"साहिबजादों
का बलिदान"
अचानक दूर से आ रही घोड़ो के टापऊँ की आवाज जब पंजाब प्रांत के सरहिंद कस्बे मे मोरिंडा गाँव के नजदीक ही गंगू नामक व्यक्ति के छोटे से घर के सामने आ कर रुकी तो 6 साल के साहिबजादे फतेह सिंह और उनके बड़े भाई 8 वर्षीय जोरावर के चेहरे पर एक पल खुशी के भाव नज़र आये कि शायद उनके पिता महाराज गुरु गोविंद सिंह जी तक उनका संदेश पहुँच चुका है और वे अपने दो अग्रज भ्राताओं के साथ उन्हे लेने आये है। पर माता गुज़री को कुछ अनिष्ट की आशंका ने घेर लिया और अचानक नंगी तलवार लिए कुछ सैनिकों ने झोपड़ी के दरवाजे को क्रूरता पूर्वक धकेल कर खोला। माता को समझते देर न लगी जिस गंगू रसोइया को महाराज ने ताउम्र अपने महल मे एक अहम भूमिका दे रसोई की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी थी वही आज चाँदी के चंद टुकड़ो की लालच मे उनके परिवार के साथ विश्वासघात करेगा। अनिष्ठ की आशंका सच साबित हुई रसोइये गंगू ने सरहिंद के सूबेदार वज़ीर खाँ से गुरु माता गुज़री और दोनों साहिबजादों को मुखबरी कर पकड़वा दिया।
दोनों साहिबजादों को परिवार से मिले
संस्कारों, स्वाभिमान और
परिस्थितियों से मिले अनुभव ने उन्हे अपनी उम्र से कहीं अधिक परिपक्व बना दिया था।
उन्होने बिना एक पल गवाए ख़जर की मूठ पर हाथ रख आक्रामक मुद्रा अख़्तियार कर ली थी। माता
गुजरी सहित दोनों साहिबजादे जो गंगू से अपार स्नेह रखते थे, चंद पैसों की लालच मे उनसे ऐसा कुठराघात करेगा ऐसी उम्मीद कदापि
न थी। उन्हे सरहिंद के सूवेदार वज़ीर खान के आदेश से किले की ठंडी बुर्ज पर कैद कर लिया
गया। माता गुजरी अपने पुत्र गुरु गोविंद सिंह सहित अपने अन्य दो पौत्रों की अजीत सिंह और जुझार
सिंह के लिये तो चिंतित थी ही इस विश्वासघात से वे क्षणिक विचलित जरूर हुई पर उनके
और दोनों साहिबजादों के हौंसलों मे कोई कमी न थी।
सूबेदार नवाब वज़ीर खान ने जब अपने सिपहसालार
के माध्यम से माता गुज़री के समक्ष दोनों साहिबजादों को इस्लाम स्वीकारने या मृत्यु
को वरण करने के प्रस्ताव को अस्वीकारने की बात सुनी तो आग बबूला हो गया। सन् 1705 के
पूस माह की उस सर्दीली काली रात मे माता गुजरी और दोनों अबोध साहिबजादों को
किले की बुर्ज रात मे रखा गया तो मानवता शर्मसार थी! सरहिंद किले की बुर्ज पर उस
गलन और ठिठुरन भरी, सर्द रात मे
माता गुजरी देवी अपने दोनों पौत्रों को अपनी छाती से चिपकाए, अपने कलेजे के टुकड़ों को ठंड से बचाने का प्रयास कर रहीं थी और
दोनों पौत्र साहिबजादे फतेह सिंह और जोरावर सिंह इस प्रयास मे थे कि उनकी दादी माँ
को ठंड न लगे इस कारण माता को अपने हाथों के घेरे मे जकड़ रखा था!! दादी माँ और पोतों का एक दूसरे के
प्रति अपनत्व, सम्मान और
समर्पण का एक अनूठा उदाहरण था। पूस की उस सर्दीली रात मे वे सभी ठंड से ग्रसित थे
फिर भी एक दूसरे को बचाने के प्रयास कर रहे थे और क्रूर आततायी मुगल नवाब का पत्थर
दिल मनुष्यता को तार तार कर पशुता की पराकाष्ठा का प्रदर्शन कर रहा था।
जब वज़ीर खाँ की जुल्म ज्यादती भी माता गुजरी
और उनके दोनों पुत्रों के मनोबल न तोड़ सकी तो लगातार जुल्मों सितम के बीच 13वे दिन
वज़ीर खान ने पुनः एक बार जब भरी कचहरी मे दोनों साहिबजादों को कहा, "बोलो! इस्लाम कबूल करते हो"? छह वर्षीय छोटे साहिबजादे
फतेह सिंह ने निर्भीक होकर नवाब से पूंछा?.... अगर, मुसलमाँ हो गए
तो क्या फिर कभी नहीं मरेंगे? वज़ीर खान इस
छोटे बालक के दिलेर हौसले पूर्ण सवाल से अवाक था!! नवाब की कचहरी मे सन्नाटा छा
गया!! कुछ चापलूस सैनिक अपनी वफादारी के
प्रदर्शन मे कृपाण से तलवार निकाल नवाब के आदेश की प्रतीक्षा मे आगे बढ़े!! परंतु
अधिसंख्य सैनिक और ओहदेदार इन वीर बालकों की दिलेरी और बहदुरी पर हक्का-बक्का थे!
कचहरी मे पसरे सन्नाटे के बीच जब वज़ीर खाँ
के मुंह से कोई शब्द न फूटा, तो फिर एक बार बालक फतेह सिंह ने अपने अग्रज
जोरावर सिंह की ओर देखते हुए कहा, जब मुसलमाँ हो
कर भी मरना ही है तो क्यों न अपने धर्म की रक्षा करते हुए मरें!! ईर्ष्या और
नैराश्य से ग्रसित उस निर्दयी नवाब ने दोनों बालकों को जिंदा दीवार मे चिनवा देने
का अमानवीय आदेश दिया!! कचहरी मे उपस्थ्ति सेना नायक और सैनिक जो गुरु गोविंद सिंह
जी से बैर रखते थे वे भी नवाब के दोनों बालको को जिंदा दीवार मे चिनवा देने के आदेश
से मन ही मन असहमत थे।
एक वहशी और बर्बर सूबेदार के आदेश के पालन
के लिये राज मिस्त्री मजबूर थे। दोनों साहिबजादों
को जब खुले और बड़े अहाते मे सजा देने के लिये लाया जा रहा था प्रवेश द्वार
को बहुत ही छोटा बनाया गया था ताकि ओज़ और स्वाभिमान से परिपूर्ण साहिबजादें वज़ीर
खाँ की अदालत मे झुक कर प्रवेश करें!! किन्तु बलिदान के लिये अपने प्राणों की
आहुति देने को तत्पर साहिबजादों ने पहले
पैरों को प्रवेश द्वार मे वढा अपना सिर
विपरीत दिशा मे कर कचहरी मे प्रवेश किया और इस तरह एक बार फिर,
वजीरखान का साहिबजादों को नीचा दिखाने के मंसूवे
पर पानी फेर दिया।
जब सन् 1705 की दिसम्बर माह की 26 तारीख को दोनों साहिबजादों को जिंदा खड़ा कर दीवार मे चिनवाया जा रहा था तो दोनों
निर्भीक और निडर बालको के मुख पर स्वाभिमान का ओज़, तेज और अलौकिक प्रकाश चमक रहा था जो अपने धर्म और मानवता की रक्षार्थ
अपने प्राणों की आहुति सहर्ष देने को तत्पर थे। जब दीवार की चिनाई छोटे साहिबजादे फतेह
सिंह की गर्दन तक पहुँच गयी तो अचानक बड़े भाई जोरावर सिंह की आँखों मे आये आंसुओं को
देख फतेह सिंह ने कहा, "जोरावर, तूँ रोता क्यों है?
क्या मृत्यु से डर गया? जोरावर ने कहा, "नहीं!! भाई,
रो इसलिये रहा हूँ कि "दुनियाँ मे आया मै पहले था पर कौम की खातिर शहीद तूँ पहले
हो रहा है!!" तूँ है तो छोटा पर तेरी सहादत बहुत बड़ी है!! इतना कहते कहते दोनों
भाई वेहोश हो गए और पीछे रह गयी उन दोनों साहिबजादों का बलिदान जो उन्होने सनातन धर्म और देश की रक्षार्थ
अपने प्राणों की आहुति दे कर किया। अपने अबोध और प्राणों से प्रिय पौत्रों के निधन
का समाचार माता गुजरी ने सुना तो इस गम मे उनका भी देहावसान 27 दिसम्बर 1705 मे हो
गया।
यही नहीं सन् 1705 के ( पूस माह की छट से लेकर
त्रियोदशी ) दिसम्बर 21 से 27 अर्थात 7 दिन मे मुगल शासक औरंगजेब के क्रूर शासन के विरुद्ध गुरु
गोविंद सिंह के पूरे परिवार ने अपना आत्म बलिदान कर दिया। अन्याय अधर्म के विरुद्ध
लड़ते हुए "धर्मो रक्षति रक्षितः" के सूत्र को प्रतिपादित करने वाले ऐसे सरवंसदानी गुरुगोविंद सिंह जी, उनकी परमादरणीय माता गुजरी और चारों साहिबजादो श्री अजीत सिंह, श्री जुझार सिंह,
श्री जोरावर सिंह, श्री फतेह सिंह जी
को हमारे श्रद्धा सुमन, सादर नमन।
विजय सहगल



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