शनिवार, 29 मई 2021

सकरन

"सकरन"






मै नहीं जनता की आप "सकरन" शब्द से परिचित है या नहीं पर  ये  हो सकता है कि  इस सकरन शब्द को आप किसी और रूप  से संबोधित करते हो। घर मे निकलने वाले कचरे को हमे दो भागो मे विभक्त करने की शिक्षा और संस्कार बचपन से ही मिले। सब्जी भाजी के छिलके, बीज या अन्य अनुपयोगी भाग, खाने मे बचे रोटी, दाल चावल को एकत्रित कर एक वर्तन मे एकत्रित कर लिया जाता था। इस सब्जी, भाजी के अनुपयोगी पदार्थ और खाने मे बची रोटी, दाल, चावल को हमारे बुंदेलखंड क्षेत्र मे "सकरन" कह संबोधित करते है। इस सकरन को प्रायः गाय को खिलाने मे उपयोग हम बचपन से ही करते आये थे। घर के अन्य कचरे को जिसमे धूल, कागज, काँच या अन्य अखाध्य पदार्थ को अलग एकत्रित कर सड़क पर डालते थे जिसे बाद मे नगर निगम के सफाई कर्मी झाड़ू लगा एकत्रित कर कचरा निस्तारण हेतु बड़े ट्रक मे डाल कर ले जाते थे। ये हर घर मे नित्य का कार्य था। एक छोटी बाल्टी मे सकरन को एकत्रित कर गाय को खिलाना मुझे हमेशा प्रिय लगता रहा, अतः इस काम को करने मे मुझे एक अलग ही आनंद और संतुष्टि की प्राप्ति होती थी। इस सद्कार्य को समाज मे एक पवित्र, पावन और पुण्य कार्य के फलस्वरूप धार्मिक कार्य की भी की मान्यता मिली थी। गाय को सकरन खिलाना प्रकृति और मानव के पारस्परिक लाभ का एक शानदार उदाहरण है। मानव उत्सर्जित खाध्यान कचरे के निस्तारण मे होने वाली ऊर्जा और समय का अपव्यय को इसे गाय को खिलाकर रोका जा सकता है। गाय की सेवा के रूप मे प्राप्त होने वाली "संतुष्टि" और परोपकार का अनमोल लाभ एक अतरिक्त प्रतिफल के रूप मे भी प्राप्त होता है।    

महानगरों के विकास और जीवन शैली और प्लास्टिक के प्रादुर्भाव ने सकरन के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया।  जिसके फलस्वरूप "सकरन" के साथ अन्य अनुपयोगी कचरे को अपनी सुविधा और सहूलियत के अनुरूप प्लास्टिक की थैली मे मिश्रित कर लोगों ने सड़कों पर फेंकना शुरू कर दिया। इस तरह जो सकरन गाय को पहले सहज और सरल तरीके से उपलब्ध हो खाने मे मिल जाती थी अब उसको पाने और खाने के लिये गाय सहित अन्य जानवरों को बड़ी मेहनत-मशक्कत शुरू करनी पड़ गयी। लोग इतने निष्ठुर और अदयालु हो गये कि न केवल  प्लास्टिक की थैली मे एक साथ खाद्य और अखाद्य वस्तुओं को मिश्रित कर फेंकते अपितु थैली मे इतनी पक्की गांठ भी लगा देते जिसे खोलने के जतन मे गायों को तो क्या आदमी को भी भारी मशक्कत करनी पड़े।  

प्लास्टिक की थैली मे बंद खाद्य पदार्थो के खाने की लालच मे इन बेजुबान जानवरों को  अनेकों बार खादध्य वस्तुओं के साथ साथ अखादध्य वस्तुओं एवं प्लास्टिक का भी सेवन करना  उनकी मजबूरी बन गयी। जिसके फलस्वरूप भोजन के साथ, लोहे की कीलें, काँच, नाखून, बालों के गुच्छे आदि के साथ प्लास्टिक रूपी कचरा भी गायों के पेट मे जाने लगा। इन अखाद्य और जहरीले पदार्थों के पेट मे पहुँचने के कारण गायें बीमार होने लगी और अनेकों बार मौत के मुँह मे जा, अकाल मृत्यु को प्राप्त होने लगी। दुर्भाग्य से सकरन शब्द के साथ सकरन की सांस्कृति को भी उस समुदाय, समाज और संप्रदाय  ने तिलांजलि दे दी  जो गाय को पवित्र और पूज्यनीय मान घर मे पहली रोटी गाय के लिये निकालता था।

महानगरों मे तो गाय की और भी दुर्दशा होने लगी। बहुमंजिला इमारतों मे "सकरन" शब्द और सांस्कृति से पूर्णतः अनिभिज्ञ इस  पीढ़ी ने तो लोहा, काँच, पेपर, कपड़े के साथ फल सब्जी से उपजी सकरन को भी कचरे का रूप दे दिया। घर के दरबाजे से कूड़ा-करकट एकत्रित करने की सांस्कृति ने अखादध्य पदार्थों के साथ गाय के सकरन रूपी खादध्य पदार्थों को भी "कचरा घर" मे जाने को मजबूर कर दिया, जिसके  कारण महानगरों मे गाय के दर्शन ही दुर्लभ होने लगे। महानगरों मे गाय जैसे पवित्र पालतू पशु का स्थान बड़ी तेजी से कुक्कुर अर्थात कुत्ते ने ले ली।   मुझे अच्छी तरह याद है दिल्ली और नोएडा मे अपने प्रवास के सालों मे प्रति वर्ष पितृ पक्ष के दौरान गायों की खोज मे स्कूटर से कई-कई किलोमीटर तक जाना पड़ा, तब कहीं गाय के निमित्त निकले पहले भोजन-प्रसाद को गाय को अर्पित कर सका।  

इस कोरोना काल ने मुझे अपने गृह नगर आने पर विस्मृत "सकरन" का पुनःस्मरण अपने पड़ौसी परिवार ने कराया। मैंने महसूस किया कि पिछले दिनों नगर निगम की कचरा एकत्रित करने वाली गाड़ी हड़ताल के कारण 8-10 दिन नहीं आयी फिर भी उस परिवार सहित हमे भी कोई परेशानी नहीं हुई। क्योंकि घर मे झाड़ू-बुहारने से निकला  सूखा कचरा, धूल-धक्कड़, पेपर, प्लास्टिक बैग आदि का कचरा एक थैली मे एकत्रित होता रहा और सब्जी-भाजी, फल-तरकारी एवं नित्य के खाने से बचे भोजन अर्थात सकरन को रोज एकत्रित कर घर के बाहर एक निश्चित स्थान पर डाल दिया करते थे। इस गीले खाध्य कचरे रूपी सकरन को रोज 2-3 गाय बेनागा आ कर पूरी तरह चट कर जाती थी। मजाल! है एक छिलका भी उस स्थान पर आपको पड़ा मिले। बचपन मे गाय को सकरन खिलाने से मिली सुख की अनुभूति एक बार पुनः प्राप्त होने लगी। नित्य ही सकरन को दिन मे दो-तीन बार इक्कठा कर निश्चित स्थान पर गाय के लिये डालने से मिले सुखद अहसास को मै शब्दों मे ब्याँ नहीं कर सकता। बैसे ग्रामीण और छोटे कस्बों के लोग की दिनचर्या मे गायों के लिए सकरन एकत्रित कर गायों को अर्पित करना उनकी सांस्कृति और  संस्कारों का एक अभिन्न हिस्सा है, पर महा नगरो की बहुमंजिला इमारत के रहवासियों से ऐसी अपेक्षा करना असंभव है। मध्यम और छोटे शहरों, कस्बों एवं ग्रामीण जनों से तो ये अपेक्षा की ही जा सकती है कि "सकरन" की सांस्कृति को पुनः जीवित कर अपने समुदाय, समाज, संप्रदाय की गौरवशाली और बैभवशाली  परंपरा को पुनः जीवित कर गाय की सेवा कर अपने ईहलोक और परलोक को सार्थक बनाये।

विजय सहगल

                         


1 टिप्पणी:

विजय सहगल ने कहा…

आपके सकरन ब्लाॅग को पढ़कर मुझे भी कुछ लिखने👇👇 की प्रेरणा मिली।

पिछले 40-50 वर्षों में मैंने एक बहुत बड़ा परिवर्तन देखा है। इंसानों का पशु पक्षियों से जो जुड़ाव था, वो लगभग खत्म सा हो गया है। हमारे सनातन धर्म में प्राणी मात्र पर दया करने के लिए कहा गया है। हमारे घर में पहली रोटी गाय की तथा दूसरी कुत्ते के लिए बनती थी। हमारे मोहल्ले के कुत्ते मोहल्ले वालों को अच्छी तरह से पहचानते थे। मोहल्ले से बाहर का कोई भी व्यक्ति अगर मोहल्ले में आता था तो उस पर जोर जोर से भोंक कर सभी मोहल्ले वालों को आगाह कर देते थे कि कोई नया हमारे मोहल्ले में आया है। सही मायने में मोहल्ले के कुत्ते मोहल्ले के चौकीदार हुआ करते थे। पशु-पक्षी मानव से भी अधिक वफादार होते हैं, वो किसी को क्षति तभी पहुंचाते हैं जब उन्हें जोखिम महसूस होता हैं। यदि हम उनको प्यार देंगे तो वो भी दुलार करते हैं। आजकल कुत्ते पालना एक फैशन हो गया है। धनाढ्य लोग किसी नस्ल के कुत्ते को ऊंचे दाम में खरीद कर अपने घर लाते हैं तथा उसे जंजीर से बांधकर पालतू बनाते हैं। पुराने समय में मोहल्ले के सभी कुत्ते, सभी के पालतू होते थे। मोहल्ले में अगर किसी कुत्ती के बच्चे पैदा होते थे तो उसके लिए पूरे मोहल्ले से थोड़ा थोड़ा सामान इकट्ठा करके गुड व तेल का हलवा बनता था। सर्दियों के मौसम में उन पिल्लों के रखरखाव के लिए टाट वगैरा की व्यवस्था की जाती थी। मोहल्ले के हम सभी बच्चों को कुत्तिया के छोटे छोटे पिल्ले देख कर बहुत आनंद का अनुभव होता था।

श्राद्ध का महीना कौवों के लिए उत्सव का महीना होता था। श्राद्ध में खाने की पहली थाली पित्तरों के लिए निकाली जाती थी, जिसे मारवाड़ी में कागोळ कहते है। इसके हिंदी शब्द का ज्ञान मुझे नहीं है। उस थाली में बाकायदा परांठे व उसके ऊपर घी के साथ चीनी डाली जाती थी। इसके अलावा थोड़ी-थोड़ी सब्जियां भी उस पर डालते थे। हमारे फलोदी कस्बे में श्राद्ध महीने में प्रतिदिन घर की छत पर जाकर कौवों को को वश-को वश कहकर आवाज देते थे तो कौओं का झुंड आ जाता था और श्राद्ध की थाली के पकवानों का आनंद लेता था। जिस पित्तर का श्राद्ध होता था, उसकी रूचि के अनुसार भोजन बनता था। कौवे जब उस थाली का भोजन शुरू कर देते थे, उसके बाद ही घरवालों का खाने का कार्यक्रम शुरू होता था। ये बातें मैं अपने जन्म स्थान फलोदी कस्बे की कर रहा हूं।
समय इतना बदल गया है कि अब कौए कई बार आवाज (को वश-को वश) देने के बाद भी नहीं आते हैं। मजबूरन कौओं की जगह श्राद्ध की थाली का भोजन गाय को देकर दिन के भोजन की शुरुआत की जाती है। फलोदी छोड़ने के बाद जब तक राजस्थान में रहा तब तक तो श्राद्ध पक्ष में कौओं को भोजन देने की परिपाटी चलती रही। राजस्थान छोड़ने के बाद मैंने एक बार भी श्राद्ध की थाली कौओं को खाते नहीं देखा। हर बार गाय को खिलाकर पित्तरों द्वारा प्राप्त किया गया, माना गया। फलोदी में अब श्राद्ध की थाली खाने के लिए कौए आते हैं या नहीं, इसके बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है।

श्राद्ध पक्ष में कौओं को पहला भोजन कराने के बारे में एक कथा है, उस कथा के अनुसार इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण करके माता सीता को घायल कर दिया था। उसके बाद भगवान राम ने तीर चला कर जयंत की एक आंख फोड़ दी थी। उसके बाद जयंत द्वारा माफी मांगने पर उसे माफ किया गया तथा साथ ही एक वरदान भी दिया गया, जिसके तहत कौवे को खिलाया गया भोजन पितरों की आत्मा को शांति देता है।

मनुष्य तो उसे ही कहा जायेगा जो पशु-पक्षियों एवं प्राणियों के साथ दया, करुणा तथा प्रेम का व्यवहार करे। इस महामारी के समय में पशु पक्षियों से कुछ बढ़ता हुआ प्रेम दिखाई दे रहा है। पेड़ पौधे लगाने के बारे में भी कुछ जागरूकता आई है। इंसानों को समझ में आने लग गया है कि प्रकृति पर सिर्फ उनका ही आधिपत्य नहीं है।
S.L. KHATTRI MANDSAUR ON WHATSAPP 30 MAY 2021 1.09PM