"बेगुनाह"
पिछले कुछ दिनों से हमारी सोसाइटी मे कोरोना
पॉज़िटिव मरीजों से संबन्धित तीन घंटनाएं हुई जिनके कारण मैंने नीचे ग्राउंड फ्लोर
पर भी सोसाइटी के अंदर खुले क्षेत्र मे घूमना बंद कर दिया। अब अपनी फ्लोर के
बरामदे मे जो रेल के डिब्बे जितना लंबा है उस पर ही प्रातः और शाम का भ्रमण कर रहा
हूँ। लगभग 45-50 मिनिट के भ्रमण के पश्चात विश्राम के लिये बैठने से मिले सुख की
कल्पना ही की जा सकती है। जब एफ़एम रेडियो पर प्रातः प॰ भीम सेन जोशी या प॰ जसराज
और कुमार गंधर्व की सुरीली आवाज मे भजन सुनाई दे रहे हों तो उससे बढ़के कोई
स्वर्गिक आनंद कदाचित ही इस भू लोक मे कोई हो!!
आज कॉरीडोर मे ही भ्रमण करते हुए जब बरामदे
के एक सिरे पर कुर्सी डाल कर बैठा तो
कानों मे एफ़एम रेडियो पर मधुर संगीत बज रहा था। अचानक सामने बनी बहुमंजिला सोसाइटी
की नौवि मंजिल से एक महिला ने बड़ी सफाई और चतुराई से अपने हाथ मे ली हुई पोलिथीन
मे भरे कचरे को आस पास देख कर ज़ोर से सड़क की ओर इस तरह फेंका की कचरे की थैली उसकी
सोसाइटी की बाउंड्री बाल के पार सड़क पर गिरे। यह देख मैंने तुरंत ही अपनी सोसाइटी की तेरहवी
मंजिल से नीचे सड़क की ओर झांक कर देखा
कचरा बिल्कुल अपने सटीक लक्ष्य को भेद बाउंड्री बाल के पार जाकर गिरा। उस भद्र कहे
या दुष्ट महिला की ये हरकत देख बड़े क्रोध
और अफसोस हुआ कि कैसे एक सभ्य समाज मे रह रहे लोग इस तरह की बेहूदा हरकत कर सकते
है? एक सोसाइटी जिसमे कचरे के निपटान की समुचित
व्यवस्था उपलब्ध हो और कचरा आपके दरवाजे से उठाया जाये फिर भी इस तरह की तंग और
ओछी हरकत को कैसे प्रशंसनीय कहा जा सकता है?
पिछले दिनों मैंने अपनी ही सोसाइटी मे कुछ
लोगो द्वारा सोसाइटी के ग्राउंड फ्लोर के रास्ते पर सिगरेट के बचे ठूंठ को किसी
रहवासी द्वारा फेंकने की क्षुद्र ढिठाई पार एक ब्लॉग "तालाब मछ्ली और आदमी"
(https://sahgalvk.blogspot.com/2020/06/blog-post_13.html) लिखा था। कुछ दिनों की
मेहनत और पैनी नज़र रखने पर वे दोनों ही असामाजिक प्राणियों को एक एक कर मैंने रंगे हाथ पकड़ कर इस तरह के निंदनीय क्रत
को न करने का निवेदन किया। इस उम्र मे किसी 28-30 साल के नौजवान और 52-55 वर्ष के
अधेड़ से कठोरता से तो पेश नहीं आया जा सकता लेकिन उन दोनों के सिगरेट डिब्बी और
सिगरेट के ठूंठ को उनके सामने ही अपने हाथों
उठा कूड़े दान मे फेंक पुनः गंदगी न फैलाने
का निवेदन किया कि शायद कुछ शर्म-लिहाज़
उन्हे ऐसा करने से रोके। लेकिन सालों साल की बिगड़ी आदत को कदाचित उनके घर बाले
बचपन मे रोकते तो शायद ऐसी नौबत न आती। इन दोनों अपनी बुरी आदत के पराधीन इन अश्रेष्ठी
जनों मे एक नौजवान ने तो अपनी आदत मे कुछ बदलाब कर सिगरेट के कचरे को सड़क पर
फेंकने मे कुछ हद तक नियंत्रण किया लेकिन यदा कदा आदत के विस्मृत होने पर कभी कभी
कुछ ठूंठ दिखाई दे जाते। इसकी एक बजह ये भी हो सकती है कि जब भी प्रातः घूमते मे
बो नौजवान जब अपनी बाल्कनी मे दिखाई दे जाता तो पास हो या दूर मै उसे बड़ी गर्म
जोशी से ऊंची आवाज मे नमस्कार कर उसका हाल चाल पूंछ लेता। मैंने महसूस किया कि वह
भी मुझे देख और मेरे नमस्कार के कारण कुछ असहज हो अतरिक्त सावधानी की मुद्रा मे हो
जाता।
लेकिन दूसरे अधेड़ सज्जन जब दिखे तो उनको भी
हमने मुस्कराते हुए ऊंची आवाज मे प्रणाम किया और उनके सिगरेट के शौक से उपजे कचरे
को रास्ते मे न फेंकने का निवेदन किया। पहले
तो उन्होने सफाई दी कि मै नहीं उपर की मंजिल से कोई सिगरेट फेंकता है पर निकासी गेट सामने
बैठने बाले गार्ड और एक अन्य रहवासी जो उस समय वही घूम रहे थे ने कहा ये ही व्यक्ति सिगरेट पीकर बची हुई सिगरेट की
ठूंठ फेंकता है। कुछ दिन कचरा कुछ कम दिखा
लेकिन फिर वही "ढाँक के तीन पात"। एक दिन प्रातः भ्रमण मे उसके द्वारा
फेंकी सिगरेट की डिब्बी के चारों ओर मैंने सोसाइटी मे लगे दस-बारह फूलों को तोड़ उस
डिब्बी के चारों ओर फूलों की माला जैसी बना दी (चित्र स॰1)जैसे मानों इस प्रदूषित
सिगरेट और उसके प्रदूषित विचारों को हम श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हों?
मेरा इरादा था कि
लोगो के ध्यानकर्षण के वशीभूत वो दुरात्मा कुछ सबक ले और शायद आगे से गंदगी न
फैलाये। लेकिन वह तो ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे धूर्त और हठी हो लेकिन वो तो इस
सबसे भी बढ़ कर निर्लज्ज और बेहया भी था उस पर सिगरेट की डिब्बी के चारों ओर बनी
फूलों की माला भी कोई असर न कर सकी। लेकिन सुबह 10-11 बजे जब सोसाइटी के कार्यों
मे लगे कर्मचारियों की ड्यूटि शुरू हुई तो बड़ी गड़बड़ हो गई। फूलों की माला का जो वृत
हमने सिगरेट पीने बाली दुष्टात्मा के स्वाभिमान को जाग्रत हेतु बनाया था ताकि उसे
कुछ शर्म लिहाज हो और ऐसा निंदनीय कार्य
वो बंद कर दे पर वह निरर्थक साबित हुआ बल्कि इसके उलट सोसाइटी के सफाई ठेकेदार ने
जब देखा कि खाली सिगरेट डिब्बी के चारों ओर फूल का घेरा बनी माला से किसी सज्जन
रहवासी ने उसकी सफाई व्यवस्था पर कटाक्ष कर सवाल खड़े किये है।
तो उसने अपना क्रोध उस सफाई कर्मी पर उतार उसे ठीक
से सफाई न करने के लिये लताड़ा और भला बुरा कहा। जब मुझे अगले दिन इस बात का पता
चला तो बहुत ही बुरा लगा कि नाहक ही एक बेगुनाह को उस किये की सजा मिली जो गुनाह
उसने किया ही नहीं। मुझे अपने निरर्थक प्रयास पर अब बड़ा अफसोस हो रहा था कि कहाँ
उस मूढ़-मनः को शिक्षित करने के चक्कर मे एक मेहनती सफाई कर्मचारी को मेरी बजह से
अपने ठेकेदार का नाहक ही कोपभाजन बनना पड़ा। मुझे अब कबीर दास जी का बो दोहा याद आ
रहा था जिसमे "साधू ये मुरदों का गाँव"........। जिस सोसाइटी के 500 रहवासियों ने एक-दो
व्यक्तियों द्वारा वर्षों से कचरा फैला कर व्यवस्था को चुनौती देने वाले इन धूर्त और
मक्कार लोगो पर किसी ने कोई एतराज नहीं किया,
तब नाहक ही मै इन मुर्दों को जगाने का प्रयास कर रहा हूँ?
इसलिए इस मुरदों के गाँव मे दूसरों की बुराई देखना से बेहतर है अपना आत्मवलोकन। जिसे कबीर दास जी ने इन शब्दों मे व्याँ किया
है:-
"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।"
"जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय॥"
और इस तरह उस बेगुनाह से मन ही मन माफी
मांगते हुए मैंने सोसाइटी मे सफाई हेतु सुधारात्मक कार्यों पर अपनी आंखे फेर
तिलांजलि दे दी ताकि फिर से किसी बेगुनाह
को हमारे कारण सजा न मिले।
विजय सहगल



2 टिप्पणियां:
सही बोला आपने सर
विजय सहगल जी की तरह Vigilent लोग...
कबीर जी के शव्दों में सच्चाई कह गए ।
Sorry to Say पर ऐसे सब लोगों को मैंने Car की खिड़की से हाथ निकाल कर चिप्स के पैकेट बाहर फैंकते हुए देखा है ।
अगर हम सब Charity Begins at Home का Principal Follow करें तो न तो किसी को तकलीफ हो... देखकर... ना कोई सफाई कर्मचारी डाँट खाये...
And... इतनी मेहनत किसी कंस्ट्रुक्टिवे issue के लिए की जाए तो ज़्यादा सफल हो ।
धन्यवाद share करने के लिए भी व पड़कर समझने के लिए भी ।
वंदेमातरम ।
Ravinder Rana
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