"माउंट आबू, भाग -एक"
3 मार्च 2021 को अरावली
पर्वत श्रंखला के बीच स्थित राजस्थान के अर्बुदांचल अर्थात आबू पर्वत के यात्रा
धार्मिक पर्यटन के साथ प्रकृति से निकट का साक्षात्कार था। समुद्र तल से लगभग 1200
मीटर ऊंचाई होने का आभास माउंट आबू मे आते
ही होने लगा था। दोपहर मे लगभग डेढ़ बजे होटल मे सामान आदि रखने के बाद भोजन
करते समय चलने बाली हल्की ठंडी हवा आगाह कर रही थी कि कुछ समय धूप के आश्रय मे खड़ा
रहूँ। पैदल चलते चलते एक्टिवा किराये से लेने के बोर्ड जहां तहां दिखाई दिये।
प्राथमिक पूँछ तांछ करने पर किराया 200/- से 250/- के बीच मालूम चला पेट्रोल आपको
अपना डालना था। पर आगे मुख्य बाज़ार मे मे॰गुजरात के मिस्टर पटेल की दुकान पर आखिर
सौदा 150/- रूपये प्रतिदिन पर तय हो गया। ड्राइविंग लाइसेन्स जमा करने एवं साधारण
औपचारिकता के पश्चात एक पीले सुनहरे रंग की एक्टिवा आर॰जे॰38-एस/ई-0503 हमारे
सुपुर्द कर दी गई। एक अपरचित शहर मे स्कूटर की सवारी कुछ रोमांच लिये थी। स्थानीय
लोगो से जानकारी के आधार पर शहर के सारे पर्यटन स्थल एक ही दिशा मे होने एवं माउंट
आबू शहर से अंतिम पर्यटन स्थल गुरु शिखर की
दूरी 18-19 किमी होने के आधार पर 200
रूपये का पेट्रोल पर्याप्त था पर स्कूटर किराये पर देने वाले महाशय ने एक लीटर मे
30 किमी की औसत दूरी तय करने की बता एवं दुकानदार ने अपनी श्रेष्ठ सेवाओं का हवाला
दे ये कहने कि पेट्रोल को छोड़ गाड़ी की किसी भी समस्या के लिये हमे फोन कर देना हम
कहीं भी गाड़ी की त्रुटि को ठीक करने की ज़िम्मेदारी लेंगे और माउंट आबू शहर मे एक मात्र पेट्रोल पम्प होने
की सुन श्रीमती जी के मन मे उत्पन्न डर ने 100 रु का पेट्रोल और भरवाने
को मजबूर कर दिया। भयदोहन कर व्यापार विपणन से अपनी अदृश्य आय को बढ़ाने का अनुपम उदाहरण एक्टिवा
किराये से लेने की दुकान पर देखने को मिला।
शाम
होते होते एक अदद स्वेटर की आवश्यकता महसूस हुई पर काम चला लिया। नक्की झील का
दोपहर का भ्रमण, शाम के भ्रमण के मुक़ाबले सुकून देने बाला था। हमे स्कूटर दो दिन पर
किराये से लेने के अपने निर्णय पर प्रसन्नता थी। पहले दिन झील के दो तीन चक्कर
लगाये, पास ही टोड रॉक पर चढ़ाई करने के निर्णय के साथ झील के
किनारे किनारे आगे बढ़े जो झील से ही ही
पर्यटकों का ध्यान आकर्षित कर रही थी। हिम्मत तो कर ली पर रॉक तक की लगभग 300
सीढ़ियों ने हालत पस्त कर दी। बीच रास्ते पत्थर की स्वनिर्मित गुफा के दर्शन का सौभाग्य मिला जिसमे
स्वामी विवेकानंद ने सन् 1891 मे कुछ हफ्ते
चिंतन मनन किया था। टोड रॉक पर चढ़ाई मेरे
लिये माउंट एवरेस्ट पर विजय से कम न थी। लेकिन टोड रॉक की भव्य विशाल शिला के प्रकृतिक रूप को देख मन मोहित हो गया। ईश्वर
की विशाल एवं महान कृति को देखना एक सुखद अनुभव देने वाला था। नक्की झील से दीख
रही टोड रॉक के विभिन्न रूपों को नजदीक से
देखने पर आश्चर्य की सीमा न थी। रॉक के ठीक सामने से देखने पर अमेरिका के हैलोवीन
त्योहार की याद आ गई। कैसे एक विशाल भूत के सिर का कपाल सामने डरावनी शक्ल, चपटा मुंह अधकटे हाथ लिये सिर के पीछे काला कपड़ा ओढ़े खड़ा हो। एक सिरे से
रॉक कभी झुकी मेरुदंड वाला, बूढ़ा तो दूसरे छोर से नागफन
फैलाये कालिया नाग जो शायद इंतज़ार कर रहा हो भगवान श्री कृष्ण के हाथों अपने मर्दन
का ताकि जरा मरण के चक्र से मुक्त हो सके।
जहाँ
एक ओर रॉक के नीचे "चाय पानी की दुकान", प्रकृति की शानदार रचना को अपकृत्य
कर रही थी पर वही दूसरी ओर जीवन यापन हेतु
मानव के कठोर श्रम साध्य संघर्ष की वेदना को भी दर्शा रहे थे। रॉक जहाँ 45 डिग्री
के कोण को संतुलित रखने के अपने अनथक प्रयास मे रत थी वही इतनी कठिनाई भरी डगर पार कर
दुकानदार अपने जीवन यापन मे अनवरत रत था दोनों ही कृतियाँ अपने अस्तित्व को बचाने
मे संघर्षरत दीख पड़ी!!
रॉक
से नक्की झील का शानदार नज़ारा देखते ही बनता था। रॉक पर चढ़ने की अपेक्षा, उतरने मे
ज्यादा प्रयास न करने पड़े, चंद मिनटों मे साँप सीढ़ी के खेल
मे साँप के डसने पर 99 से सीधे 1 पर आकार टिक गये। शाम हो चली थी। हल्की सी ठंड के
बीच नक्की झील पर अपनी उपस्थिती दर्ज़ करा रात्रि विश्राम हेतु अपने होटल पहुँच
गये।
दूसरे
दिन एक्टिवा की सवारी से माउंट आबू दर्शन की अभिलाषा मे प्रातः सात बजे के लगभग तैयार हो होटल से प्रस्थान करने ही वाले थे पर
शायद मुहूरत शुभ नहीं था। "सरस्वती होटल" (जहाँ हम ठहरे थे) के
रिसेप्शन पर कमरे की चाबी छोड़ उपस्थित स्टाफ से बापसी के पूर्व कमरे की सफाई हेतु
निवेदन, स्टाफ को अप्रिय लगा मानों तहसील के बाबू से कोई किसान "खसरे-खतौनी"
की नकल बगैर किसी भेंट-पूजा के कराना चाहता हो। साफ सफाई मे इतनी हीला-हुज्जत और
बहाने बाजी जैसे होटल, होटल न हो कोई
सरकारी उपक्रम हो। यध्यपि मेरी सविनय अवज्ञा शीघ्र नौकर-मालिक के रिश्तों और
उपभोक्ता के अधिकारों पर आ गई। 7 घंटे बाद
दोपहर 3 बजे कमरा साफ एवं करीने से लगा मिला। सोच कर उस मूढ़ स्टाफ पर तरस ही आया
कि सफाई करनी ही थी तो इतनी बहस-मुसाहिब और थुक्का-फजीती की क्या जरूरत थी।
अर्ध
निद्रा मे डूबे पर्यटकों के बीच गर्म चाय पोहे के नाश्ते के बावजूद वातावरण मे
ठंडक का अहसास हो रहा था। घने जंगलों के बीच इक्का-दुक्का लोग आते जाते मिले। धूप
की चाहत ने 2-3 बार जंगल मे धूप मे रुकने को मजबूर किया। जंगल की नीरवता, मौन और
सन्नटा कभी कभी पक्षियों के कलरव और
चहचहाट से भंग होने के बीच हमारी यात्रा 18 किमी॰ दूर "गुरु शिखर" की ओर
जारी थी। घाटियों और पहाड़ियों के रास्ते होते हुए यात्रा मंथर गति से चल रही थी।
सूरज भी आसमान मे चढ़ाई कर कुछ उपर उठ हो आया था। मौसम खुशगंवार हो चुका था। मेरी आश्चर्य और खुशी का कोई ठिकाना नहीं था कि टोड
रॉक की तरह हजारों, लाखों आकृतियाँ,
ईश्वरीय रचनाएं, प्राकीर्तिक दैवीय मूर्तियाँ जहाँ तहाँ
चारों ओर विखरी पड़ी थी। आप जिस जीव जन्तु, पशु पक्षियों, यंत्र-उपकरणों की भी कल्पना करे, सभी आसपास या
दूरदराज़ देखने को मिल जाएंगी। गुरु शिखर तक की 18 किमी॰ की यात्रा के रास्ते मे
अपनी स्कूटर कम से कम 50 जगहें रोकी होगी ताकि उन स्वनिर्मित पत्थरों की संरचनाओं
का चित्रण अपने मोबाइल मे कैद कर सकूँ। कभी टूटे थूथन का आभास देता मगर, कहीं बगैर दांत के पोपला मुंह लिये शेर, आधी से
ज्यादा सड़क को घेरे झपट्टा लगता भालू, छोटे से रोशन दान का
आभास देती सेल्यूलर जेल कमरा, हाथी और गेण्डे का आभास देते
जीवाश्म, सुंदर सुसज्जित शय्या पर नागफन फैलाये कालिया नाग या भारी भरकम समुद्री
सील मछ्ली का अपने प्रतिद्वंदी से युद्ध के दृश्य
के सहित सैकड़ों प्रकृतिक गुफाओं आदि को देखते हुए कब गुरु शिखर की तलहटी पर
पहुँच गये पता ही नहीं चला। .................
क्रमशा:
विजय सहगल
2 टिप्पणियां:
Bahut sunder sir
well thought nice....
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