गुरुवार, 30 मार्च 2023

सोने के आलू/आलू का सोना


"सोने के आलू"/"आलू का सोना"!!







अब जबकि थिण्ड्लु गाँव (सरजपुर, बेंगलुरु) का प्रवास समाप्ति की ओर अग्रसर है लेकिन थिण्ड्लु गाँव की यादें सालों साल मस्तिष्क के मानस पटल से ओझल होने वाली नहीं है। एक आदर्श ग्राम की कल्पना पर थिण्ड्लु गाँव हर पैमाने पर खरा उतरा है!! अतः ये कहना अतिशयोक्ति ने होगी कि आदर्श गाँव की खोज, थिण्ड्लु ग्राम मे आकर समाप्त होती है। ग्रामवासियों की जिजीविषा मात्र आर्थिक संपन्नता और विलासिता पूर्ण जीवन जीने के लिए नहीं अपितु पारवारिक और सामाजिक जीवन मे मन की शांति और सुकून का समावेश भी अंतर्निहित है।

आज 27 मार्च 2023 को प्रातः भ्रमण के दौरान मैंने गाँव की पगडंडी से होते हुए जब खेत मे एकत्रित हुए कुछ ग्राम वासियों को देखा तब दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा मे उठा इन ग्रामीणों को "सुभाष्य गड़ू" (नमस्कार) कहा तो उनके चेहरे पर खिली मुस्कान ने मेरे मन को भी आनंदित कर दिया। ये सभी खेतिहर मजदूर थे जो किसान श्री श्री निवास के खेत से आलू निकालने के लिए आए थे। बैसे एक परिपक्व राजनेता  की आलू से सोना बनाने की विधि से देश का हर व्यक्ति वाकिफ है। लेकिन वास्तव मे एक किसान के खेत मे जब भरपूर फसल हो फिर चाहे फसल गेहूँ की हो, चना या फिर भले ही आलू की ही क्यों ने हो, किसान के लिए सोना ही होती है।  तभी तो 1967 की "उपकार" फिल्म मे श्री महेंद्र कपूर द्वार गाये, कालजयी गीत "मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती" की शब्द रचना  स्व॰ श्री इंदीवर द्वारा की गयी थी।

एक हल धर किसान अपने हल से आलू की दो नालियों के बीच हल से खेत की गहरी जुताई कर रहा था ताकि मेढ के नीचे से  आलू रूपी सोना, जमीन के नीचे से बाहर निकाल सके। हल से चार पाँच नालियों की जुताई हो चुकी थी। अब बारी थी निकले हुए आलू को बोरियों मे इकट्ठा  कर एक स्थान पर एकत्रित करने की। इस हेतु लगभग 20 खेतिहर दिहाड़ी मजदूर खेत के एक सिरे पर बैठ  आलू की खुदाई करने हेतु तत्पर थे। मुझे देखते ही कुछ मजदूरों ने फोटो-फोटो कह कन्नड़ भाषा मे कुछ कहा। सिवाय फोटो के मुझे कुछ समझ न आया पर उनके आशय को समझते देर न लगी। इन मजदूरों की फोटो लेना देख, हल चला रहा कामगार भी अपनी  फोटो लेने हेतु कन्नड भाषा मे चिल्लाया। तब उसकी फोटो लेना तो लाज़मी बनता था।  इस हेतु उसने सिर पर अंगौंच्छे को बांध कर किसी फिल्मी अभिनेता की तरह अभिनय की मुद्रा मे खड़ा हो गया। 

कुछ तस्वीरों के बाद हमरी मुलाक़ात कृषि भूमि के मालिक श्री निवास जी से हुई जो एक पढे लिखे अनुभवी किसान थे। उन्होने बताया कि  प्रत्येक कामगार को 400/- रुपए की मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। उन्होने बताया कि बैलों से जुताई कर रहे हल को आमने-सामने की दिशा मे चलाने के बाद, आड़े (बाएँ से दायें तरफ)  मे भी हल को चलाया जायेगा ताकि आलू की खुदाई को  पूरी तरह से किया जा सके। आलू खुदाई की  पूर्व तैयारी मे श्री निवास जी के तेज कदम इस बात के संकेत थे कि इन खेतिहर श्रमिकों द्वारा खेत से निकाले गये आलू को यथा स्थान रखने की तैयारी मे कंही कोई कमी न रह जाए। इस हेतु उन्होने खेत के बाहर लगभग 7-8 X 20-22 फुट का एक समतल स्थल बनाया हुआ था जिसके चारों ओर मेढ बनाकर रोका गया था ताकि आलू मैदान मे चारों ओर न बिखर जाए। इतनी व्यस्तता के चलते भी मैंने उनसे  एक फोटो देने का आग्रह किया, जिसमे वे उस समतल चबूतरे के एक सिरे पर खड़े 20-30 किलो के आलू के ढेर के पास खड़े थे। मैंने उनसे जब खेतों से निकले इन आलुओं को समतल चबूतरे पर न डाल सीधे बोरियों मे भरने के औचित्य पर सवाल किया? तो उन्होने बताया एक-दो दिन आलू को यहीं समतल चबूतरे पर खुला छोड़ने के बाद ही इसे मंडी मे बिक्रय हेतु भेजा जायेगा। श्री श्री निवास की आलू की फसल को 1-2 दिन इस तरह खुले मे रखने की बात का क्या औचित्य था मुझे समझ न आया? कोई कृषि वैज्ञानिक या कृषि स्नातक इस विषय मे शायद  कुछ प्रकाश डाल सकें तो स्वागत है? क्योंकि तीसरे दिन मैंने स्वयं उनके खेत मे उस समतल चबूतरे पर पड़े आलू के पहाड़ की फोटो ले इसकी पुष्टि भी की।  

श्री निवास ने बातचीत मे बताया कि हौसूर (तमिलनाडू) की मंडी मे 50 किग्रा॰ की बोरी के उसे 600/- रुपए मिलेंगे अर्थात 1200/- रुपए कुंटल के हिसाब से आलू की फसल की कीमत उसे प्राप्त होगी। फिलहाल बाज़ार मे इस तरह के उच्च गुणवत्ता वाले  आलू का खुदरा मूल्य 20 रुपए प्रति किलो है। बात चीत के दौरान मुझे इस बात के बारे मे जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि वह आलू के बीज को पंजाब के जालंधर से मंगाते हैं।    

यदि अन्य शहरों मे आवास के लिए जीवन की आपा-धापी, भागम-भाग और गला-काट प्रतियोगिता की शर्त पर कुछ आर्थिक तरक्की मिले भी तो इस ग्रामीण जीवन मे प्रदूषण रहित जीवन के साथ आवश्यक अनुकूल जलवायु, खुशनुमा मौसम और संतुष्ट ग्राम वासियों के पुरुषार्थ देखने का, ये थिण्ड्लु गाँव, एक आदर्श उदाहरण हो सकता है। थिण्ड्लु गाँव से मै विजय सहगल किसी नई कहानी के साथ  फिर मिलेंगे। "सुभाष्य गड़ू" (ಶುಭಾಶಯಗಳು)

विजय सहगल       

 


कोई टिप्पणी नहीं: