रतिमा को फूलों के सजे सिंहासन पर विराजित
कर नगर भ्रमण के लिए ले जया जा रहा था। रथ
के आगे एक ट्रैक्टर मे कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के प्रवीण और पारंगत संगीतज्ञ नाद
स्वरम और मृदंगम बजा रहे थे। एक अलौकिक और दिव्य वातावरण मे मंगल ध्वनि के बीच भगवान
आंजनेय की रथ यात्रा जिस घर के सामने से निकलती घर की महिलाएं और पुरुष एक थाली मे
पुष्प, नारियल,
केले और अन्य वस्तुओं से भगवान को अर्पित कर भगवान की आराधना करते। रथ मे सवार
पुरोहित थाली मे उपस्थित फल, फूलों को भगवान
को अर्पित कर गरुढ़ घंटी से ध्वनि कर उनकी आरती उतार ईश्वर का प्रसाद आशीर्वाद के
रूप मे घर के स्वामी को वापस कर देता। कुछ दूर तक मै भी इस चल समारोह मे अपनी सहभागिता
कर इस प्राचीन रथ यात्रा की परंपरा का गवाह
बन अपने को धन्य भागी माना।
दक्षिण भारत के एक छोटे से गाँव ठिन्द्लु मे
उगादि पर्व पर शामिल होना मेरे लिये एक तीर्थ यात्रा से कम न थी। अपने सभी पाठकों को
पुनः एक बार उगादि की शुभकामनायें अर्थात "उगादिया सुभाष्यागड़ु"।
विजय सहगल






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