रविवार, 21 फ़रवरी 2021

चीनी हलवाई, मुरैना

"चीनी हलवाई"





हलवाई का "चीनी" नाम क्यों पड़ा, मिठाई की "चीनी" के कारण, या "चीन देश" के प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संपर्क या संबंध के कारण? मै नहीं जानता। मैंने हमेशा उसकी दुकान के मिष्ठान का पूरा पूरा भाव दिया, पर उसने हमे कभी भाव नहीं दिया! इसलिये मैंने भी कभी जानने की कोशिश नहीं की "कि भाई, चीनी हलवाई तुम्हारा नाम "चीनी" क्यों पड़ा या क्यों रक्खा!! (इन लाइन को बहुत गंभीरता से न लेना यूं ही लिख दी)।

पर एक बात तो पक्की थी कि "चीनी हलवाई" की मिठाई का कोई मुक़ाबला न था। मैंने अपनी नौकरी के साढ़े चार साल पोरसा (जिला मुरैना, मध्य प्रदेश) प्रवास मे बिताये। अपने गृह नगर झाँसी आते/जाते शायद ही कोई  हफ्ता ऐसा बीता हो जब मैंने, मुरैना रेल स्टेशन के सामने स्थित उसकी दुकान के व्यंजनों का उपभोग करने से कभी मै चूंका हूँ। ये मेरे साप्ताहिक दिनचर्या का अंग था। ऐसा कोई हफ्ता नहीं छूटा होगा जब  सोमवार को झाँसी से मुरैना  आने पर  पोरसा के लिए बस मे सवार होने के पूर्व "बेढ़ई और जलेबी" का रसास्वादन मैंने न लिया हो। कभी कभी पिन्नी, पतिसा, इमारती और उड़द की दाल के लड्डू भी हमारे स्वल्पाहार का हिस्सा होते।  पर शनिवार को पोरसा से वापसी पर  चीनी हलवाई के व्यंजनों का स्वाद झाँसी जाने वाली ट्रेन पर निर्भर करता था। यदि ट्रेन सही समय पर है तो मन मार कर ट्रेन मे बैठ जाता और यदि ट्रेन लेट है अर्थात 10 मिनिट का भी समय हो  तो अन्य प्रशंसक उपभोक्ता की तरह मै भी उसकी दुकान का  ग्राहक होने पर संतुष्टि महसूस करता। इसका मुख्य कारण था कि उसकी दुकान स्टेशन परिसर से सड़क पार करते ही थी। जहां सरलता से ट्रेन पर निगाह रखते हुए मिष्ठान वस्तुओं का सुस्वाद  विनमय  हो जाता था।

आज यहाँ  मै चीनी हलवाई की मिठाइयों के स्वाद, गुणवत्ता आदि की  चर्चा/परिचर्चा कर आपका और अपने मुंह के साथ ज्यादती नहीं करूंगा। आप, फिर भी, एक बार मिठाइयों के विवरण के चिंतन, मनन से ज्यादती सहन भी कर ले पर "डाइबिटिस" मुझे खाने से तो क्या, मिठाई से संबन्धित बातों को भी याद करने के विरुद्ध चेतावनी देती  रहती है।

चलिये मूल विषय पर आते है। दरअसल विभागीय प्रोन्नति के लिये मुझे साक्षात्कार मे शामिल होने के लिये एक बार जयपुर जाना था। मेरे कुछ मित्र भी उसी ट्रेन से आ रहे थे जिससे मैने भी आगरा जाना था। जहाँ से सभी को एक साथ आगे बस द्वारा जयपुर जाना था। साथी  मित्रों के नाम तो याद नहीं, पर घटना शायद 1995 की थी।

मुझे झाँसी से चढ़ना था। झाँसी पर मेरी मुलाक़ात मेरे मित्रों से हुई जो उसी ट्रेन से पीछे से आ रहे थे। साक्षात्कार और आगरा से जयपुर जाने के कार्यक्रमों  पर ट्रेन मे चर्चा होती रही इसी बीच मुरैना स्टेशन आ गया। परिचित स्टेशन तो था ही, सालों यहाँ से आवागमन जो अब भी जारी था।  चीनी हलवाई की याद आना स्वाभाविक थी। सौजन्यता वश मुरैना स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उतर कर एक बार फिर से अपने पुराने दिनों को याद कर ही रहा था कि मैंने देखा कि आगे रेल फाटक की क्रोसिंग पर कुछ भीड़ भाड़ नज़र आ रही है। लोगो की भीड़ रेल्वे लाइन पर जमा थी। मुझे सोचने मे कोई संकोंच न हुआ कि कुछ हादसा या गड़बड़ी रेल लाइन पर हुई है। सालों के आवागमन पर दैनिक या साप्ताहिक दैनिक रेल यात्री अपने आपको रेल विभाग का "तुर्रम खाँ" समझने लगते है कुछ ऐसी ही गलतफहमी उस दिन मुझे भी हो गई। कुछ रेल विभाग की कार्यप्रणाली की ज्यादा समझ और कुछ अपने ऑफिस साथियों पर अपने पूर्व स्टेशन पर रहने के रौब और रुतबे की गलतफहमी ने रेल फाटक पर जमा भीड़ को देख ये निर्णय लेने के लिये बाध्य कर दिया कि भीड़ की गड़बड़ी को दूर होने मे 15-20 मिनिट तो लगेंगे ही।  अतः ट्रेन अभी 15-20 नहीं जाने वाली। विश्वास होता तो मै साहस न करता पर अतिविश्वास ने मुझे दुस्साहस करने को मजबूर कर दिया।  मैंने सोचा कि क्यों ने अपने साथियों को चीनी हलवाई की गरमा-गरम बेढ़ई और जलेबी का नाश्ता करा अपने रुतबे को मजबूत किया जाये। तुरंत निर्णय ले मैंने साथियों से कहा कि मै पाँच मिनिट मे स्टेशन के बाहर स्थित चीनी हलवाई से नाश्ता ले कर आ रहा हूँ, अभी ट्रेन 15 मिनिट नहीं जाने वाली!! इतना कह मै तेजी से स्टेशन के बाहर भागा। चीनी हलवाई से अर्जेंट आग्रह कर ट्रेन के प्लेटफॉर्म खड़े होने का वास्ता दे ऑर्डर दिया। चीनी हलवाई ने भी तुरंत बेढ़ई और जलेबी पैक कर दी और मै उल्टे पैर ही बापस प्लेटफॉर्म की ओर दौड़ा।

जिसका डर था वही हुआ। अतिआत्मविश्वास मे ट्रेन स्टेशन से रवाना हो चुकी थी। जाती हुई ट्रेन दिखाई तो दी, पर वह हमारी पहुँच के बाहर थी। दूर जाती ट्रेन को देख लगा शायद साथियों ने चैन खींची हो? पर ट्रेन चली तो चलती चली गई। अचानक इस स्थिति की कल्पना मैंने नहीं की थी। विश्वास तो था कि मेरी सीट से मेरे साथी मेरा सामान सूटकेस उठा लेंगे, पर ऐसी कोई बात नहीं हुई थी और न ही ऐसी अनहोनी का अंदेशा भी था, कि मेरा  क्या क्या और कौनसा सामान है? चिंता हुई। स्टेशन मास्टर से आग्रह कर आगरा स्टेशन पर सामान को सुरक्षित उतरवाने का संदेश प्रसारित करा दे। अतरिक्त सुरक्षा को दृष्टिगत आशंकाओं के बीच आगरा मे अपने बहिनोई को एसटीडी पीसीओ से दूरभाष पर घटना बता उन्हे भी स्टेशन पहुँचने का आग्रह किया क्योंकि उन दिनों मोबाइल का चलन शुरू नहीं हुआ था। मैने  सीधे मुरैना बस स्टैंड पहुँच  आगरा की बस पकड़ी। सौभाग्य से हरियाणा रोडवेज की नॉन स्टॉप बस से डेढ़ घंटे मे आगरा पहुँच गया। स्टेशन पहुँच सभी साथियों से मुलाक़ात हो गई। खैरियत थी सभी कुछ ठीक ठाक था। बहिनोई जी भी स्टेशन पहुँच चुके थे। मुरैना स्टेशन मास्टर द्वारा प्रेषित संदेश का भी प्रसारण आगरा स्टेशन पर कर दिया गया था।  उस समय तक  बेढ़ई और जलेबी गरम तो नहीं थी पर तनाव और परेशानी ने हमारे दिमाक की गर्माहट से उन्हे भी कुछ गरम जरूर कर दिया था।  

अपनी करनी पर क्रोध और ग्लानि भी हुई कि व्यर्थ मे रेल विभाग के कर्मचारियों, साथियों और बहिनोई साहब को अपनी "बेवकूफी" के कारण परेशान कर दिया। पर कहीं गालिब के उस शेर "बहलाने को दिल  गालिब ख्याल अच्छा है"  के कुतर्क दे  मन को तसल्ली दी कि, "सब कुछ तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार ठीक  हो जाता तो कौन घटना को याद करता और कौन घटना का यहाँ  जिक्र करता? और कौन चीनी हलवाई को स्मरण करता??

 

विजय सहगल    

         

               

                    

     


1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

*मुरैना स्टेशन के चीनी हलवाई के विभिन्न मिष्ठान्नों के नाम मात्र पढ़ने से मुँह में चासनी-सी घुलने लगी।छोटे स्थानों पर अक्सर गुणवत्तापूर्ण वस्तुऐं अपेक्षाकृत कम भाव पर मिल जाती हैं क्योंकि लागत कम आती है।आपकी लेखन कला सरल व रोचक है।*
*बस या ट्रेन से यात्रा करते वक्त बस स्टैंड या रेलवे-स्टेशन के बाहर जाने का जोखिम जब तक नितांत जरूरी न हो नहीं उठाना चाहिए।यह तो अच्छा हुआ कि आपका सामान आदि सुरक्षित मिल गया।खैर,ऐसी अप्रत्याशित घटनाऐं अनुभव दे कर हमें और परिपक्व बना देती है।अब तो आप पर्यटन में पारंगत हो चुके हैं।*
👌👌👌🌹🙏🌹
सुरेन्द्र सिंह कुशवाहा ग्वालियर