"दो
मुंही बातें"
दिनांक 17 दिसम्बर 2020 का श्रीमती प्रियंका
गांधी का ट्वीट पढ़ा। जिसमे संसद के शीतकालीन सत्र 2020 को न बुलाने पर सरकार की
आलोचना की गयी थी। पढ़ कर अच्छा लगा आलोचना होनी भी चाहिये। 135 वर्ष पुरानी,
1885 मे स्थापित जिस भारतीय राष्ट्रीय
काँग्रेस का देश के स्वतन्त्रता आंदोलन मे एक महत्वपूर्ण भूमिका रही हो उस दल की
राष्ट्रीय महासचिव का ट्वीट देश के सर्वोच लोकतान्त्रिक मंदिर का
सरकार द्वारा शीतकालीन सत्र न बुलाये जाने
पर जनतंत्र मे उनके एवं भारतीय राष्ट्रीय
काँग्रेस के लोकतान्त्रिक मूल्यों के प्रति निष्ठा एवं विश्वास को दर्शाता है।
श्रीमती प्रियंका गांधी,
उनके परिवार एवं काँग्रेस की कितनी निष्ठा,
विश्वास और श्रद्धा लोकतन्त्र के प्रति रही है देश के आम लोगो से छुपी नहीं है।
135 वर्ष पुरानी कॉंग्रेस के महासचिव का देश की संसद का सरकार द्वारा शीतकालीन
सत्र न बुलाये जाने पर लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर चिंता करना
स्वाभाविक है और होना भी चाहिये। काँग्रेस के
के इस युवा पदाधिकारी द्वारा लोकतान्त्रिक मूल्यों की रक्षा हेतु सोच और
भावनाएं प्रशंसनीय है।
लेकिन 135 वर्ष पुरानी काँग्रेस पर आधे से
भी ज्यादा समय तक एवं स्वतन्त्रता के
बाद से लगभग आज तक, जिस एक परिवार का वर्चस्व रहा हो उसके युवा
महासचिव को काँग्रेस पार्टी के आंतरिक लोकतन्त्र पर भी तनिक प्रकाश नहीं डालना चाहिये?
देश की स्वतन्त्रता पश्चात अधिकतर समय नेहरू/गांधी परिवार से इतर काँग्रेस मे
लोकतान्त्रिक मूल्यों की स्थापना मे किसी
अन्य व्यक्ति या परिवार के नेत्रत्व न मिलने के कारणों पर कोई विचार मंथन नहीं होना
चाहिये??
ऐसे कौन से कारण रहे जो भारत भूमि पर कुछ समय छोड़ एक परिवार से परे कोई दूसरा नेत्रत्वकारी व्यक्ति
नहीं मिला? स्वतंत्र भारत के
इतिहास के कुछ वर्षों को यदि विस्मृत कर दिया जाये तो भी वर्ष 1947 से 1966 तक नेहरू युग,
1966 से 1984 तक इंद्रा युग, 1985 से 1998 तक
राजीव गांधी युग और 1998 से आज 2020 तक श्रीमती सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी
युग!!! क्या पीढ़ी दर पीढ़ी देश की सबसे पुराने राजनैतिक दल पर वंश-परंपरा का
नेत्रत्व हमे लोकतन्त्र के विपरीत राजशाही
या राजवंश की तरफ नहीं ले जा रहा है??
क्या काँग्रेस की युवा नेत्री को अपने "कुलश्रेष्ठ" की इस परंपरा को समय
रहते, लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर गहन
आत्ममंथन नहीं करना चाहिये? ये अपने आप मे
एक ज्वलंत प्रश्न है??
उन्होने किसानों के बिलों पर चर्चा के लिये
सरकार द्वारा संसद सत्र न बुलाने पर सरकार
की असंवेदन शीलता और अहंकार पर कटाक्ष कर ठीक ही टिप्पड़ी की है। देश के आप जैसे नेत्रत्वकारी
युवा को लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन पर
चिंतातुर होना, उसके राजनैतिक
परिपक्वता और जागरूकता का परिचायक है।
हमारे देश के आम जीवन मे कहावतों का एक
महत्वपूर्ण स्थान है जो अपने संक्षिप्त शब्दों मे तीखे एवं गहरे संदेश लिये होती है। ऐसे ही एक मुहावरा है "सूप तो सूप,
छलनी जिसमे 36 छेद है,
सुई से कहती है कि तेरे पेट मे छेद है"। काँग्रेस का दुर्भाग्य है कि
लोकतान्त्रिक मूल्यों के हनन के उदाहरणों से इसका इतिहास भरा पड़ा है। फिर चाहे
1975 मे श्रीमती गांधी द्वारा घोषित आपात काल हो?
या तुष्टीकरण के वशीभूत राजीव सरकार का
शहबानों प्रकरण!! या राहुल गांधी द्वारा सितम्बर 2013 मे श्री मनमोहन सिंह सरकार
द्वारा दागी मंत्रियों के संबंध मे पारित अध्यादेश का सार्वजनिक रूप से फाड़ना हो
या 2018 मे श्री राहुलगंधी द्वारा संसद मे "काँग्रेसी प्यार की झप्पी"
जताते हुए पीएम को गले लगाने के बाद आँख मारना!! काँग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उक्त
संसदीय प्रेम के जीवंत द्रष्टांत से देश के लोग भली भाँति परिचित है। श्री राहुल गांधी के संसद मे आँख मारने के दृश्य को देश
के करोड़ो लोगो ने टीवी पर लाइव देखा!! क्या ये सारी घटनाएँ काँग्रेस के संसद एवं
लोकतान्त्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान,
अपनत्व, मर्यादा,
निष्ठा और समर्पण को दिखलाते है??
श्रीमती प्रियंका गांधी,
संसद के शीतकालीन सत्र न बुलाये जाने पर,
किसानों के बिलों पर चर्चा न कराये जाने
पर जनतंत्र की परंपराओं का हनन बताती है,
जो इस बात का परिचायक है कि संसद मे चर्चा-परिचर्चा,
चिंतन मनन के पश्चात लिये गये निर्णयों पर
उनकी एवं उनके दल भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की गहरी निष्ठा,
आस्था एवं विश्वास है। राजनैतिक दलों का आपस मे नीतिगत मतभेद हो सकते है तब संसद
द्वारा बहुमत से पारित उन तीन कृषि बिलों
का विरोध क्यों? आम जनता/किसानों द्वारा किसी कानून या बिल पर असहमति या विरोध हो
सकता है पर राजनैतिक दलों द्वारा संसद द्वारा पारित बिलों के विरुद्ध लोगो को क्यों भड़काया जा रहा है?
आखिर संसद के शीतकालीन सत्र मे भी यदि चर्चा
के दौरान जो निर्णय लिये जाएंगे तो क्या गारंटी कि काँग्रेस या अन्य राजनैतिक दलों
द्वारा संसद के उन निर्णयों पर अपनी सहमति
के बावजूद देश के भोले भले लोगो को पुनः नहीं वरगलायेंगे या भृमित नहीं करेंगे??
इन राजनैतिक दलों द्वारा अपनी इन दो मुंही,
"नकली चेहरा सामने आये असली सूरत
छिपी रहे वाली" नीतियों को क्यों नहीं बदलना चाहिये?
इस पर गहन चिंतन मनन की आवश्यकता है।
विजय सहगल

2 टिप्पणियां:
बहुत सुन्दर एवं सटीक विश्लेषण ।
सटीक विश्लेषण ।
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