शनिवार, 15 मई 2021

श्री सांवलियाँ सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़ (राजस्थान)

 

"श्री सांवलियाँ सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़"












दिनांक 5 मार्च 2021 को अंबाजी से आबू रोड होकर वाया उदयपुर हो दोपहर करीब 2 बजे चित्तौड़ गढ़ पहुँच कर कुछ समय आराम के पश्चात शाम चार बजे होटल से निकले ही थे कि सामने सड़क पर आते ऑटो को श्रीमती जी ने रोक लिया। उसने ऑटो वाले से साँवलिया सेठ मंदिर जाने आने की बात शुरू कर दी। मेरा इरादा बस से  साँवलिया सेठ मंदिर  जाने का था क्योंकि मैंने अपने एक दो घुम्मकड़ी मित्रो से जो चित्तौड़ गढ़ से तालुकात रखते थे से पता किया था। उन घुम्मकड़ी मित्रो की राय के अनुसार साँवलिया सेठ मंदिर, चित्तौड़ गढ़ से लगभग 45 किमी दूर ग्राम भदसोड़ा मे मुख्य हाईवे पर स्थित है। उदयपुर की सारी बसे साँवलिया सेठ मंदिर होकर ही जाती है। लेकिन कई बार स्थानीय लोगो विशेषकर परिवहन चालकों की राय घुम्मकड़ी साथियों से जुदा हो अच्छी हो जाती है। क्योंकि वहाँ एक नहीं दो नयनभिराम सुंदर साक्षात देवस्थान साँवलिया सेठ मंदिर है। राष्ट्रीय राजमार्ग के अलावा यहाँ 7-8 किमी॰ दूर मंडफिया ग्राम मे भी मुख्य विशाल साँवलिया सेठ मंदिर है।

ऑटो चालक कुछ अलग ही मिज़ाज और स्वभाव का था साँवलिया सेठ मंदिर जाने आने की बात हो ही रही थी बोला ये ऑटो कुछ दिन पहले ही नया लिया है, साँवलिया सेठ की ही गाड़ी है। वे ही मालिक है हम तो सेवक है। भाड़ा जो आपको देना हो दे देना। मैंने मंदिर के बारे मे जानकारी मांगी तो उसने कहा वहाँ दो साँवलिया सेठ मंदिर है। छोटा मंदिर मुख्य हाइवे 76  पर गाँव बागुंड-भदसोड़ा पर है और मुख्य मंदिर वहाँ से 7-8 किमी॰ अंदर ग्राम मण्ड्फ़िया मे है। तब हमे अपने मित्र की सलाह अनुसार बस से जाने आने के निर्णय न लेने और ऑटो द्वारा दोनों भगवान श्री कृष्ण स्वरूप साँवलिया मंदिर पर प्रसन्नता थी। क्योंकि सामान्य यात्री बस जाने मे पैसा तो बचता पर समय और शायद दूसरे  साँवलिया सेठ मंदिर मंडफिया  जाने से हम वंचित रह जाते। ऑटो चालक का नाम रवि तिवारी था बहुत ही व्यवहारकुशल और नम्र। दर्शनार्थियों और पर्यटकों से मित्रवत व्यवहार के कारण उस  कुशल नौजवान ने ज्यादा मोलभाव के विना साँवलिया सेठ मंदिर चलने पर तुरंत राजी हो गया। उसके इसी सद्व्यवहार के कारण दूसरे दिन हमने चित्तौड़ गढ़ भ्रमण हेतु उसके ऑटो से ही जाने का निश्चय कर लिया। आगे जाने वाले घुम्मकड़ी मित्रों की सुविधा हेतु रवि का मोबाइल आपके साथ सांझा कर रहा हूँ (मोबाइल नंबर 9166865014)  

उदयपुर राष्ट्रीय राज मार्ग छह लेन का बना हुआ था फिर भी  ऑटो चालक रवि  अपनी मध्यम गति से ऑटो को चलाते हुए चित्तौड़ गढ़ एवं साँवलिया सेठ मंदिर की जानकारी के साथ स्थानीय जानकारी भी दे रहा था। सड़क के दोनों ओर कुछ खेतो मे हाई मास्क रोशनी हो रही थी उसने बताया कि ये खेत अफीम की खेती की फसल उगा रहे है इसीलिए फसल की सुरक्षा व्यवस्था के विशेष इंतजाम है। लगभग एक घंटे मे राज मार्ग से लगे साँवलिया सेठ मंदिर, भदसोड़ा पहुंचे। विशाल आयताकार मंदिर अपने आधार से 12  फुट ऊंचे चबूतरे पर बनाया नवीन वास्तु निर्माण प्रतीत हो रहा था। मुख्य मंदिर मंडप के चारों ओर 15-17 फुट चौड़ा गलियारा बनाया गया था जिस पर राजस्थानी  संगमरमर के पत्थर लगाये गए थे। चारों गलियारे की छत्त के धरातल पर बहुत ही शानदार पेंटिंग की गई थी। पेंटिंग मे भगवान कृष्ण से संबन्धित लीलाओं का चित्रण किया गया था जिनको  शानदार रंग-बिरंगी  बेल-बूटों से बार्डर मे रेखांकित किया गया था।

भदसोड़ा साँवलिया मंदिर के मुख्य मंडप मे चारों ओर रंगीन काँच की शानदार नक्काशी की गई थी। विशाल आयताकार मंडप मे सैकड़ो  दर्शनार्थी एक बार मे बैठ मंदिर मे होने वाले तीज त्योहारों के साक्षी होते। मंदिर के मुख्य आकर्षक भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप की मूर्ति लड्डू गोपाल की नयनभिराम, आकर्षक रूप मे विराजमान थे। सुंदर सिंहासन पर ग्वाल बाल और गायों के झुंड के साथ मोरपंखों मे शोभायमन लड्डू गोपाल के दर्शन अत्यंत मनमोहक थे। ऐसी किवदंती है कि इसी मंदिर प्रांगढ़ मे स्थित कुएं से 125 वर्ष पूर्व भगवान कृष्ण की तीन मूर्ति से निकली थी। इनमे से एक बाल रूप भगवान की मूर्ति इसी जगह (भादसोड़ा) दूसरी प्रतिमा की स्थापना  यहाँ से 7-8 किमी॰ दूर मंडफिया गाँव मे हुई है।

अब हमारा अगला पढ़ाव राष्ट्रीय राजमार्ग से परे 7-8 किमी॰ दूर  मंडफिया स्थित साँवलिया सेठ का मुख्य मंदिर के दर्शनार्थ जाना था। पक्की सड़क से होते हुए हम ऑटो मे सवार जिसके सारथी श्री रवि कुमार थे और जो लगातार भगवान साँवलिया सेठ के इस क्षेत्र की महिमा और यशोगान से अवगत करा रहे थे। रास्ते मे अनेक खेत और संस्थान जो साँवलिया सेठ के नाम से थे लोगो के दान पुण्य की महिमा का वखान कर रहे थे।

450 वर्ष पूर्व निर्मित साँवलिया सेठ मंदिर कल्पना के परे इतना विशाल मंदिर प्रांगढ़ होगा मुझे सहज विश्वास न हुआ। इतनी विशाल अधोसंरचना इस बात का साफ संकेत थी की मुख्य पर्व और त्योहार पर कितना वृहद जनसमुदाय यहाँ भगवान साँवलिया सेठ के  दर्शनार्थ पहुंचता होगा। ऐसी  किवदंती है कि ये वही गिरधर गोपाल की प्रतिमा है जिसको मेवाड़ राजघराने का परित्याग करने वाली कृष्ण की भक्ति मे लीन रहने वाली मीरा बाई पूजा करती थी। 

विशाल कलात्मक वास्तु और मेहरवों से सुसज्जित दरवाजो की संरचना मे सीढ़ियों चढ़ मंदिर की दहलीज़ को लांघ पवित्र और आराध्य मंदिर मे प्रवेश किया। विशाल प्रवेश मंडप के खुले प्रांगण के दूसरे सिरे पर वृहद मंदिर शिखर पर  सोने के पत्रों से जड़ित स्वर्ण कलश ढलते सूर्य की रोशनी मे दूर से चमक रहा था। राजस्थानी वास्तु से निर्मित दो मंजली   इमारत आकर्षण का केंद्र थी। दर्शनार्थियों खुले प्रांगढ़ से प्रवेश वर्जित होने के कारण दोनों ओर बने बरामदों मे  से बाएँ गलियारे से होकर मुख्य मंदिर मे दर्शनार्थ प्रवेश की व्यवस्था थी।

लंबे चौड़े गलियारे से होकर मंदिर के विशाल मंडप मे प्रवेश कर भगवान साँवलिया के बालरूप के दर्शन किये। सिर पर मोरमुकुट एवं स्वर्णभूषणों एवं मोतियों की माला से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान भगवान कृष्ण की साँवलिया स्वरूप के एकटक  दर्शन लाभ  कर अपने को कृतिकृत, धन्यभागी होने का गौरव प्राप्त किया। मुख्य मंडप के नवद्वारों को स्वर्ण रंग से सुंदर ढंग से पेंट कर  सजाया गया था। संगमरमर के कलात्मक मेहराबों ने मंडप की सुंदरता मे चार चाँद लगा दिये थे। चरणामृत एवं प्रसाद ग्रहण कर दायें तरफ के गलियारे से हमारे सहित सारे दर्शनार्थी बापस हुए। बापसी मे दायें गलियारे मे चाँदी से जड़ित रथ के दर्शन किये जिसका उपयोग भगवान   रथयात्रा के समय किया जाता है।                             

चित्तौड़ गढ़ और आसपास के क्षेत्रों मे ऐसी मान्यता है कि कि भगवान साँवलिया को अपने खेती, उद्धयोग, व्यवसाय मे सांझीदार बना, भक्तगण साल दर साल  व्यवसायिक लाभ का एक हिस्सा मंदिर को समर्पित करते है।  इसलिये भगवान साँवलिया, सेठ कहे जाते है। हों भी क्यों न जब लाखों करोड़ो व्यवसाय मे सांझीदार को सेठ नहीं कहेंगे तो क्या कहा जाये!! हर माह 8-9 लाख भक्त साँवलिया सेठ मंदिर के दर्शनार्थ पहुँचते है। पूरे चित्तौड़ गढ़ सहित मेवाड़ क्षेत्र मे हर बड़े कॉलेज, हॉस्पिटल, संस्थान का नाम भगवान श्री साँवलिया के नाम पर ही है। भगवान कृष्ण के दोनों  साँवलिया स्वरूप बालरूप के दर्शन और दर्शनार्थियों की साँवलिया सेठ के प्रति श्रद्धा एवं समर्पण साँवलिया सेठ की महिमा अपरमपार जो बनाती है।  

श्री कृष्ण भगवान के साँवलिया स्वरूप की जय!!

विजय सहगल

1 टिप्पणी:

N K Dhawan ने कहा…

बहुत सुंदर विवरण साँवरिया सेठ के मंदिर का। मैंने भी साँवरिया सेठ के मंदिर के दर्शन किये और धन्य हुआ हूँ ।