शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

#तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब

#तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब, पटना"







2 दिसम्बर 2020 को पटना प्रवास पर तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब, पटना मे श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जन्मभूमि के दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त कर अपने आप को बड़ा सौभाग्य शाली और गौरवान्वित महसूस किया। आज से 354 वर्ष पूर्व श्री गुरु गोविंद सिंह का जन्म 22 दिसम्बर 1666 मे इसी स्थान पर हुआ था। मेरे लिये  गालव ऋषि की पुण्य भूमि ग्वालियर मे निवासरत होने के कारण अतरिक्त गौरव की बात भी है क्योंकि श्री गुरुगोविंद सिंह जी का ऐतिहासिक जुड़ाव भी गुरुद्वारा दाताबंदी छोड़ के कारण ग्वालियर से रहा है। आज पटना मे तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे बचपन मे देखी वो तस्वीर याद हो आई जो मैंने  गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित पत्रिका "कल्याण" मे देखी थी। ग्लाज़ेड पेपर पर छपी उस तस्वीर मे कैसे श्री गुरु गोविंद सिंह के दोनों साहिबजादों सात वर्षीय श्री जोरावर सिंह और 5 वर्षीय बालक श्री फतेह सिंह को आततायी वजीर खाँ द्वारा जिंदा दीवार मे चुनवा देने का चित्र  विवरण के साथ दिया था। मेरा अनेकों वार ग्वालियर के किले मे स्थित  गुरद्वारा दाताबंदी छोड़ जाना हुआ हर वार  कल्याण पत्रिका मे छपी वो काली-सफ़ेद फोटो मेरे ज़ेहन मे याद आती। कैसे श्री गुरु गोविंद सिंह जी के दोनों साहिबजादों  ने उस आततायी वज़ीर खाँ  के सामने झुकने से इंकार कर "बोले सो निहाल, सत श्री अकाल के जयकारों के साथ आत्मोत्सर्ग के लिये खड़े हो गये। दोनों साहिबजादों ने   अपने बाबा गुरु श्री तेगबहादुर के पद चिन्हों पर चल उनकी ही तरह आत्मबलिदान के मार्ग को चुन मानवता की खातिर अपनी आत्माहुति दे दी। विश्व इतिहास मे ऐसा कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता जब श्री गुरुगोविंद सिंह जी जैसे महामनव ने अपने मन, वचन और कर्म मे अंश मात्र के भेद  विना  देश, धर्म और मानवता  की रक्षा हेतु अपना एवं अपने परिवार का  सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो। श्री गुरु गोविंद सिंह ने अन्याय अनाचार के विरुद्ध निडर हो युद्ध करते हुए अपनी एवं अपने चारों पुत्रों की जीवनाहुति अर्पित कर "सर्ववंशदानी" होने का गौरव इतिहास मे किसी और को हांसिल नहीं हुआ। खालसा पंथ के संस्थापक ऐसे महान योद्धा, वीर पुरुष, सिखों के दसवे गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह जी की जन्मभूमि की चरणरज़ अपने सिर माथे लगाना गौरवशाली एवं रोमांचकारी अनुभव था।

पटना सिटी की मुख्य और कोलाहल और भीड़-भाड़  से परिपूर्ण सड़क से सटे  गुरद्वारा तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे प्रवेश करते ही गुरुद्वारे के विशाल प्रांगढ़ मे  एक अलग आध्यात्मिक शांति, दिव्य तेज की अनुभूति का अनुभव महसूस होता है। निहायत ही साफ सफाई से पूर्ण प्रवेश द्वार पर अपनी पादुकाओं को रख दुनियाँ की माया मोह रूपी चरण रज जल से भरे कुंड  से होकर निकलने मे स्वतः ही छूट जाती है। पानी के कुंड  से गुजर गुरुद्वारे की सीढ़ियाँ चढ़ना मुझे हमेशा ही भाया है। मै गुरद्वारों के प्रवेश द्वारों पर  जल से भरे कुंड  से निकलने की इस वैज्ञानिक सोच का हमेशा प्रशंसक रहा हूँ जो जगह जगह की धूल, वैक्टीरिया या अन्य विषाणुओं को पवित्र पावन भूमि मे प्रवेश से रोकती है। संगमरमर से बने सुंदर वलयाकार प्रवेश द्वार से होकर विशाल खुले प्रांगढ  के चारों ओर स्वेत रंग के वास्तु निर्माण मन को सुखद एवं शांति प्रदान करने वाला था। मुख्य हाल मे प्रवेश करते ही हाल के केंद्र मे विराजे श्री गुरुग्रंथ साहब के नयनभिराम दिव्य दर्शन मन को सुकून और शांति प्रदान करने वाले थे। श्री गुरु ग्रंथ के सामने नतमस्तक हो मत्था टेकना अपने आप को कृतार्थ करने वाले क्षण थे। परिक्रमा पथ मे आज से लगभग  355  वर्ष पूर्व  माता गूजरी द्वारा पानी हेतु प्रयुक्त कुआं के दर्शन एवं उसके अमृत तुल्य जल का आचमन हमे  तत्कालीन समय और परिस्थितियों से रूबरू कराता है । इस पथ मे आगे गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा वचपन प्रयुक्त तलवार, गुलेल तीर आदि के साथ उनके द्वारा प्रयुक्त वस्त्र एवं अन्य वस्तुएँ के दर्शन सुखद अनूभूति देने वाले थे। कुछ समय हाल मे बैठ ग्रंथियों की सुमधुर आवाज मे शब्द कीर्तन:-   

"अमृत वाणी हरि हर तेरी, सुण सुण होवे परम गति मेरी। सुण सुण..........

जलन वुझी, शीतल होये मनवा, जलन वुझी.......  

सतगुरु का दर्शन पाये जियो, सतगुरु का दर्शन...................  

अमृत वाणी, हरि हर तेरी, सुण सुण  होवे परम गति मेरी। सुण सुण..........

शब्द कीर्तन मे हारमोनियम एवं तबले की संगत ने मन को भाव विभोर कर दिया। न जाने क्यों पंजाबी कम जानने के बावजूद श्री गुरु नानक से लेकर गुरु गोविंद सिंह तक सभी गुरुओं की शिक्षाएं, उनके शब्द मेरा स्वाभाविक पथ प्रदर्शक है। 1980 मे लखनऊ सेवा काल के दौरान प्रातः टेक्सला टीवी द्वारा आयोजित कार्यक्रम के शाबद कीर्तन की शीर्ष लाइन "कोई बोले राम राम, कोई खुदाय, कोई सेवे गुसैयाँ........." मेरा प्रिय कार्यक्रम था जिसमे हर रोज गृरुग्रंथ साहब की वाणी का पाठ होता था। पहले भी अमृतसर यात्रा के दौरान स्वर्ण मंदिर मे ऐसे ही सुखद पलों को मैंने घंटों बैठ कर महसूस किया था। कुछ ऐसी ही अनभूति मुझे आज  तख्त श्री हरिमन्दिर साहिब मे भी हुई।

पिन्नी प्रसाद अर्पित/प्राप्त  कर बापसी मे कड़ाह प्रसाद ग्रहण कर पुनः खुले प्रांगढ़ मे एक परिक्रमा कर बापसी की ओर बढ़ा। वही पास मे एक स्थान पर संवत 1722 (सन 1665) मे जिस द्वार से गुरु श्री तेग बहादुर जी ने अपने श्री चरण रख परिवार सहित प्रवेश किया था उन्ही पद चिन्हों पर चलना जीवन को कृत-कृत करने जैसा था।

बापसी मे गुरुद्वारा परिसर मे ही स्थित बिहार पर्यटक विभाग के कार्यालय मे श्री नागेंद्र शर्मा जी से बिहार एवं स्थानीय अन्य धार्मिक एवं पर्यटक स्थलों की जानकारी एवं सूचना पत्र एकत्र करना दिल को छूने वाला अनुभव था। प्रायः सरकारी विभागों मे ऐसे व्यवहार की उम्मीद कम ही होती है। उन्होने अन्य स्थलों के साथ, निकट ही गुरद्वारा बाल लीला एवं गुरु के बाग के बारे मे जानकारी दी। कैसे तत्कालीन जमींदार राजा दंपति श्री फतह चंद मैनी एवं विश्वंभरा  देवी ने श्री गोविंद राय जी के बाल्यकाल की  बाल सुलभ लीलाओं के चलते उन्हे पुत्रवत स्नेह के वशीभूत अपने महल/हवेली को गुरु जी के श्री चरणों मे समर्पित कर दी। गुरद्वारे के चारों ओर सघन आबादी वाले गली मुहल्लों के वर्तमान स्वरूप एवं रिहाइश से तत्कालीन समय के शहर के स्वरूप और रहन सहन की कल्पना सहज ही  की जा सकती है।

एक बार पुनः प्रवेश द्वार से ही गुरु स्थान एवं गुरु ग्रंथ साहब को प्रणाम कर इस चिर अभिलाषित तीर्थ यात्रा को सम्पन्न कर अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान किया जो एक यादगार यात्रा बन गई।  

विजय सहगल           

 


2 टिप्‍पणियां:

P.c.saxena ने कहा…

आपका यात्रा वृतांत निसंदेह प्रशंसनीय है क्योंकि इसे पढ़कर ऐसा महसूस होता है की जैसे हम स्वयं वहां उपस्थित है लेख रोचक एवं ज्ञानवर्धक है

azadyogi ने कहा…

आप 2 दिसंबर 20 को पटना साहिब आये और में आपकी दर्शन नहीं कर पाया, मुझे इसकी ग्लानि हुई, खैर ! अब यदि पटना आएं सपने समधियाने तो फोन अवश्य करें ।