"चितकुल-किन्नौर,
हिमाचल प्रदेश"
04 जून 2022 को मुझे पूर्वी हिमाचल प्रदेश मे तिब्बत सीमा पर स्थित किन्नौर जिले मे समुद्र तल से 11320 की ऊंचाई पर
स्थित "चितकुल (छितकुल)"
जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रातः लगभग 6.30 बजे अपनी यात्रा की शुरुआत
रिकाङ्ग्पिओ से 55 किमी दूर चितकुल के लिए की।
कर्छम डैम तक की 16 किमी सड़क द्वि
मार्गी तथा पक्की थी। कर्छम से चितकुल के इस 39 किमी लंबे मार्ग के एक तरफ पहाड़ और
दूसरी तरफ गहरी खाई को खतरनाक मार्ग के रूप मे परिभाषित कर रही थी पर इस मार्ग पर
वाहनों का बहुत ज्यादा आवागमन नहीं था। कर्छम से 39 किमी॰ की यह सड़क यध्यपि सकरी, एक मार्गी
थी पर आमने सामने या ओवरटेकिंग को वाहन चालक आपसी सामंजस्य और सहयोग से सरलता से
निकाल रहे थे।
भारत-तिब्बत सीमा से लगे इस छोटे से सीमांत
गाँव मे जाना मेरे लिये किसी तीर्थ
यात्रा पर जाने से कम न था। तिब्बत का नाम
सुनते ही महामहिम दलाई लामा की सौम्य शांत और अपूर्व आभा मण्डल लिये एक सौम्य छवि
का स्मरण होना स्वाभाविक था। मेरा विश्वास है कि
वो दिन दूर नहीं लगता जब चीन के
चुंगुल से मुक्त तिब्बत के प्रवास हेतु,
इसी चितकुल मार्ग का अनुसरण कर हम तिब्बत
पहुंचेंगे क्योंकि मै तिब्बत की स्वायतत्ता और स्वतन्त्रता का दृढ़ और निष्ठावान पक्षधर
हूँ। यध्यपि ये गाँव छोटा और पिछड़ा जरूर
था पर यहाँ तक पहुँचने का मार्ग कुछ जगहों को छोड़ कर एक मार्गी और पक्का था। मार्ग
सर्पीला घुमावदार और अंधा मोढ़ लिए हुआ था इसलिये लगातार हॉर्न बजाने के संकेत
द्वारा आमने सामने के वाहनों को अगाह करना आवश्यक था। रास्ते मे एक दो जगह भेड़ों
के झुंड ने मै..मै..मै...
की आवाज से वातावरण को गुणजयमान कर दिया था जिनको
है..है..हुस..हुस..कर जैसे तैसे गड़रियों ने रास्ते से हटाया। पर्यावरण की दृष्टि से प्रदूषण से पूर्णतः मुक्त
स्थान की कल्पना राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के वासी को किसी स्वर्ग लोक से कम प्रतीत नहीं महसूस हो रही
थी। पक्की डामर सड़क के एक तरफ ऊंचे-ऊंचे
पर देखने मे सुंदर पहाड़ थे जो सड़क को लगातार अपनी विशेष कलात्मक शैल आश्रय प्रदान
कर रहे थे वही सड़क के दूसरी ओर हजारों फुट गहरी खाइयों से
पर्यटकों की यात्रा को संरक्षित और सुरक्षित सम्पन्न करने
हेतु छोटे छोटे पुलियाँयेँ और कहीं कहीं लोहे की मजबूत रेलिंग श्रीमद्भगवत गीता मे
भगवान श्री कृष्ण के उस संदेश का स्मरण करा रही थी जो जीवन रूपी यात्रा का "योग क्षेम" रखने हेतु अपने दृढ़ संकल्प को दोहराते है : -
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये
जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।9.22।। अर्थात "जो अनन्य प्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर
चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य निरंतर मेरा चिंतन करने
वाले भक्तों का "योग क्षेम" (भगवतस्वरूप की प्राप्ति का नाम योग है और
भग्वत्प्राप्ति के निमित्त किये हुए साधन की रक्षा का नाम क्षेम है) मै स्वयं प्राप्त कर देता हूँ।" नोट- "योगक्षेमं वहाम्यहम्"
भारतीय जीवन बीमा का ध्येय वाक्य है।
"चितकुल मे आपका स्वागत है" का
सूचना पट देख कर मन आनंदित हो उठा। इस अवसर पर सूचना बोर्ड के साथ एक फोटो लेना तो
बनता ही था। दूरभाष और इंटरनेट से संपर्क मे कमी के चलते ठहरने की कोई पूर्व आरक्षित
व्यवस्था नहीं थी। लेकिन वही पर कुछ सीमित संख्या मे होम स्टे एवं होटल सहजता से
उपलब्ध हो गए। बार्डर पर स्थिति होने इस गाँव का एक महत्वपूर्ण स्थान तो था पर
सीमांत ग्राम पंचायत के सुदृढीकरण के बावजूद विकास का आभाव इस पूरे ग्राम मे नज़र आ
रहा था। चाय, नाश्ते और खाने का एक
ही सामान्य रेस्टुरेंट था जहां शाम के खाने हेतु पूर्व ऑर्डर देना अनिवार्य था। दो
जनरल स्टोर की दुकानों पर ही कपड़े,
स्टेशनरी, राशन,
सब्जी एवं सभी आवश्यक उपयोग की सभी वस्तुएँ उपलब्ध थी। दिन मे 11-12 बजे के
करीब चितकुल पहुँचने पर गीतांजलि होटल मे
रुकने की व्यवस्था हो गयी।
सर्वप्रथम सीमा पर जाने के उपक्रम के तहत
देश के वीर जवानों को नमन करने के ध्येय से आगे बढ़े। मुख्य गाँव से 2-3 किमी सीमा
की ओर पहुंचे ही थे कि एक बोर्ड पर लिखे निर्देश "बिना अनुमति प्रवेश
निषेध" की चेतावनी के कारण परिवार ने आगे न जाने का निश्चय किया पर इसी बीच
एक अन्य कार का प्रथम चौकी तक गुजरने के कारण हमने भी कार को उसी दिशा मे आगे बढ़ा
दिया। सीमा सुरक्षा बल की चौकी पर वहाँ स्थित वहादुर जवान श्री यादव से मुलाक़ात
हुई। वीर जवानों की प्रशंसा करते हुए उन्हे अभिवादन और अभिनंदन की औपचारिकता के
बाद उनके हाल चाल जाने। इस चौकी से सीमावर्ती चौकी लगभग एक सौ किमी॰ से अधिक थी।
आधार कैंप से ही सीमावर्ती चौकियों पर सैनिकों और उनके लिए रसद पानी की आवाजाही
सुनिश्चित की जा रही थी। रक्षा मंत्रालय द्वारा उपलब्ध सुविधाओं से हमारे वीर सैनिक
संतुष्ट और खुश नज़र आए। दोपहर की धूप मे जहां उपर हिमाच्छादित किन्नर कैलाश पर्वत
था वही दूसरी ओर दूर से दृष्टिगोचर होती बसपा नदी का प्रकृतिक सौंदर्य देखते ही
बनता था।
चितकुल के पूर्वोत्तर दिशा मे सूर्य की
चमचमाती किरणों से वर्फ से आच्छादित किन्नर कैलाश की पर्वत चोटियाँ ऐसे चमकती है
मानों प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ पेंट से इन पर्वत मालाओं को कलात्मक ढंग से रंग दिया
हो। हिमालय पर्वत की पर्वत मालाओं की इतनी चमकदार,
प्रकाशमान धवल, उज्ज्वल और शानदार
इंद्रियग्राह्य दृश्य शायद ही मैंने अपनी ज़िंदगी मे कभी कहीं देखा हो!! एक ओर "किन्नर
कैलाश-राज" के दमकते शिखर दूसरी ओर पर्वत मालाओं के बीच बसपा नदी की धाराओं
ने विशाल नदी का रूप धारण कर हरे हरे देवदारु के वृक्षों के बीच कल-कल बहती नदी को
देखना सुकून और किनारे बनी चट्टानों पर कुछ पल बैठना शांति और सुकून प्रदान करने वाला था। बाइकर द्वारा नदी के किनारे
अपनी बुलट मोटरसाइकल के साथ टेंट लगाने की तैयारी मे लगे थे। इन बाइकरों की चुनौती
पूर्ण यात्रा और उसके रोमांच को सहज ही महसूस किया जा सकता था।
दूसरे पहर मे चितकुल गाँव के भ्रमण का
कार्यक्रम था। ऊंचाई पर बने परंपरागत रूप
से बसे, अति प्राचीन लकड़ी के
आवासों को देखना कौतूहल और आश्चर्य मिश्रित भावनाओं से ओत-प्रोत कर देने वाला था।
विभिन्न वास्तु और नक्शों के आवासों की बनावट पहाड़ी गाँव की वास्तु शैली पर आधारित
थी। घरों के आसपास सर्दी और बरसात मे भोजन को सुरक्षित रखने के भंडार गृह बने थे।
दो मंज़िले मकान के निचली मंजिल मे पशुओं के आवास एवं ऊपर घर के लोगो के रहने की
व्यवस्था बनाई गई थी। घर के चारों ओर चहर दीवारी को लकड़ियों से बनाया गया जो एक ओर
जंगली पशुओं से रक्षा करती है वही सर्दियों मे इन्हे ईधन के रूप मे जलाने का कार्य भी किया जाता है। गाँव मे ही
पार्वती और यमुना नाम की दो वृद्ध महिला सहेलियों से राम राम हुई जो धूप मे बैठ बतियाती नजर आई। उनमे से एक ने
दिल्ली और मथुरा का भ्रमण भी किया था। उन्होने मेरे साथ चल रहे बेटे की शादी मे
आने के अपनी इच्छा भी प्रकट की!! पहाड़ों
से प्रवाहित पानी की उपलब्धता पूरे गाँव मे 24 घंटे सहजता से उपलब्ध थी। गाँव के
मध्य मे सराहन शैली पर बने देवी माता छितकुल के नव निर्मित मंदिर के दर्शन का
सौभाग्य मिला जिसका निर्माण आसाढ़ मास की गुरु पूर्णिमा की वि॰ स॰ 2068 तदानुसार 11 जुलाई 2011 को हुआ था।
लकड़ी से बने मंदिर मे काष्ठ कला का अद्भुद नमूना प्रदर्शित किया गया था। विशाल
आँगन के एक ओर मंदिर वही दूसरी ओर हवन शाला बनाई गयी थी। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह देवी मंदिर सर्दी मे
अक्टूबर से छह माह के लिए बंद रहता है तब
प्रायः होटल और होम स्टे आदि अति वर्फबारी
के कारण बंद हो जाते है।
कलकत्ता से आकार होम स्टे और होटल चलाने की
जान आश्चर्य हुआ, यदि ग्राम पंचायत गाँव
के लोगो को कुछ शिक्षण प्रशिक्षण पश्चात होटल और होम स्टे सहित पर्यटन से जोड़े तो
गाँव के लोक नृत्य और लोकसंगीत के संरक्षण के साथ गाँव के परंपरागत भोजन,
रेस्टुरेंट आदि से गाँव के लोगो को जोड़ कर लोगो को रोजगार भी
उपलब्ध करा सकते। इस तरह देश के एक और सीमांत गाँव छितकुल की यात्रा अविस्मरणीय और
यादगार थी।
विजय सहगल









1 टिप्पणी:
भारत में जब इतनी खूबसूरत प्लेसिस हैं घूमने के लिए तो विदेश जाकर घूमने की क्या जरूरत है
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