मंगलवार, 11 मई 2021

बैंक कर्मियों का वेतन समझौता या धोखा??

"बैंक कर्मियों का वेतन समझौता या धोखा??" 


मेरे ब्लॉगर साथियों आज मै अपने हजारों बैंक कर्मी साथियों का दर्द आपके साथ सांझा करना चाहता हूँ जो वेतन समझौते के लंबे संघर्ष के बाद उम्मीद लगाये बैठे थे कि उनकी पेंशन मे भारी नहीं तो हल्की ही  सही, कुछ वृद्धि तो होगी। पर हा!! दुःख और संताप यूनियन के नेतागणों ने इतनी सफाई और चालाकी से भारतीय बैंक संघ से समझौता किया कि वर्तमान पदस्थ बैंक स्टाफ की तो वेतन मे वृद्धि हो गई पर सेवा निवृत्त बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की तुरंत प्रभाव से पेंशन मे पदानुसार चार हजार से 6 हजार तक कमी हो गई।  ब्लॉग के साथ मैंने अपनी बैंक पेंशन खाते की माह मार्च एवं अप्रैल 2021 की पेंशन प्रविष्टि  त्वरित संदर्भ हेतु संलग्न कर रहा हूँ।      

दुनियाँ का शायद ये पहला अजूबा होगा जब वेतन नवीनीकरण और वेतन वृद्धि मे लोग एक दूसरे को बधाई दे रहे थे, मिठाई बाँट रहे थे उल्लास और प्रसन्नता से खुश थे कि बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की वेतन मे बड़े संघर्ष और हड़तालों के बाद वेतन मे वृद्धि हुई है। हम जैसे हजारों अधिकारी और कर्मचारियों  ने इस संघर्ष मे बराबरी से वेतन वृद्धि के संघर्ष मे धरना-प्रदर्शनों मे भाग लिया और हा!! दुःख, संताप और वेदना कि इस वेतन समझौते से हमारी पेंशन मे माह अप्रैल 2021 से लगभग चार हज़ार रुपए की कमी हो गई। न केवल कमी हुई बल्कि सेवानिवृत्ति के अगले माह मई  2018  से प्रति माह वेतन समझौते के पालन मे 3500 से 4000 रुपए प्रति माह बैंक को बापस भी करने पड़े। दुनियाँ के इतिहास मे शायद ये इकलौता सम्झौता होगा जब समझौते के अंतर्गत लगभग विभिन्न पदानुसार 4000 से 6000 या इससे अधिक   रुपए प्रति माह का नुकसान अधिकारियों और कर्मचारियों उठाना पड़ रहा है। वैसे भी व्याज दरों मे कमी के चलते व्याज से होने वाली आय मे कमी झेल रहे बैंक कर्मी पेंशन की इस कमी से अधमरे हो जायेंगे।   भला ऐसा भी कभी कोई वेतन समझौता देश सहित दुनियाँ मे सुना या देखा गया  जब वेतन मे बढ़ौती के बजाय कमी हुई हो??  

इस वेतन समझौते के लिये हम जैसे हजारों बैंक अधिकारी और कर्मचारी साथियों ने कंधे से कंधे मिला कर लड़ाई लड़ी थी। इन आंदोलनों के धरना प्रदर्शन एवं  हड़ताल मे भी  शामिल हो अपना वेतन भी कटाया था फिर भी इस लड़ाई का ये सिला मिला की सेवानिवृत्ति के पश्चात पेंशन मे कटौती झेलनी पड़ी!! जिन यूनियन लीडर को अपना भाग्य विधाता मान अपने भाग्य के निर्णय का भार इन नेताओं को  सौंपा था कि वे हमारे भाग्य का निर्णय हमारे पक्ष मे करेंगे। पक्ष तो दूर ऐसा कुठाराघात, धोखा, छल, कपट ये तथाकथित नेता रूपी  भाग्य विधाता करेंगे कि वेतन/पेंशन मे बढ़ौती की जगह कटौती होगी? इन नेताओं के चरित्र का दर्द निम्न पंक्तियों मे व्याँ करूंगा:- 

"जिन्हे हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को।"
"वही अब नाग बन बैठे, गले मे काट खाने को॥"

भला श्रमिकों के साथ ऐसा भी अन्याय दुनियाँ मे कभी हुआ है  या देखा गया कि वेतन समझौते मे मिलने वाली धनराशि मे कटौती होगी? पहले लोग यूनियन लीडर के बारे मे कहा करते थे कि ये नेतागण अपने निजी आर्थिक लाभ के लिये बैंक कर्मियों के हितों से समझौता कर लेते है पर कभी विश्वास नहीं हुआ लेकिन आज कहते हुए दुःख और संताप के साथ कोई संकोंच नहीं कि ऐसी कौन सी मजबूरीयां थी कि "विशेष वेतन"  नाम के भत्ते को समझौते मे शामिल किया गया जो पेंशन के आंकलन मे इस भत्ते को शामिल नहीं किया? जिसके कारण पेंशन धरियों की पेंशन चार हज़ार से अधिक लगभग कम हो गई। समझौते मे शामिल भारतीय बैंक के छल-प्रपंच तो समझ आता है क्योंकि वे प्रबंधन के अंग थे पर नौ कर्मचारी अधिकारियों की ऐसी क्या मजबूरी थी कि वे इस चालबाज़ी और पाखंड मे शामिल हो गये? ये नेतागण  तो बैंक कर्मियों/अधिकारियों के हितैषी थे?? इन संगठनों के नेताओं के कर्मचारी और अधिकारियों के हितों को नज़रअंदाज़ करने के इस धोखेबाज़ी पूर्ण  चाल चरित्र और फरेब पर अब क्यों न शक किया जाये? हम ये क्यों न मान कर चले कि बैंक के पेंशन धारी अधिकारियों/कर्मचारियों के विरुद्ध इस षड्यंत्र मे इन यूनियन लीडर की भागीदारी है? जिस बाढ़ को ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो खेतों की रक्षा करेगी और वही बाढ़ खेत को खा गई इस से बड़ा कुठराघात और धोखेबाज़ी हो नहीं सकती। हम बैंक कर्मियों के साथ कुछ वैसा ही धोखा हुआ है जैसे कोई एक मासूम, भोला बच्चा जो एक दुकान से हर रोज चॉकलेट लेता था अचानक एक दिन चॉकलेट खरीदने पर दुकानदार ने पैसे अपने पास रख कर यह कहते हुए चॉकलेट देने से माना कर दिया कि पिछले दिनों तुमने चॉकलेट की कीमत कम दी थी? ये पैसे उसी कीमत मे समायोजित कर दिये है!!  कुछ ऐसा ही कपट, प्रवंचना एवं धूर्त चालबाजी हम सेवा निवृत्त बैंक स्टाफ के साथ की गई।    

क्या कोई मानवाधिकार संगठन, दृश्य एवं प्रिंट मीडिया, श्रमिक कल्याण संगठन, स्वयंसेवी संस्थायें  बैंक कर्मियों के विरुद्ध इस ज्यादती और अन्याय के संघर्ष हेतु आगे आएंगे? क्या देश की अदालते इस छद्म वेतन समझौते जिसमे पेंशन बढ्ने के विपरीत कम हो रही  हो स्वतः संज्ञान (suo moto) ले सरकार/भारतीय बैंक संघ एवं अधिकारी कर्मचारी संगठनों से इस वेतन समझौते मे सफाई मांगेंगी?

अगर ऐसा नहीं होता है तो ये ऐसा दुनियाँ का पहला काला  "वेतन समझौता" होगा जो समझौते के नाम पर कलंक होगा जिसमे बैंक कर्मियों की पेंशन कम हो रही होगी। कभी कोई संगठन खराब और श्रम विरोधी नहीं होते, पर  धिक्कार है उन सांगठानिक नेताओं पर जिन्होने न केवल श्रमिकों के साथ धोखा किया अपितु संगठन की रीतियों, नीतियों के विरुद्ध भी  कपट, धूर्तता और पाखंड का छल-प्रपंच किया।

किसी शायर ने ठीक ही  कहा है :-

"मुझे अपनों ने मारा, गैरों मे कहाँ दम था।"
"मेरी कश्ती वहाँ डूबी जहां पानी बहुत कम था!!!"

आइये सभी सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी/कर्मचारी इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ एवं दोषी संगठन के नेताओं की निंदा और भर्त्स्ना कर अपनी आवाज बुलंद करें!!

विजय सहगल   

2 टिप्‍पणियां:

Unknown ने कहा…

ये कमाल special pay का है l
2015 में हमने भी झेला था l
हमारी भी पेंशन कम हो गई थी l
और recovery हूई थी l

Ganguli ने कहा…

धोखा है