"दारू
पिया तो मरा"?
महात्मा गांधी के नशाबंदी अभियान को बिहार मे
"अक्षरशः" "पूरी जी जान"
से लागू करने वाले सुशासन बाबू श्री नितीश कुमार ने बीड़ा तो उठाया पर साथ ही साथ वे
महात्मा गांधी का एक बड़ा ही प्रिसिद्ध
सद्वाक्य है, "अपराध से घृणा
करो, अपराधी से नहीं" को विस्मृत कर गये। महात्मा
गांधी के विचारों के निष्ठावान समर्थक श्री नितीश कुमार शायद पिछले दिनों उनके
राज्य मे नशाबंदी के बावजूद जहरीली शराब पीने से मारे गये 100 से ज्यादा लोगो की मौत पर इतने निष्ठुर हो गये कि उन्होने
अपने वक्तव्य मे घटना मे मारे गये लोगो को कोसते हुए बिहार विधान सभा मे 16
दिसम्बर 2022 मे कहा-:
"अं बिहार मे",
"अरे तब तो बिहार मे हर जगह कहें के देखो",
"मरा", "दारू पिया तो मरा,
मत पियो!, मरोगे! इसका तो और
ज्यादा हम प्रचार करेंगे!! दारू पी के मर गये था तो उसको हम लोग "compensation" (मुआवजा) देंगे?
सवाल ही नहीं पैदा होता!! कभी मत सोचिये!"
कोई जन कल्याण कारी राज्य का मुख्य मंत्री
राज्य के 100 से ज्यादा नागरिकों की
असामयिक दर्दनाक मौत पर इस तरह का संवेदनहीन,
शर्मनाक, और लज्जास्पद वक्तव्य
कैसे दे सकता है? वेशक शराबबंदी,
नशाबंदी के कानून की अवेहलना के चलते,
जहरीली शराब पीने से मारे गये ये निरीह नागरिक जो समाज के निचले,
निर्धन, अशिक्षित वर्ग से
संबन्धित थे, बेशक इन्होने राज्य का
कानून तोड़ा? मुख्यमंत्री महोदय
कानून का पालन तो आप भी ठीक से नहीं करवा पायें?
अन्यथा ये कैसे संभव है कि 100 से ज्यादा मृतक सिर्फ दारू पीने वाले ही दोषी थे?
क्या आपकी सरकार की कानून लागू करवाने वाली एजेंसी,
पुलिस महकमा, आबकारी विभाग दोषी नहीं
है? जिनकी ज़िम्मेदारी थी कि वह शराब बंदी,
नशाबंदी समुचित ढंग से लागू करवाकर जहरीले शराब व्यापार पर लगाम लगते? क्या पैसा कमाने की आड़ मे,
भ्रष्टाचार से परिपूर्ण इस जहरीले शराब के
व्यापार मे आपके ही प्रशासन के लोग तो लिप्त नहीं है?
जिनके कारण इतना बड़ा नर संहार हो गया और आप एवं आपकी एजेंसिया इस काम को नज़रअंदाज़
कर हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं? इतिहास इस बात का
गवाह रहा है कि देश मे जब जब प्रतिबंध के कानून बनाए गये तब तब शासन और सरकारों के
कर्मचारियों ने भ्रष्टाचार कर इन नियम और क़ानूनों को लागू करने मे पलीता लगाया है!!
रिश्वत और भ्रष्टाचार ने इन कानून की सरे आम धज्जियां उड़ाई है! गुजरात और बिहार मे
लागू नशाबंदी वाले राज्यों मे आज भी धनवान
और साधन सम्पन्न श्रेष्ठी!! वर्ग को शराब का हर वो ब्रांड उपलब्ध है जो वो इक्छा करते
है!! लेकिन इन्ही राज्यों मे निर्धन और निचले वर्ग के लोगों को इसी नशाबंदी की आड़ मे
धन और जान से हाथ धोना पड़ता है, अन्यथा क्या कारण
है कि शराब का सेवन करने वाले समृद्ध शाली वर्ग का एक भी व्यक्ति आज तक इस कानून की
जद मे नहीं आया? और न ही कभी उसकी जहरीली
शराब से मृत्यु हुई? यदि शराब बंदी न होती तो कम से कम शुद्ध शराब तो
मिलती? ये बदनसीब लोग अवैध जहरीली शराब पी कर बेशक
बर्बाद हो जाते पर कम से कम जिंदा तो रहते!! मारे तो न जाते?
इन्हे मिलावटी शराब तो न पीनी पड़ती?
आपने जिस अमानवीय ढंग से इन 100 से ज्यादा लोगो की मौत से ये कह कर पल्ला झाड़ लिए कि
"दारू पिया तो मरा"!! मत पियो! मरोगे!!
महोदय ये सभी निर्धन और दबे,
कुचले वर्ग के लोग दारू से नहीं मरे बल्कि
इन्हे जहर देकर मारा गया है और जिसके लिए आपकी सरकार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से
जिम्मेदार है!! समाज के इन निम्न,
असहाय और निर्धन मृतकों के साथ इतना
तिरिस्कार पूर्ण अशोभनीय व्यवहार बिहार के "सुशासन बाबू" को शोभा नहीं देता?
एक जन कल्याण कारी सरकार के मुखिया के नाते
पान मसाला, गुटका,
तंबाकू, शराब खाने/पीने वाले
लोगो को उन्हे उनके रहमोकरम पर यूं नहीं छोड़ सकते। वे भी इस समाज के अंग है। इन्हे
भी सही राह पर लाने के लिए कठोरता के साथ साथ संवेदना शिक्षा की आवश्यकता है
अन्यथा जेलों मे सजा काट रहे कैदियों को सदा के लिए अपराधी मान उनमे शिक्षा के माध्यम से सुधारात्मक कार्यकलापों को
क्यो चलाया जाता? उन्हे उनके हाल पर यो ही छोड़ा नहीं जा सकता?
हमारे नीति नियंताओं ने एक लोकतान्त्रिक गणराज्य मे लोक हितकारी राज्य की संकल्पना
यूं ही नहीं की थी? आपकी सरकार के नौकरशाहों
ने यदि ईमानदारी और कर्तव्य परायणता दिखाई होती तो कदाचित इन 100 से ज्यादा लोगो को
व्यर्थ ही प्राण न गँवाने पड़ते? इसलिये जिन लोगो ने नशाबंदी कानून की अवेहलना
की वे तो परलोक गमन कर गये पर उनके आश्रितों का क्या अपराध था?
जो अपने संरक्षकों के न रहने से दाने-दाने को मुंहताज़ हो कर सड़क पर आ गये!! इस
जहरीली शराब कांड की जांच कर इस संबंध मे समुचित
और कठोर कार्यवाही कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करें साथ ही साथ पीढ़ित
परिवारों समुचित आर्थिक राहत दे, एक सदाशय और
उदारमना राज्य की कल्पना को साकार करें! और महात्मा गांधी के उस कथन को चरितार्थ करें
कि "अपराध से घृणा करो, अपराधी से नहीं"!!
विजय सहगल




1 टिप्पणी:
Yes, this is happening not only in Bihar in other states also such cases were reported in the past. Spurious liquor took the lives of many leaving their poor families in despair. For the time being Govts are supporting their families financially with a lack or two. Beyond that none can extend any support. Particularly, during festival season and during marriages these spurious liquors are made available to the people. Social workers should try to educate the illiterates and make them aware of the risks.
By GVVT Sharma on WhatsApp
एक टिप्पणी भेजें