सोमवार, 15 फ़रवरी 2021

पत्थर की अभिलाषा

 

"पत्थर की अभिलाषा"




मै रस्ते का ठलुआ पत्थर,
राहगीर की ठोकर खाकर।
दूरी कुछ मै, तय कर पाया।
रूखे जीवन मे, रंग भर पाया॥
एक और ठोकर मै खाकर।
पड़ा रहा "घूरे" पर आकार॥

हाथों कभी किसी पापी के।
देश द्रोही, अपराधी के॥
पहुँच मे आया।
ठगा सा पाया!!
हा! दुर्दैव, दुर्भाग्य हमारा।
अपनों ने अपनों को मारा॥
"जड़" होकर भी हम ये सोंचे।
"चेतन" कैसे करें, भरोंसे?
जिस थाली मे तुम हो खाते।
खाकर उसमे ही, छेद बनाते॥
तुच्छ अतीत पर खेद जताकर।
परिमार्जन की राह दिखा कर॥
उन नन्हें हाथों मे आऊँ।
नभ मे खूब उच्छाला जाऊँ॥
पाली थी कुछ यही तमन्ना।
आसमान मे उछलूँ इतना॥
काश छेद उसमे कर पाऊँ,
लौट ज़मी पर बापस आऊँ।
गिरूँ कहीं उस पुण्य धरा पर।
गिरा शहीद का लहू जहां पर॥
छू कर, धन्य भाग जानूँगा।
जीवन सफल तभी मानूँगा॥

विजय सहगल

2 टिप्‍पणियां:

Ganguli ने कहा…

बहुत खूब अति सुंदर सर जी

Unknown ने कहा…

Very nice