"झाँसी
मेल"
मै
उन दिनों डबरा मे पदस्थपना के चलते ग्वालियर से दैनिक आवागमन करता था। अलग अलग समय
हमारे मित्र अश्वनी मिश्रा जी एवं रामजी लाल मीना भी साथ थे। ग्वालियर से डबरा की
दूरी 45 किमी॰ थी, ये दूरी हम लोग अन्य बैंक और सरकारी विभाग मे कार्यरत कर्मचारियों के साथ
तय कर नित्य अपनी नौकरी पर जाते। बस ग्वालियर से डबरा होके आगे दतिया तक जाती थी
जहां से झाँसी (उत्तर प्रदेश) महज 25 किमी॰ दूर रह जाता। बस का परमिट दतिया तक ही था
अतः बस झाँसी तक न जाती थी। इसके बावजूद बस पर "झाँसी मेल" के बोर्ड ने
हमे शुरू-शुरू मे दुविधा और आश्चर्य मे डाला
था पर बाद मे इस संबंध मे समुचित स्पष्टीकरण ने इस संबंध मे सारे सवालों पर
निरुत्तर कर दिया। यात्रा सुख और सुखद रूप
से जारी रहती थी। आठ बजे प्रातः एक विशेष बस मे प्रायः सभी साथी एक साथ होते। पहले
आने वाला दैनिक यात्री अन्य साथियों की सुविधा हेतु अपना बैग, पेपर, रुमाल आदि
रख सीटों को आरक्षित कर लेते। 5-10
मिनटों मे अन्य सभी साथियों के आ जाने पर एक पारवारिक यात्रा नित्य का क्रम था। बस
का स्टाफ भी दैनिक यात्रियों के प्रति काफी दयालु और मददगार था। बस मे बैठते ही
सभी दैनिक यात्री आपस मे किराया एकत्रित कर दैनिक यात्रियों की संख्या के अनुसार
कंडक्टर को एकमुश्त दे देते ताकि एक-एक
दैनिक यात्री से किराया बसूलने मे समय और श्रम
व्यर्थ न जाये और दूसरी जो विशेष
महत्वपूर्ण बात थी कि मीठी नींद की झपकी
मे कण्डक्टर महोदय टिकिट मांग कर व्यवधान न डाले।
मौसम
के अनुसार सीटों का आधिपत्य दैनिक यात्री अपनी सुविधा अनुसार करते थे अर्थात
गर्मियों मे सूर्य की दिशा के विपरीत ड्राईवर के पीछे वाली लाइन मे और सर्दियों मे
बस की बाएँ लाइन मे हम दैनिक यात्रियों का कब्जा हो जाता। मौसम कैसा भी हो पर बस
अड्डे से बस के रवाना होते ही सभी दैनिक यात्री ऐसी मीठी झपकी लेते कि आँख सीधी
डबरा बस स्टैंड पर ही खुलती। बापसी मे भी यही नित्य का क्रम था। हाँ बापसी मे शाम होने के कारण बस की दिशा को
भूल किसी मौसम मे किसी भी लाइन मे हम लोग बैठ जाते। यात्रा के दौरान उस शानदार
मीठी झपकी को हम आज भी नहीं भूले।
बस
का ड्राईवर सरमन एवं कण्डक्टर जो जगत "मामा" होने के कारण हम सब भी मामा
कहते थे। बहुत ही हंसमुख और सरल स्वभाव। सामान्य यात्रियों से बातचीत मे मामा की
हाजिर जबाबी और वाक-पटुता के हम सभी कायल थे। दरअसल बस का परमिट ग्वालियर से दतिया
का होता था पर बस के आगे "झाँसी मेल" का बोर्ड लगा रहता था जिससे झाँसी
जाने वाले सामान्य नागरिक बस का गंतव्य झाँसी मान कर प्रायः बस मे बैठ जाते। ग्वालियर
शहर की अंतिम सीमा तक तो सवारियों को लेने और बैठाने मे ड्राईवर और कण्डक्टर
व्यस्त रहते। विक्की फ़ैक्टरि/सिथोली से मामा यात्रियों के टिकिट बनाना शुरू करते।
बस के पीछे से एक एक यात्री से उसके गंतव्य पूंछ टिकिट काटना एक बड़ा दुष्कृत कार्य
रहता पर मामा बड़े धैर्य और मुस्कराहट से इसे संपादित करते।
बस
मे "झाँसी मेल" के बोर्ड के कारण प्रायः हर रोज यात्रियों से नौक-झोंक
होती। जो यात्री झाँसी जाने हेतु बस पर सवार होते पर टिकट काटने पर पता चलता कि बस
तो दतिया तक ही जायेगी, वहाँ से बस बदल कर दूसरी बस से झाँसी जाना पड़ता तो यात्री का नाराज होना
स्वाभाविक होता। पर मामा अपनी हाजिर जबाबी और मुस्कराहट से इस कहासुनी को रोज
समाधान कर यात्री को निरुत्तर कर मुस्कराने के लिये बाध्य कर देते और अपने झाँसी
मेल के बोर्ड को न्यायोचित ठहरा देते।
एक
दिन जब मामा ने झाँसी जाने वाले एक यात्री का टिकिट जब दतिया तक ही दिया तो वह नाराज हो गया कि आपने
पहले क्यों नहीं बताया कि बस दतिया तक ही जायेगी? मामा ने बड़े ही धैर्य और
सरलता से उस यात्री को कहा आपने तो मुझ से पूंछा ही नहीं कि बस झाँसी की जगह दतिया
तक ही जायेगी। आप पूंछते तो हम बता देते कि बस दतिया तक ही जायेगी। यात्री को ऐसे उत्तर की अपेक्षा न थी, वह और भी क्रोधित हो के बोला, मुझे फिर से दतिया मे बस बदलनी पड़ेगी! सामान और बच्चों के साथ बस बदलने मे फिर दिक्कत होगी। सीधी झाँसी की बस
मे बैठता तो ये झंझट तो नहीं झेलना पड़ता और फिर "पूंछने की क्या जरूरत थी जब
आपने बस के आगे "झाँसी मेल" का बोर्ड जो लगा रखा है।
मामा
ने पुनः शांत और विनम्रता और चेहरे पर मासूमियत का भाव लिये यात्री से कहा बस मे "झाँसी
मेल" का बोर्ड सही लगा है। हम दतिया मे झाँसी की बस का मेल (मिलाप) कराते है
ताकि झाँसी वाले यात्री उस मे बैठ सके। इसलिये ही बस मे "झाँसी मेल" का
बोर्ड लगा है। ये हमारी ज़िम्मेदारी और जबाबदारी है कि आपको झाँसी के लिये बस का मेल-मिलाप करा आपको सुविधाजनक तरीके से झाँसी की बस मे
बैठाये। "मेल" शब्द की नई परिभाष और उत्तर सुन कर यात्री सहित हम सभी
सहयात्री भी हँसे बिना न रह सके और मामा की बाकपटुता और चतुराई की दाद दिये बिना न
रह सके।
विजय
सहगल


2 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा लगा
बहुत सुंदर
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