शनिवार, 5 दिसंबर 2020

स्मृति चिन्ह

 

"स्मृति चिन्ह"

 



कभी कभी कार्यालयों मे कुछ पदस्थ उच्च अधिकारियों का रवैया अपने अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति द्वेषपूर्ण दुर्भावनाओं से ग्रसित होता है। वे बैंक के नियम और निर्देशों के इतर ये मानकर चलते है कि "उनका आदेश ही ऑफिस का नियम" है। मै आज तक नहीं समझ पाया इन  उच्च पदस्थ अधिकारियों का ऐसा पक्षपातपूर्ण रवैया एवं उपेक्षापूर्ण वर्ताव अपने अधीनस्थ अधिकारी साथियों के साथ क्यों रखते है? प्रोन्नति मे एक-दो स्केल ज्यादा प्राप्त कर लेने पर ऐसा अहंकार?  कुछ ऐसे ही एक वाक्ये से हमे लगभग चालीस साल की बैंक सेवा उपरांत बैंक की सेवा के आखिरी सेवानिवृत्ति वाले दिन से गुजरना पड़ा।      

बात 2018 अप्रैल की है। बैंक की लगभग 40 साल की सेवा के बाद आज आखिरी दिन था। आखिरी दिन भी मै अपने कार्यालय से दूर सैक्टर 62, नोयडा  स्थित शाखा मे निरीक्षण कार्य मे व्यस्त था। मुझे उम्मीद थी चूंकि आज बैंक की सेवा मे आखिरी दिन है अतः हमारे कार्यालय प्रमुख मुझे फोन कर कनॉट प्लेस स्थित मूल कार्यालय मे आमंत्रित कर ससम्मान  पदमुक्त पत्र प्रदान करेंगे। मैने  उनके फोन का इंतजार दोपहर एक बजे से शुरू किया कि शायद अब फोन आये! तब फोन आये!! पर फोन का इंतज़ार करते कब दो से तीन, तीन से चार बज गये और अंततः चार से कार्यालय समाप्ती के पाँच भी बज गये  पर फोन नहीं आया तो नहीं आया। मेरा इंतज़ार करना गलत साबित हुआ। उनका फोन कार्यालय समय पश्चात भी जब  नहीं आया। तब मैंने हमारे कार्यालय के व्हाट्सप्प ग्रुप मे एक संदेश लिखा "बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले"। तब कहीं हमारे  कार्यालय प्रमुख जी को अपनी प्रमुखताई का कुछ अहसास हुआ और उन्होने मुझे बैंक सेवा निवृत्ति की शुभकामनायें प्रेषित की वो भी व्हाट्सप्प पर ही प्रेषित संदेश के माध्यम से। चालीस साल की सेवा उपरांत ऐसी विदाई की उम्मीद न थी, बुरा तो जरूर लगा पर ये मान कर दिली तसल्ली दी, कि बैंक का ऐसा कोई  नियम तो है नहीं कि कार्यालय प्रमुख फोन या रूबरू हो आपकी चालीस साल की सेवाओं का स्मरण करे आपको शुभकामनायें या बधाई प्रेषित करने को बाध्य हों?? फिर सांस्कृति और संस्कार तो व्यक्तिगत मामले होते है?

मैंने कार्यालय मे पदस्थ अपने मित्र श्री तिवारी को जब पदमुक्ति पत्र हेतु संपर्क किया तो उन्होने सूचित किया कि कार्यालय प्रमुख सहित सभी स्टाफ ऑफिस से जा चुके है!! चूंकि श्री तिवारी नोएडा स्थित हमारे निवास के नजदीक ही निवासरत थे अतः सेवानिवृत्ति पर कार्यमुक्ति पत्र जो मेरे लिये बेहद खास था, को उन्होने हमे विदाई स्वरूप  सुपुर्द किया। उक्त विदाई मुझे आज भी अच्छी तरह याद है और शायद ताउम्र भी अच्छी ही तरह याद आती भी रहेगी।

हमारे बैंक का एक नियम या रिबाज कहें? "नहीं, नहीं रिबाज़ नहीं कहते है क्योंकि रिबाजों को छोड़ते एक दिन पहले सेवानिवृत्ति वाले दिन मै  देख ही चुका था," "इसलिये नियम ही कहते है, हाँ लिखित नियम!!" कि बैंक की सेवानिव्रत्त अधिकारी को रुपए 7500/- राशि  का एक "स्मृतिचिन्ह" अपनी स्वेक्षा  अनुरूप प्रदान किया जाये। इस 7500/- रु॰  के स्मृति चिन्ह को "कैसा" या "क्या" मे  परिभाषित नहीं किया गया था। हम अपने सेवाकाल मे देखते आये थे कि अनेकों  सेवानिवृत्त अधिकारी अपनी पसंद की वस्तु या उपयोग  के उपकरण या उपहार वस्तु क्रय कर बिल विभाग को दे देते है तदनुसार उक्त बिल का भुगतान अधिकारी के खाते मे कर दिया जाता है। ये एक अलिखित परंपरा बन गई थी। मैंने भी अपनी सेवानिवृत्ति पर अपनी उपयोग की दो-तीन वस्तुएँ क्रय कर मूल बिल कार्यालय मे प्रस्तुत कर दिये। 2-3 दिन बाद भी जब उक्त धनराशि रूपये 7500/- खाते मे नहीं आयी तो मैंने अपने साथी श्री भट्ट जी को फोन कर पैसे जमा न होने के कारण जानना चाहा। उन्होने कहा कि इस संबंध मे आप कार्यालय प्रमुख से संपर्क कर ले?

जब मैंने कार्यालय प्रमुख से फोन कर बिल भुगतान न करने का कारण जानना चाहा तो उन्होने हमे बताया कि बिल के भुगतान के संबंध मे दिशा निर्देश स्पष्ट न हो पाने के कारण  हमने प्रधान कार्यालय से मार्ग निर्देशन चाहा है क्योंकि आपने 2-3 वस्तुओं के बिल दिये है। मै ने सोचा कि हो सकता है कि इस खर्च की प्रतिपूर्ति हेतु कुछ दिशा निर्देश बैंक के परिपत्र मे  रहे होंगे अतः प्रधान कार्यालय के निर्देशों के आने तक प्रतीक्षा करना उचित रहेगा। पुनः दो-तीन दिन बाद भी जब पैसे नहीं आये तो मैंने फिर सीधे अपने पूर्व कार्यालय प्रमुख को फोन कर अपने 7500/- रूपये के भुगतान हेतु पूंछा? तब उन्होने कुछ अतार्किक बात कही। उन्होने कहा कि रूपये 7500/- का  "उपहार" हम आपको अपनी पसंद का स्मृति चिन्ह क्रय कर प्रदान करेंगे, जो आपकी पद और प्रतिष्ठा के अनुरूप हो। मै सुन कर हैरान था, साधारण व्यक्ति होने के नाते सेवानिवृत्त पर कार्यालय प्रमुख के व्यवहार की टीस तो  थी ही। मैंने आवेश को  नियंत्रित कर पूरे सम्मान के साथ अपने प्रमुख को कहा कि यदि स्मृति चिन्ह आपने ही देना था तो आपको हमे पहले बताना चाहिये था? मै उपहार आदि पर 7500 रूपये व्यय नहीं करता। अब आप इस समय अपने उपहार को हमारे ऊपर थोपना चाहते है, जो मुझे स्वीकार्य नहीं। तब उन्होने कहा कि आप तीन बिल की जगह कुलराशि रूपये 7500/- का एक बिल बनवा कर दे दे? तब हम उसका भुगतान आपके खाते मे करा देते है। मैंने उनको पुनः सम्मान पूर्वक कहा महोदय, किसी भी कीमत पर हम आपको फर्जी  बिल बनवा कर नहीं देंगे। आप फर्जी बिल मांग कर सेवानिवृत्ति के समय हमारी पूरे सेवाकाल को कलंकित कर मुझे उलझाने के प्रयास न करे। मैंने आवेशित हो कर ये जरूर कहा कि आप वेशक मुझे 7500/- का भुगतान न करें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता पर आपका इस तरह  बैंक द्वारा सेवानिवृत्त अधिकारी को मिलने वाली 7500/- की धनराशि से मुझे जानबूझ कर वंचित कर  परेशान करना उचित नहीं है। मै इस पूरे घटनाक्रम को फोन पर अभी ही "माननीय अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक" को सूचित कर रहा हूँ। इतना कह कर मैंने फोन काट दिया।                 

तत्काल ही कार्यालय मे पदस्थ मेरे मित्र श्री कपूर जी का फोन मेरे पास आया। बोले क्या बात हो गई सहगल जी आप इतने नाराज हो गये। साहब ने मुझे आप से बात करने को कहा है। आप थोड़ा धैर्य रखे हम अभी बिल का भुगतान आपके खाते मे करा रहे है। इस तरह दस-पंद्रह मिनिट मे ही स्मृति चिन्ह की धनराशि मेरे खाते मे आ गई।

प्रायः ऐसा देखा गया है कि श्रेष्ठता के भाव से ग्रसित  कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों की सोच एवं व्यवहार अपने अधीनस्थ साथियों के प्रति सेवकों या घरेलू नौकरों जैसा होता है वे ये भूल जाते है कि वे  भी किसी वरिष्ठतम अधिकारी के अधीनस्थ ही है।  हम स्मरण रखना होगा कि सावर्जनिक क्षेत्र के बैंक किसी एक व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं है? और अंतोत्गत्वा सभी अधिकारी कर्मचारी आम जनता और सरकार के नौकर ही है। ऐसे  विचार कुशल पुरुषों की इस दुर्भावनापूर्ण सोच ने बैंक का बड़ा अहित किया है जिसका फल हम बैंक की हस्ती को मिटते, गुमनामी मे समिटते  एवं दोयाम दर्जे के पीढ़ित सदस्य होने के रूप मे देख ही रहे है। उच्च पदासीन व्यक्तियों को अधिक अधिकार  ज़िम्मेदारी और शक्तियाँ इसलिये सौंपी गई कि वे अपने कर्तव्यों का निर्वहन  उतनी ही ज़िम्मेदारी से कर समूहिक रूप से संस्था को आगे बढ़ाए न कि अपने  दंभ-अहंकार के मद मे अपने अधीनस्थों के प्रति प्रतिकारात्मक या प्रतिशोधात्मक कृत करे।


विजय सहगल


2 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

बैंकों में भी सभी वर्गों में चापलूसी का बोल वाला है इसे कोई माने या ना माने लेकिन हकीकत यही है सही बात कोई नहीं सुनना चाहता यस मैन सभी को पसंद आते हैं

Deepti Datta ने कहा…

Completely Agreed sir