"नवरत्नों को
एक पत्र मेरा भी"
बचपन
मे बच्चों के परीक्षा के परिणाम के समय एक टिपिकल मानवीय मनोविज्ञान के दर्शन होते
थे। कुछ माता-पिता अपने बच्चे के परीक्षा परणाम से इस इसलिये परेशान नहीं रहते थे
कि उनका बच्चा फेल क्यों हो गया? उन्हे दुःख और क्लेश इस बात से रहता था कि
पड़ौसी का बच्चा पास क्यों हो गया!! उन्हे तब चैन पड़ता यदि पड़ौसी का बेटा भी फ़ेल हो
गया होता!! इसके लिए वे अनगिनत कुतर्क दे अपने बच्चे को पड़ौसी के बच्चे से श्रेष्ठ
बताने मे कोई कसर बाकी न छोड़ते थे। ठीक कुछ इसी तरह दिनांक 05 मार्च को देश के देश
के नौ विपक्षी दलों के प्रमुखों ने
प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी। उन्हे शिकायत थी कि विपक्षी दलों के नेताओं को
सीबीआई/ईडी परेशान कर गिरफ्तार कर रही है। उन्हे इस बात से ज्यादा शिकायत नहीं थी कि सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों मे उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित
उनकी पार्टी के अनेक मंत्रियों को
केंद्रीय जांच एजेन्सि की सहायता से जेलों मे डाला रही है, उनका उलाहना इस बात से ज्यादा था कि प्रधानमंत्री
अपने दलों के पूर्व कोंग्रेसी हेमंत
बिस्वा सरमा, पूर्व शिव सेना के नारायण राणे, पूर्व तृणमूल काँग्रेस के शुभेन्दु अधिकारी, मुकुल
रॉय जो अब भाजपा मे हैं पर कोई कार्यवाही नहीं कर रही है या कार्यवाही धीमी गति से
हो रही है?
आम
आदमी पार्टी जब से दिल्ली की सत्ता मे आयी
है, उनके मंत्री लगातार भ्रष्टाचार के आरोप मे गिरिफ़्तार हुए है जिसमे सत्येन्द्र जैन का नाम सर्वोपरि है और जो पिछले
जून 2022 से जेल मे बंद है और जेल मे पाँच सितारा गैर कानूनी सुविधाओं जैसे मालिश, भोजन आराम आदि के लिए कुख्यात रहे है इन अनधिकृत सुविधाओं के वीडियो से सभी वाकिफ है। इन सबके बावजूद दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल बड़ी
निर्लज्जता से जिनकी तारीफ मे कसीदे पढ़ते हुए नहीं थकते।
इन
नौ दलों के नेताओं ने एक स्वर मे दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की
एक स्वर मे प्रशंसा करते हुए उनकी गिरफ्तारी को निराधार, राजनैतिक
साज़िश और झूठा बताया। वे ये कहना नहीं भूले कि "मनीष सिसोदिया को दिल्ली की
स्कूली शिक्षा को बदलने के लिये विश्व
स्तर पर जाना जाता है"!! अरे किसान भी खेत मे बीज बोने के बाद फसल उगने का
इंतज़ार करता है और कालांतर मे ही फसल के बारे मे भविष्यवाणी करता है पर ये महारथी मनीष
सिसोदिया के शिक्षा मंत्रित्व काल का बमुश्किल 5-7 वर्ष के कार्यकाल को इस तरह परिभाषित
कर रहे है मानों दिल्ली के स्कूलों से निकले छात्र, स्कूली
शिक्षा के बाद अपने बल-बुद्धि और कौशल के बूते देश दुनियाँ के आर्थिक,
वैज्ञानिक, शैक्षिक और चिकित्सकीय क्षितिज पर एक
छत्र राज्य कर रहे हों? इन विपक्षी दलों ने भी मानो अपने
बच्चों, नाती-पोतों
को दिल्ली के इन सरकारी स्कूलों मे दाखिला करा दिया है? ऐसा लगता है मानो विदेशों सहित देश के केंद्रीय विध्यालय, सैनिक स्कूलों, नवोदय विध्यालय सहित स्थापित पब्लिक
स्कूलों के छात्र भी दिल्ली के इन सरकारी स्कूलों मे दाखिले के लिये लालायित हो
प्रवेश के लिये लाइन लगा कर खड़े हों?
हम
इन विपक्षी दलों की ये बात मान भी लें कि मनीष सिसोदिया ने दिल्ली के स्कूलों की
दशा और दिशा बदल दी है, तो क्या माननीय सिसोदिया को उनके इस सद्कार्यों से बेईमानी, भ्रष्टाचार
करने का वैधानिक लाइसेन्स प्राप्त हो गया? यदि मनीष सिसोदिया
ने शिक्षा के क्षेत्र मे एक बेहतरीन कार्य किया तो एक मंत्री के नाते उनकी ये
नैतिक ज़िम्मेदारी थी कि वे जनता के कल्याण के लिये अच्छे कार्य करते! लेकिन आबकारी
नीति मे घोटाला कर उन्होने जो पापार्जन कर धनार्जन किया, तब
कानून की भी ये नैतिक ज़िम्मेदारी है कि सिसोदिया के कुत्सित और भ्रष्ट कार्यों के
लिये उन्हे जेल भेंजे!! प्राथमिक न्यायालय से लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय का कदम
कदम पर दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब माननीय सिसोदिया को कहीं से कोई कानूनी राहत
नहीं मिली तब अंततः न्यायालय को उन्हे
भ्रष्टाचार के आरोप मे जेल भेजने के लिये बाध्य होना पड़ा। तब एक स्वतंत्र
न्यायतंत्र पर प्रश्न खड़ा करना कहाँ की समझदारी है? ऐसा
प्रतीत होता है कि आम आदमी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अनिल केजरीवाल
लगातार मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी पर देश की न्याय प्रणाली के विरुद्ध और मनीष
सिसोदिया के पक्ष मे तर्क-वितर्क और कुतर्क दे अनर्गल आरोप लगा कर या तो अपनी हद
दर्जे की मूढ़ता और अज्ञानता दिखा रहे है
या वे देश की जनता को मूर्ख समझ रहे है? अपने आप को योग्य, बुद्धिमान समझने मे कोई आपत्ति नहीं पर दूसरों को मूर्ख और अज्ञानी समझना
हद दर्जे की मूर्खता ही है!!
पश्चिमी
बंगाल की मुखमंत्री सुश्री ममता बैनर्जी के मंत्री पार्थ चैटर्जी और उनकी महिला
मित्र अर्पिता मुखर्जी को देश की जनता अभी भूली नहीं है जिनके घर से अगस्त 2022 मे 50 करोड़ रूपये से ज्यादा की भ्रष्टाचार से कमाई नगदी उनके घर
से बरामद हुई थी। पश्चिमी बंगाल मे पिछले विधान सभा चुनाव 2021 मे विपक्षी दलों के
विरुद्ध आगजनी, हिंसा, लूट, हत्या और बलात्कार
की घटनाओं को ममता जी बेशक भूल गई हों पर देश की जनता को आज भी वो सब अच्छी तरह से
याद है। किस मुंह से वे कह सकती है कि उनकी पार्टी के लोगो को झूठे आरोपों के आधार
पर सीबीआई/ईडी कार्यवाही कर रही है।
महाराष्ट्र सरकार मे एनसीपी पार्टी के कैबिनेट मंत्री नवाब मलिक की दाऊद इब्राहिम
जुड़े मामले मे ईडी द्वारा धन शोधन के मामले मे गिरफ्तारी,
इसी दल के गृह मंत्री अनिल देशमुख की भ्रष्टाचार पर गिरफ्तारी सर्विदित है। यदि ये
गिरफ्तारियाँ अकारण और गैर कानूनी होती तो कैसे न्यायालय इनको उचित ठहरा कर एक-एक
साल तक हिरासत मे रखने की अनुमति देता। शिव सेना के बड़बोले,
अशिष्ट और असभ्य नेता संजय राऊत को कौन
नहीं जनता? जिनको पात्रा चॉल जमीन घोटाले मे 1 अगस्त 2022
को हिरासत मे लिया गया था। यदि श्रीमान राऊत
निर्दोष थे तो कैसे देश का न्याय तंत्र एक निरपराधी को महीनों जेल मे रख सकता था? इस श्रंखला मे तेलंगाना के मुख्य मंत्री और भारतीय राष्ट्रीय समिति
प्रमुख चन्द्र शेखर राव की बेटी के॰ कविता से दिल्ली आबकारी घोटाले मे भी निकट
भविष्य मे पूंछ तांछ संभव है। एक साधारण नागरिक के सुप्रीम या हाई कोर्ट तो दूर प्राथमिक
न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त करना आसमान से तारे तोड़ने के बराबर हो, इसके विपरीत इन राजनैतिक रसूख और आर्थिक रूप से सुदृढ़ राष्ट्रीय स्तर के प्रभावशाली
व्यक्तियों जिनके लिये कदम कदम पर देश के सर्वोच्च न्यायालय से निर्देश प्राप्त करना
बाएँ हाथ का खेल हो कैसे केंद्रीय जांच एजेंसियां ऐसे व्यक्तियों को गिरफ्तार कर जेल
भेजने जैसे मनमानी पूर्ण कृत्य कैसे कर सकती है?
पत्र
पर हस्ताक्षरित बिहार श्रेष्ठ श्री
तेजस्वी यादव की सीबीआई द्वारा उनके पिता श्री के विरुद्ध कार्यवाही न किए
जाने की बातों को यदि मान लिया गया होता तो चारा घोटाले मे आज सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव को एक दो नहीं अनेकों केसों
मे न्यायालय से सजा न मिली होती? और वे आज भी तथाकथित राष्ट्र सेवा के विकास
रूपी हवन मे भ्रष्टाचार रूपी आहुतियाँ डाल
रहे होते!!, और
रेल्वे मे भर्ती के बदले जमीन
घोटाले मे अपने और अपने परिवार के नाम
जमीन लिखवाने की जांच को ही शुरू नहीं होने देते? जो परिवार
आकंठ भ्रष्टाचार के आरोपों मे घिरा है उसे सिर्फ इस बिना पर जांच से मुक्त कर दिया
जाय? क्योंकि लालू ने रेल मंत्रालय को लाभ मे पहुंचाया था और जिसकी चर्चा आईआईएम
अहमदाबाद मे की गयी थी। धारा 370 को हटाये जाने से तिलमिलाए
श्री फारुख अब्दुल्ला ने कश्मीर को विशेष दर्जे के रहते सारी ज़िंदगी अपने और अपने परिवार
की पांचों अंगुलियाँ को घी मे डुबा कर रक्खा।
समाजवादी पार्टी जिसने अपने पूरे कार्यकाल
मे सदा अपने परिवार और प्रदेश के माफिया, गुंडों और अराजक तत्वों को आश्रय दिया, आज सत्ता के दुर्पयोग का आरोप लगा रहे है?
अब तो ऐसा लगता है कि इन नेताओं द्वारा संसद मे एक
स्वर से ये कानून बना देना चाहिए कि राजनैतिक नेताओं द्वारा किए गये कदाचार,
भ्रष्टाचार और अनाचार के कानून सिर्फ देश की आम जनता के उपर लागू हों, देश के समस्त राजनैतिक नेताओं को इन क़ानून से छूट प्राप्त हो जाना चाहिए, क्योंकि संसद या विधान
सभा की सदस्यता के कारण ये अति महत्वपूर्ण व्यक्ति है। इन नौ राजनैतिक दलों के
युद्ध अभिलाषी महारथियों के पत्र से तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे राजनैतिक
दलों के ये नेता आसमान से अवतरित साक्षात ईश्वरीय अवतार है और इन्हे इनके राजनैतिक क्रिया कलापों के लिये विशेषाधिकार हांसिल है। जिसके एवज मे पारितोषिक के रूप मे भ्रष्टाचार, कदाचार, दुराचार करने की इन्हे स्वतः ही छूट प्राप्त
है? इन राजनैतिक मनीषियों का दर्जा क्या देश के कानून और संविधान से ऊपर है? क्यों इन्हे
सरकार मे रहते हुए किए गये कार्यकलापों के लिये आम जनता से परे क्या राष्ट्र भक्त और देश भक्त का दर्जा हांसिल
होना चाहिये? क्यों इन नेताओं के माता-पिता, भाई, भतीजों, बहिन भांजों, विशेषतः दामादों को देश के कानून
से ऊपर माना जाना चाहिये? क्यों इन्हे देश के आम नागरिकों
से परे भ्रष्टाचार और दुराचार की छूट
प्राप्त है? क्योंकि इन्होने देश के लिए बैसा ही कुछ योगदान किया है जैसे मनीष सीसोदिया ने दिल्ली मे
शिक्षा के लिए किया है? कानून और केंद्रीय/राज्य की जांच
एजेंसिया तो सिर्फ आम नागरिकों के लिए बनी है जो देश मे पैदा ही लुटने, पिटने, मिटने और घुट घुट कर मरने के लिए पैदा हुई है।
इन
राजनैतिक नौ रत्नों ने प्रधानमंत्री को संबोधित अपने पत्र के अंत की जो दो लाइने लिखी वो काबिले तारीफ है। वे लिखते है कि, "लोकतंत्र में लोगों की इच्छा
सर्वोच्च होती है। जनता ने जो जनादेश दिया है, उसका सम्मान करना चाहिए, भले ही वह उस पार्टी के पक्ष
में हो, जिसकी
विचारधारा आपकी विचारधारा के विपरीत हो"।
इन सभी आर्य श्रेष्ठों ने उनके मिले जनादेश का सम्मान करने का तो प्रधानमंत्री
को स्मरण कराया है लेकिन वे भूल गये कि केंद्र मे केंद्रीय सरकार को मिले जनादेश
का इन सिद्धहस्त मनीषियों ने कितना सम्मान
किया? जिस तरह कौरवों ने चक्रव्यूह रच कर अभिमन्यु का
संहार किया था क्या कुछ बैसे ही कदम कदम
पर रोढ़े अटकाने का काम इन नौ महारथियों ने
सीएए आंदोलन, दिल्ली के शाहीन बाग के आंदोलन, दिल्ली के गाजीपुर बार्डर का किसान आंदोलन, 26
जनवरी पर खालिस्तानी आंदोलन को हवा देकर सरकार को मिले जनादेश के संहार का पाप नहीं किया?
विजय सहगल




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