"अंतर्राष्ट्रीय
फिल्म महोत्सव पर- नादव
लापिड का निंदनीय वक्तव्य"
पिछले दिनों 29 नवम्बर 2022 को (इफ़्फ़ी) भारत
का अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव/समारोह 2022 मे इज़राइली फिल्म मेकर नादव लापिड ने
कशिमिरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म "कश्मीर फाइल्स" को अशिष्ट,
अभद्र और सस्ती लोकप्रियता की फिल्म क्या बताया भारत मे टुकड़े-टुकड़े वामपंथी गेंग
को तो मानों "बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने" से प्राप्त खुशी मिल गयी। आप पार्टी से दुत्कारे गये असफल
पत्रकार "आशुतोष" और
"नन्दिता दास" जैसी वामपंथी विचारकों ने तो खुशी का इज़हार ये ट्वीट कर
किया कि "अरे ये क्या हो गया?
अब तो मान लो!"। ये देश का दुर्भाग्य है कि सदियों से अँग्रेजों की गुलामी के
कारण देश के वामपंथी बुद्धिजीवि पत्रकार और विचारक आज तक भी अपनी स्वतंत्र सोच
विकसित नहीं कर सके। यही कारण है नन्दिता दास,
आशुतोष, रविश कुमार जैसे
तथाकथित पत्रकार अपनी ज्ञान, मेधा और बुद्धि
से पैदा हुई सोच को तब तक अधूरा समझते है जब तक उन्हे विदेशियों का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं हो जाता। यही कारण है
कि इज़राइली फिल्म मेकर नादव लापिड के श्री विवेक अग्निहोत्री द्वारा लिखी और
निर्देशित फिल्म "कश्मीर
फ़ाइल" को "वल्गरता" के प्रमाण पत्र देने
पर आशुतोष और नन्दिता दास जैसे पत्रकार और फिल्मकार फूले नहीं समाये।
अपनी
खुशी के उताबलेपन पन मे "आशुतोष",
नन्दिता दास शायद ये भूल गये कि इफ़्फ़ी की जूरी नादव लापिड
का "कश्मीर फाइल्स" पर दिया गया
बचकाना ब्यान कोई ईश्वरीय संदेश नहीं जिसे
नकारा न जा सके! इफ़्फ़ी की जूरी का पद प्राप्त करना कोई सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के प्रतिष्ठता पूर्ण पद पर नियुक्त होना नहीं है कि जिसको प्राप्त होने पर गौरवान्वित महसूस किया जाए? इफ़्फ़ी से संबद्ध हुए बिना भी फिल्म निर्माण के विभिन्न आयामों का सृजन करने वाले साहित्यकार, गीतकार, संगीतकार, पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक अपनी कला को अनासक्त भाव से
बिना किसी प्रतिसाद, प्रतिफल या पारितोषिक के अपने कार्य का सर्वश्रेष्ठ अंजाम दे रहे है अन्यथा इनके बिना इफ़्फ़ी जैसी संस्थाएं सिर्फ और सिर्फ "नचैइयों"
की जमात मात्र है!! फिल्म निर्माण, साहित्य सृजन, संगीत या कला सधना किसी व्यक्ति या संस्था से पुरुष्कार, अभिनंदन या
सराहना के मुंहताज के बिना ईश्वर को
समर्पित कर स्वांतः सुखाय के लिए ही किए जाते है। तब
इफ़्फ़ी जैसी संस्थानों के जूरी नादव लापिड से कश्मीर मे हुए इस सदी के नृशंस नरसंहार पर
बनी फिल्म "कश्मीर फ़ाइल" पर सकारात्मक टिप्पड़ी की उम्मीद कैसे की जा
सकती है?
बड़ा खेद और अफसोस है कि भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के जिस जूरी "नादव लापिड" को भारत के कश्मीर मे सन 1990 मे कश्मीरी पंडितों के भीषण नर संहार की अज्ञानता!! और अल्पज्ञान फिल्म को असभ्य, अभद्र बताना, ये दर्शाता है कि भारत देश के बारे मे उनका ज्ञान कितना अधूरा और कितना थोथा है? क्या इज़राइली फिल्म मेकर श्रीमान नादव लापिड भारत के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के जूरी बनने के योग्य भी थे? जिस नादव लापिड के "कश्मीर फ़ाइल" के ब्यान पर इज़राइली सरकार ने न केवल नादव की निंदा और भर्त्सना की अपितु उनके कथन पर भारत से माफी मांगी, उसके साथ जुडने से ये वामपंथी, टुकड़े टुकड़े गेंग सहित पत्रकार आशुतोष, नन्दिता दास के मन मे लड्डू फूटना ये दर्शाता है कि वे कश्मीर मे कश्मीरी पंडितों के कत्ले आम पर कितने खुश है?
प्रश्न ये है कि नादव लापिड को कश्मीर फ़ाइल फिल्म मे उन्हे क्या वल्गर लगा? उनको किस सीन मे अभद्रता दिखी? फिल्म की किन लाइनों मे अशिष्टता नज़र आई? जबकि फिल्म की हर घटना और विवरण के दंश से देश की जनता ने तब के विवरण और तथ्यों को समाचार पत्रों के माध्यम से पढ़ा और महसूस किया था। लेकिन फिल्म के प्रोड्यूसर और निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने तो फिल्मांकन के माध्यम से तत्कालीन कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को पहली बार दुनियाँ को जीवंत दिखाने का प्रयास किया। कश्मीरी पंडितों के इन क्रूर और दुःखद क्षणो को देश की करोड़ो जनता ने अपने से जोड़ कर कश्मीरी पंडितों के साथ हुए दुःख, दर्द को महसूस किया!! इस प्रितिक्रिया के फलस्वरूप सिनेमा हाल मे दर्शकों के आँखों से खून के आँसू और दर्द उनके चेहरों पर स्पष्ट देखा गया। तकालीन केंद्रीय और राज्य सरकारों की इस नर संहार की घटना से बेरुखी और ढुलमुल रवैये से आज भी देश की आम जनता मे क्रोध और रोष है। अपने ही देश मे अपने ही जमीन से कश्मीरी पंडितों का पलायन देश के नीति नियंताओं पर एक बहुत बड़ा सवालियाँ निशान खड़ा करता है?
इन तथाकथित छद्म वामपंथी बुद्धिजीवियों का
ये मानना कि ये फिल्म समाज के वर्गों के बीच सामाजिक सौहार्द और वैमनस्य को बढ़ावा
देती है। मेरा मानना है कि समाज मे घटे एक सत्य वृतांत पर आधारित घटना क्रम का
चित्रण कैसे अशिष्ट और अभद्र और असभ्य हो सकता है?
महज इसलिए हम इस नर संहार को स्मरण न करे कि इससे समाज का एक वर्ग विशेष आहत हो
सकता है? समाज के कुछ असामाजिक,
आततायी और आतंकियों की कट्टरता और कायरता पूर्ण कृत के लिए सारी समाज कैसे जोड़ा जा
सकता है? क्या 1947 मे देश के
बँटवारे से उपजी विभिषिका मे पाकिस्तान के अतिवादियों द्वारा मारे गए दस लाख से
ज्यादा शरणार्थियों की हत्या का स्मरण महज इसलिए नहीं किया जाए कि इससे
पड़ौसी पाकिस्तान आहात होगा? ये उचित ही था कि
14 अगस्त 1947 को देश के बँटवारे से उपजे विभाजन मे मारे गये शरणार्थियों की याद मे
"विभाजन
विभीषिका स्मृति दिवस" के रूप मे मनाने
का निर्णय लिया गया।
मै ऐसी सोच और विचार धारा के लोगो से पूंछना
चाहता हूँ कि चाहे अत्याचार और अनाचार के प्रतीक यहूदी राजा पिलातुस द्वारा प्रभु ईसा मसीह को शूली पर
चढ़ाने की घटना को "गुड फ्राइडे" के रूप मे स्मरण हो? या करबला के युद्ध मे याजीद द्वारा इमाम हुसैन के निर्दयी कत्ल का "मोहर्रम"
के रूप मे याद करना हो? या दुनियाँ के एक मात्र ईकलौते
दृष्टांत के तहत श्री गुरु तेग बहादुर जी द्वारा 24 नवम्बर 1675 मे हिन्दू धर्म के रक्षार्थ क्रूर आततायी औरंगजेब
जैसे विधर्मी की अवज्ञा कर अपना आत्मोत्सर्ग कर
सर्वोच्च बलिदान को "शहीदी दिवस" के रूप मे स्मृत करना या गुरु गोविंद सिंह के 7 और 9 वर्ष से भी कम
आयु के दोनों साहबजादों ( बाबा जोराबर
सिंह एवं बाबा फतह सिंह) को 26 दिसम्बर 1705 मे क्रूर आततायी नवाब वजीर खाँ द्वारा
दीवार मे चिनवा देने का बलिदान इस बात के उदाहरण है कि हर देश और काल मे ऐसे महान पुरुषों ने क्रूरता, अनाचार और अत्याचार के विरुद्ध
अपना बलिदान दे मानवता की रक्षा की है। हर वर्ष इन
श्रेष्ठ पुरुषों के बलिदान दिवस पर उनके पराक्रम, शूर-वीरता, शौर्य और साहस को स्मरण करने से विद्वेष, घृणा, तिरस्कार या नफ़रत कैसे फैल सकती है? कश्मीर
फ़ाइल मे दिखलाई गयी कश्मीरी पंडितों के नर संहार की घटनाए इसी कड़ी की एक श्रंखला
है।
खेद और अफसोस तो तब और होता है इज़राइल का ऐसा फ़िल्मकार, कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर अधम, आपत्तीजनक
टिप्पड़ी करता है जिसके अपने देश मे 1939 मे द्व्तिय विश्व युद्ध के
दौरान जर्मनी के तानशाह हिटलर ने इज़राइल के 11 लाख यहूदियों को गैस चैंबर मे डाल कर
मार डालने का कुत्सित और अमानवीय कार्य किया!! जो इतिहास मे होलोकास्ट नरसंहार के नाम
से जाना जाता है। इसलिए मै इज़राइली
फिल्म मेकर नादव लापिड द्वारा भारतीय फिल्मोत्सव मे कश्मीरी फ़ाइल को वल्गर (अशिष्ट
और असभ्य), सस्ती लोकप्रियता की
फिल्म का बताने पर असहमति प्रकट कर उनके वक्तव्य की घोर निंदा और भर्त्सना करता
हूँ।
विजय सहगल




2 टिप्पणियां:
सहगल साहब, आपका लेख बहुत बलिष्ठ, तर्क पूर्ण, यथोचित एवं साहसिक है। इस लेख में, मैं आपके लिखे हुए हर एक शब्द को समर्थन करता हूं। हिटलर द्वारा किए गए होलोकास्ट का विरोध हम आज भी करते हैं एवं हम भूले नहीं!
नादव लापिद कैसे भूल गए भारत के इतिहास को? बहुत ही दुख की बात है!
मैं आपसे सहमति जताते हुए उनकी भर्त्सना करता हूं। ्
लापिड के पूर्वजों की खोज करें तो मैं समझता हूँ कि वह यहूदियों के ग़द्दार और नाज़ियों के समर्थक निकलेंगे। ग़लती साँप की नहीं है कि उसने काटा, ग़लती उसकी है जिसने उसे बिना छानबीन के न्योता दिया!
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